धर्म के दशलक्षण

अब छोड़ अनादि भूल, विषय सुख तूल, जगत दुःखमूल,

कर्म भ्रमभारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ॥

(उत्तम क्षमा)

तन क्रोध घटा घनघोर, उठी चहुँ ओर, शक्ति का मोर,

जो शोर मचावे, तब हिंसा अंकुर भावभूमि जम जावे ।

नहीं गिने सबल-बलहीन, अनाथ अरु दीन, करे नित क्षीण,

रात अरु दिन में, सब भूल जाए उपकार हाय इक छिन में ॥

द्वीपायन क्रोध उपाया, द्वारावती नगर जलाया

मन समता भाव न आया, हो मुनि नरक पद पाया ॥

तप ऋद्धि सिद्धि भरपूर, क्रोध कर दूर, भाव मुनि सूर,

वे शुधउपयोगी, सब मारन ताड़न सहैं, जैन के योगी ।

मुनि उत्तम क्षमा विचार, सहें दुःख भार, क्रोध को मार,

दया आचारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ॥

(उत्तम मार्दव)

यह जाति लाभ कुल रूप, ज्ञान तप भूप, जो शक्ति अनूप,

आठ मद मानो, कुछ पर आश्रित कुछ छिनक रूप पहिचानो ।

है पर्वत सम मद मान, चढे अनजान, लघु जिय जान,

जीव को हेरे, वह इनको देखे क्षुद्र तभी मुँह फेरे ॥

इक इन्द्री सुर हो जावे, उत्तम नीचा कुल पावे ।

राजा हो रंक कहावे, क्यों मद में चित भरमावे ॥

तज शयन सेज गज – बाज, जगत का राज, करें निज काज,

भूमि पर सोते, मुनि पाव पयादा चलें मानमद खोते ।

सो उत्तम मार्दव जान, विनय सम्मान, तजो अभिमान,

धर्म परिहारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ॥

(उत्तम आर्जव)

है कपट निपट दुःख भार, बढ़े संसार, कुगति दातार,

विचारो मन में, नहीं चढे काठ की हंडी फेर अगन में ।

नहीं मिले कपट धन-माल, यह नटखट चाल, खुले भ्रम जाल,

अनेक जतन की, जो रूप धरो सो लखे रीति दर्पण की ॥

नहीं छुपे अंत खुल जावे, जो कपटी बात बनावे ।

फिर कोई नहीं पतियावे, क्यों माया मन भरमावे ॥

मन-वचन-काय त्रिकयोग, शुद्ध उपयोग, धार तज भोग,

मुनि बड़भागी, सो उत्तम आर्जव धर्म धरें वैरागी ।

जो मन में करो विचार, वही उच्चार, वही व्यवहार,

करो परचारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ॥

(उत्तम सत्य)

नित बोलो वचन संभार, झूठ को टार, निंद परिहार,

कठोर कराला, जो देखो जानो वही कहो तत्काला ।

जिस सच में हो जियघात, उठे उत्पात, झूठ सम भ्रात,

जान विसरावो, नहीं राग-द्वेष से बात से बात मिलावो ॥

वसु राजा नरक सिधारा, पर्वत का वचन सुधारा ।

नारद गया स्वर्ग मँझारा, है बात विदित संसारा ॥

पशु-पक्षी वचन विहीन, कर्म आधीन, मनुष्य परवीन,

जन्म का लाहा, तिन लिया जिन्होंने जग में सत्य निवाहा ।

हो जगत विषै परतीति, करैं सब प्रीति, सत्य की रीति,

गहो नर-नारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ॥

(उत्तम शौच)

है लोभ बड़ा इक पाप, देत संताप, सहे दुःख आप,

जो मन में धारे, घरबार छोड़ रणभूमि मरे अरु मारे ।

जा बसे अनारज देश, धरे बहु भेष, धर्म का लेश,

न मन में लावे, जल डूबे वन गिरि भ्रमतैं जान गँवावे ॥

आशा की गले में फाँसी, क्या हुआ भये वनवासी ।

विष रहा काँचुली नाशी, मन रागरु भये उदासी॥

क्या गंग- जमुन स्नान, तीर्थ जलपान, मैल की खान,

देह ज्यों धोवे, बिन किये तपस्या दोष दूर नहीं होवे ।

पर द्रव्य की ममता त्याग, सहित वैराग, शौच में लाग,

स्व पर हितकारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ॥

(उत्तम संयम)

मन मृग का तन वनवास, इन्द्रियाँ जास, मृगीगण पास,

केलि नित करते, तेरे धर्म खेत को फिरे रात दिन चरते ।

रे! जीवरूप किस्सान, तू चादर तान, नींद अज्ञान,

पड़ा क्यों सोवे, जब उजड़ गया सब खेत बैठ कर रोवे ॥

मन इन्द्रिय विषयन पागे, ते कभी न हित सों लागे ।

भामण्डलवत् अनुरागे, उत्पात में प्राण वे त्यागे ॥

ले मन इन्द्रिय को जीत, जगत भयभीत, जो संयम प्रीति,

करो ग्रह शिक्षा, त्रस थावर रक्षा करो धारके दीक्षा ।

मुनि मन- इन्द्रिय निरोध, जो संयम शोध, धरें चित बोध,

प्रमाद विसारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ॥

(उत्तम तप)

अनशन अवमौदर्य करो, परिसंख्यान वरो, सुरस परिहरो,

कसो निजकाया, संन्यास सुधारो षट्तप बाह्य बताया ।

प्रायश्चित स्वाध्याय विचार, वैय्यावृत धार, समाधि संभार,

छोड़ तन ममता, नित कीजै उत्तम ध्यान जो आवे समता ॥

इच्छा की पवन थमावे, मन का जल अचल बनावे ।

तब ज्ञान झलक दरसावे, निर्वाण तुरत पद पावे ॥

जस लाभ ख्याति की आस, सकल को नाश,

करो तप वीरा, दो पंच इन्द्रिन को दण्ड सहो तन पीरा ।

है यही मनुष गति सार, जगत उद्धार, लहै तप भार,

मुनि भवतारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ॥

(उत्तम त्याग)

त्रस थावर हिंसा टार, ज्ञान उपकार, दान विधि चार,

त्याग के माँहि, सो बिना मुनिव्रत पूरण सधते नाहीं ।

औषध-श्रुत-अभय-आहार, जो चार प्रकार, दो पात्र विचार,

होय निस्तारा, समदृष्टि श्रावक – मुनि पुरुष या दारा ॥

जिनमत निन्दक नर नारी, द्रोही कलुषित आचारी ।

ये हैं कुपात्र दुःखकारी, नहीं कहे दान अधिकारी ॥

रथ गऊ रजत गज बाज, देह तुल साज, तिया घर राज,

लोह कंचन को, है व्युत्पात संक्रांति दान दुर्जन को ।

बिन परख दया का दान, दुःखी पहचान, सबै सम जान,

देत आगारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ॥

(उत्तम आकिंचन्य)

चपला सम चपल निहार, लक्ष्मी संसार, है कुलटा नार,

नहीं कहीं जमती, यह छोड़ सुकुल भरतार नीच सों रमती ।

हैं छाया माया एक, पकड़ कर टेक, जो गए अनेक,

छाँव सम ढलती, पर यह न किसी के साथ पैंड भर चलती ॥

इसने जो लोग विसारे, वह जग में भ्रमते सारे ।

जो इससे हुए किनारे, तज भव भ्रम मुक्ति सिधारे ॥

जीरण तृण सम धनमाल, छोड़ तत्काल, आस जग टाल,

चले गए वन को, आकिंचन धर्म संभाल शुद्ध कर मन को ।

मुनि छोड़ जगत का वास, त्याग सब आस, गहे संन्यास,

मोक्ष अधिकारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ॥

(उत्तम ब्रह्मचर्य)

लख तिया पुरुष सम तात, सुता सुत मात, बहन अरु भ्रात,

जो नाता गिनते, सो नर नारी निज सुगति महल को चिनते ।

हो उनका यश विख्यात, कलंक नश जात, पाप को घात,

लहें जगभूषण, हुआ सीता का उपसर्ग शील का दूषण ॥

लख अगनि कुण्ड में धाई, सीता ने टेर लगाई ।

हो शील विषै चपलाई, तो देह अभी हो छाई ॥

जब कूदी अगनि मंझार, वो लई संभार, अग्नि हुई वारि,

कमल खिल आए, रच रत्न सिंहासन पूजन को सुर धाये ।

'मंगत' यह शील विचार, ब्रह्मचर्य सार, मोक्ष दातार,

को धोक हमारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ॥

पोष वदी तिथी अष्टमी, उगणिस सन पंथास ।

जैनी वरणी धर्मदास, उर धर परम हुलास ॥

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