श्रीमहावीर पूजन पण्डित वृन्दावनदास

[श्रीमत] श्रीमान (अंतरंग बहिरंग विभूतियों से युक्त) भगवान् महावीर [भव] संसार के [पीर] दुखों को [हरे] हरने वाले है, निराकुल सुख के [सीर] स्रोत है । उनका [केहरि-अंक] सिंह चिन्ह बताता है कि उन्होने [अरि] शत्रुओं (कर्मों) को [करदंक] नष्ट कर दिया है । [हरि पंकति] इन्द्रों की कतार अपने [मौलि] मुकटों को आप के [सुआई] चरणों में झुका कर [नमे] नमस्कार करते हैं । हे करुणा रुपी धन के धारक भगवन् । मैं आप की भक्ति पूर्वक [हिये] चित्त में हर्षित होकर यहाँ स्थापना करता हूँ । आप यहाँ शीघ्र आइये, आइये, [तिष्ठ] विराजमान होइये ।

[क्षीरोदधि] क्षीरसागर का [शुचि] पवित्र [नीर] जल के [सम] समान जल [कंचन] सोने की [भृंग] झारी में [भरौं] भरकर लाया हूँ । हे प्रभु मेरी [भवपीर] सांसारिक दुखों के [वेग] शीघ्र निवारण [यातें] के लिए, यह जल [धार] धारा आपके समक्ष [करौं] प्रवाहित कर रहा हूँ । आप श्री वीर, महावीर, [सन्मति] सुबुद्धि के नायक हैं, वर्धमान! आप की जय हो! आप अत्यंत गुणवान, धैर्यवान और [सन्मतिदायक] अच्छी बुद्धि के दाता हो ।

मैं मलयागिरि का [सार] श्रेष्ठ चन्दन केसर के साथ घिसकर लाया हूँ । प्रभु [भव] संसार के [आताप] दुखों को [निवार] नष्ट कर दीजिये । आपकी पूजा करते हुए मेरा हृदय [हुलसौं] प्रसन्न/आनंदित हो रहा है ।

[शशिसम] चंद्रमा के समान [सित] सफ़ेद [तंदुल] चावल थाली में भरकर लाया हूँ । मोक्ष नगरी की प्राप्ति के लिए उनके पुँज आपके समक्ष अर्पित करता हूँ ।

[सुरतरु] कल्पवृक्षों के [सुमन] पुष्पों सहित [सुमन] भिन्न-भिन्न प्रकार के पुष्पों से मन से प्रफुल्लित हो कर [मनमथ] कामदेव को [भंजन] नष्ट करने के लिए आपके चरणों की पूजा करता हूँ ।

रस से [रज्जत] भरे/डूबे हुए, [सद्य] ताज़े [सज्जत] बनाये हुए नैवेद्य [मज्जत] मंजे हुए [थार] थाल में भरकर लाया हूँ । [अद्य] आज उन नैवेद्य से [रज्जत] आनंदित होकर आपके चरणों में अर्पित करता हूँ जिसके [भज्जत] सेवन से भूख रुपी [अरी] शत्रु दूर हो जाए ।

आप [सुखगेह] सुख के भण्डार है । मैं [तम] अंधकार को [खंडित] नष्ट करने वाले, [नेह] घी / चिकनाई से [मंडित] भरे / सुशोभित दीपक को [जोवत] जलाकर कर [भ्रमतम] मोह रुपी अन्धकार को [खोवत] नष्ट करने के लिए उसे आपके चरणों में अर्पित कर रहा हूँ ।

मैं हरिचंदन / श्रेष्ठ चंदन, अगर, कपूर का सुगन्धित चूर्ण आठों कर्म नष्ट करने के लिए आपके चरणों के समक्ष भली प्रकार खेता हूँ ।

हे जिनेन्द्र भगवान् ! [रितुफल] ऋतू के, [कल] शरीर/जीव [वर्जित] रहित, फल [कंचन] स्वर्ण के थाल में भरकर मोक्षफल की प्राप्ति के लिए आपके [ढिग] समक्ष अर्पित कर रहा हूँ ।

जल से फल तक [वसु] अष्ट द्रव्यों को [हिम] सोने के थाल में [सजि] सजाकर, शरीर और मन में अत्यन्त [मोद] प्रसन्नता धारण कर के आपके गुणों को गा रहा हूँ, मुझे संसार सागर से पार लगा दीजिये, आपकी पूजा करने से पापों का नाश हो जाय (ऐसा वरदान दीजिये) ।

आप [साढ] आषाढ़ [सित] शुक्ला छठ तिथि को गर्भ में आये थे, त्रिशला माता के उदर में पधारे थे, आपका गर्भकल्याणक [अघ] पापों को हरने वाला था ! [सुर] देवता, [सुरपति] इंद्र [तित] आपकी [नित] नित्य [सेव] सेवा करते थे ! मैं आपको [भवतरना] संसार को पार करने के लिए पूजता हूँ । भगवान् आप मुझे अपनी शरण में ले लीजिये । हे भगवन वर्धमान जी मुझे अपनी शरण में रखिये ।

आपका जन्म चैत [सित] शुक्ल तेरस को कुन्डलपुर में [कन वरना] स्वर्ण शरीर के वर्ण सहित हुआ था । [सुरगिरि] समेरु पर्वत पर [सुरगुरु] वृहस्पति इंद्र आदि ने आपकी पूजा रचाई थी । मैं भी आपके जन्म-कल्याणक की पूजा, संसार के जन्म मरण के संकट को नष्ट करने के लिए करता हूँ । भगवान् आप मुझे अपनी शरण में ले लीजिये । हे भगवन वर्धमान जी मुझे अपनी शरण में रखिये ।

मंगसिर [असित] कृष्णा की मनोहर दशमी को निर्ग्रन्थ दीक्षा धारण करी थी । कूल नामक राजा के घर आपने [पारन] पारणा करी । (देवों ने तो पञ्चाशचर्य कर वंदना कर ली थी) मैं (आपके आहार को समरण करके) आपके चरणों की पूजा करता हूँ । भगवान् आप मुझे अपनी शरण में रख लीजिये । हे भगवन वर्धमान जी मुझे अपनी शरण में रखिये ।

वैसाख शुक्ल दशमी को आपने चार घातिया कर्मों का क्षय कर के केवल ज्ञान प्राप्त करके [भवि] भव्य जीवों को [भवसर] संसार सागर से [तारे] पार किया । मैं आपके सुख [भरना] प्रदान करने वाले चरणों की पूजा करता हूँ । भगवान् आप मुझे अपनी शरण में रख लीजिये । हे भगवन वर्धमान जी मुझे अपनी शरण में रखिये ।

कार्तिक [श्याम] वदि / कृष्ण अमावस्या को पावापुर से मोक्ष मोक्ष [वरना] प्राप्त किया । [गन] गणधर, [फनि] धरणेन्द्र आदि देवों के [वृन्द] समूह ने [तित] वहाँ [बहुविध] अनेक प्रकार से [जजे] पूजा करी, मैं भी भगवन संसार का भय नष्ट करने के लिए आपकी पूजा करता हूँ । भगवान् आप मुझे अपनी शरण में रख लीजिये । हे भगवन वर्धमान जी मुझे अपनी शरण में रखिये ।

गणधर, [असनिधर] वज्रधारक/इंद्र, [चक्रधर] चक्रवर्ती, [हलधर] हलधारक/बलदेव/बलभद्र, गदाधारक, [वदा] वक्ताओं में [वर] श्रेष्ठ, [चापधर] धनुष धारक, [विद्यासुधर] विद्याधारी, [तिरशूलधर] त्रिशूलधारी सैदव आपकी सेवा/करते है । आप दुखों को हरने वाले है,आनंद प्रदान करने वाले है, आप [तारन] स्वयं तरने और [तरन] अन्यों को तारने वाले है,आपके चरण बहुत [रसाल] सुंदर है । ऐसे सुकुमाल भगवान् वर्धमान जिनका [भाल] मस्तक गुण रुपी [मनिमाल] मणियों की माला से [उन्नत] ऊँचा हो रहा है,के गुणानुवाद की जयमाला कही जा रही है ।

हे माता [त्रिशलानंदन] त्रिशला के पुत्र ! [हरिकृतवंदन] इन्द्रों द्वारा वंदित [जगदानंदन] जगत को आनंद प्रदान करने के लिए [चंदवरं] श्रेष्ठ चंद्रमा के समान है (चंद्रमा की चांदनी अत्यंत शीतलता प्रदान करती है), संसार के [ताप] दुखों को [निकंदन] नष्ट करने वाले है, [तनमन] शरीर और मन को [नन्दन] आनंद प्रदान करने वाले है, नेत्रों की पलके [सपंदन] स्पंदन रहित है अर्थात झपकती नहीं है, स्थिर नेत्रों के [धरं] धारक है ।

आपकी जय हो ! आप [केवल] केवल-ज्ञान रुपी [भानु] सूर्य की [कला] किरणों के [सदनं] स्थान है, [भवि] भव्य जीव रुपी [कोक] चकवों, (रात्रि होते ही चकवे चकवी का वियोग हो जाता है सूर्य निकलते ही प्रात; उनका संयोग हो जाता है) और [कंदवनं] कमलों के वन को [विकाशन] प्रफ्फुलित करने के लिए सूर्य के समान हो, [जगजीत]संसार को जीतने वाले, [महारिपु] महान क्षत्रु [मोहहरं] मोहनीय-कर्म को हरने वाले है, [रज] धूल के समान ज्ञानावरण, [दृगांवर] दर्शनावरण और अंतराय कर्म को [चूर] नष्ट करने वाले है ।

गर्भादिक पांच [मंगल] कल्याणकों से आप [मंडित] सुशोभित है, दुखों और दरिद्रता को [नित] सदा [खंडित] नाशक है,जगत [माहि] में आप ही [सतपंडित] सच्चे विद्वान् है, आप ही संसारीं भावों (राग,द्वेष,मिथ्यात्व आदि) के [विहंडित] नाशक हैं ।

[हरिवंश] इन्द्रों के समूह रूपी [सरोजन] कमलों को प्रकाशित करने के लिए आप [रवि] सूर्य के समान है (आपको देखकर इन्द्रों का समूह प्रसन्न हो जाता है ) । आप ही [बलवंत] बलवान, [महंत] महान और [कवि] सर्वज्ञ है!केवलज्ञान [लहि] प्राप्त कर आपने धर्म का प्रकाश किया था । [अबलो] आज तक वही मार्ग [राजतियो] सुशोभित हो रहा है ।

[पुनि] और आपके गुणों में अच्छी प्रकार सभी [सुर मग्न] देवता भक्ति भाव से मग्न रहते है । उनकी [वनिता] देवियाँ तरह तरह से आपके गुणों का गान करती है। भिन्न भिन्न लयों से [ताननिसों] और तानों से [मनभावत] मन को प्रसन्न करती है ।

और वे देवांगनाएँ रंग और उमग से भरी हुई आपकी भक्ति में नाचती हैं, वे अपने झुमरुओं से बंधे पैरों को स्थान स्थान पर चुन चुन कर रखती है जिससे झनन-झनन-झनन-झनन आवाज़ आती है और देवता भिन्न-भिन्न वाद्य यंत्रो को बजते है ।

कही घंटे के बजने की घननं घननं शब्द की आवाज़ आ रही है, कोई मृदंग बजा रहा है तो दृमदं दृमदं दृमदं की आवाज़ आ रही है, [गगनांगन] आकाश के आंगन के [गर्भगता] गर्भ में [सुगता] सारंगी बज रही है जिससे उसमे से [ततता ततता] तरह तरह के शब्द [अतता] उसमे से [वितता] निकल रहे है ।

[गति] तबले के बजने से धृगतां-धृगतां ध्वनि आ रही है, [सुरताल] देवों की तालिया [रसाल] सुंदर लग रही है । उनके, आकाश में इधर से उधर दौड़ते हुए, छाने से सननं सननं सननं की आवाज़ आ रही है । वे है तो एक रूप किन्तु भिन्न-भिन्न रूप धारण कर कार्य करते रहते है ।

किन्नर जाती के देव बीन बजा कर आपके उज्ज्वल यश को गा रहे हैं । हाथ की ताली बजने से कोई हाथ की ताली की आवाज़ कर रहा है, देवों के हाथ की तालियां विशाल शब्द कर रही है ।

इस प्रकार अनेक उत्साह से भरे हुए देवता भगवन आपकी भक्ति कर रहे है । हे भगवन आप ही संसार के प्राणियों के पिता हैं, आप ही [बिनकारन] निस्वार्थ संसारी जीवों का कल्याण चाहने वाले है ।

आप ही समस्त विघ्नों का विनाश करने वाले हैं, आप ही [निज आनंदभासन] आत्मा के आनंद लेने वाले हैं आप ही [चितचिंतितदायक] चित में चिंतन करने योग्य है । संसार में आप ही सब के लायक हो । आप से आगे कोई नहीं है ।

आपके [पन] पांच कल्याणकों से असंख्य जीवों ने उत्तम पुण्य का संचय किया था, हम उनमें शामिल नहीं हो पाये, किन्तु आपकी शरण में आये है तथा हमारा मन आपके गुणों में [पागत] उत्साहित/लीन है ।

भक्त भगवान् से प्रार्थना कर रहा कि आप मेरे हृदय में सदा बसिये, जब तक अष्टकर्मों का नाश नहीं हो जाए, तब तक मैं आपका ध्यान अपने हृदय में धारण रखू । तब तक शास्त्रों के चिंतवन में मेरा चित्त लगा रहे ।

मैं जब तक संसार में हूँ, तब तक व्रत और चारित्र की भावना चाहता रहूँ, तब तक मैं शुभ भावों को ही ग्रहण करूँ, (अशुभ भावों से बचा रहूं) तब तक मेरी नित्य सतसंगति रहे, तब तक मेरे चित्त संयम को धारण करने में लगा रहे ।

जब तक मैं कर्म शत्रु का नाश न कर लूं और जब तक समता धारण करके मोक्ष स्त्री का वरण न कर लूं तब तक भगवन हमे ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि हमे यह सब (सत्संगति, संयम, व्रत, चारित्र, जिनवाणी की सेवा) आपकी सेवा करने का अवसर आदि दीजिये, हमारी इतनी सुन लीजिये ।

महावीर जिनेन्द्र भगवान्, आपको (सुरेशा) इन्द्र, (नाग) धरणेन्द्र, (नरेशा) मध्य लोक के राजा भक्ति भाव से नमस्कार करते है । वृदावन कवि कहते है कि जो आपका ध्यान करते है उनके विघ्न नष्ट हो जाते है और श्रेष्ठ वांछित (शर्म वरा) मोक्ष सुख को प्राप्त करते हैं ।

भगवान् महावीर के दोनों चरणों को प्रीती/भक्ति पूर्वक पूजता है वह चतुर नर मुक्ति रूपी नवनीत को प्राप्त करता है । अर्थात उसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है ।

0:00
0:00