अरहंतों को नमस्कार है, सिद्धों को सादर वन्दनआचार्यों को नमस्कार है, उपाध्याय को है वन्दन ॥और लोक के सर्वसाधुओं को है, विनय सहित वन्दनपंच-परम-परमेष्ठी प्रभु को बार-बार मेरा वन्दन ॥
चत्तारि मंगलं, अरिहंता मंगलं सिद्धा मंगलं,साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं ॥चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा,साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो ॥चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरिहंते सरणं पव्वज्जामि,सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि,केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि ॥
ॐ नमोऽर्हते स्वाहा (पुष्पांजलि क्षेपण करें)
अपवित्र हो या पवित्र, जो णमोकार को ध्याता है ।चाहे सुस्थित हो या दुस्थित, पाप-मुक्त हो जाता है ॥१॥
पंच नमस्कार मंत्र का ध्यान करने से पुरुष सब पापों से छूट जाता है चाहे ध्यान करते समय वह पवित्र हो अपवित्र हो या अच्छी जगह हो या बुरी जगह हो ।
हो पवित्र-अपवित्र दशा, कैसी भी क्यों नहिं हो जन की ।परमातम का ध्यान किये, हो अन्तर-बाहर शुचि उनकी ॥२॥
शरीर चाहे स्नानादिक से पवित्र हो अथवा किसी अशुचिपदार्थ के स्पर्श से अपवित्र हो तथा सोती जागती उठती बैठती चलती आदि कोई भी दशा हो इन सभी दशाओं में जो पुरुष परमात्मा की (पंच परमेष्ठी) स्मरण करता है वह उस समय बाह्य और अभ्यतन्तर से (शरीर और मन) पवित्र है ।
है अजेय विघ्नों का हर्ता, णमोकार यह मंत्र महा ।सब मंगल में प्रथम सुमंगल, श्री जिनवर ने एम कहा ॥३॥
यह नमस्कार मंत्र किसी मंत्र से पराजित नही हो सकता इसलिए यह मंत्र अपराजित मंत्र है यह मंत्र सभी विघ्नों को नष्ट करने वाला है एवं सर्व मंगलों में यह प्रधान मंगल है ।
सब पापों का है क्षयकारक, मंगल में सबसे पहला ।नमस्कार या णमोकार यह, मन्त्र जिनागम में पहला ॥४॥
यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों का नाश करने वाला है यह सब कार्यों के लिए मंगल रूप है और सब मगलों में पहला मगल है ।
अर्हं ऐसे परं ब्रह्म-वाचक, अक्षर का ध्यान करूँ ।सिद्धचक्र का सद्बीजाक्षर, मन-वच-काय प्रणाम करूँ ॥५॥
अर्हं ये अक्षर परबह्म परमेष्ठी के वाचक हैं और सिद्ध समूह के सुन्दर बीजाक्षर है । मैं इनको मन वचन काय से नमस्कार करता हूं ।
अष्टकर्म से रहित मुक्ति-लक्ष्मी के घर श्री सिद्ध नमूँ ।सम्यक्त्वादि गुणों से संयुत, तिन्हें ध्यान धर कर्म वमूँ ॥६॥
आठ कर्मों से रहित तथा मोक्ष रूपी लक्ष्मी के मंदिर और सम्यक्, दर्शन, ज्ञान, अगु रुलघु, अवगाहना, सूक्ष्मत्व अव्याबाध, वीर्यत्व इन आठ गुणों से सहित सिद्ध भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ ।
जिनवर की भक्ति से होते, विघ्न समूह अन्त जानो ।भूत शाकिनी सर्प शांत हों, विष निर्विष होता मानो ॥७॥
(पुष्पांजलि क्षेपण करें)