शांति पाठ

शांतिनाथ का मुख चंद्रमा के समान है,वे शील,गुणों,व्रतों और संयमधारी हैं!आपका शरीर १०८ लक्षणो से सुशोभित हैं,आपके नयनों को देखते ही कमलों का दल भी लज्जित होता है अर्थात आपके नेत्र कमल से भी अधिक सुंदर है !नोट:-भगवन के शरीर में १००८ लक्षण कहे है,यहाँ १०८ कहने का कारण है कि ९०० छोटे चिन्ह तिल आदि होते हैं औए बड़े १०८ ही होते है अत:यहाँ १०८ चिन्हों का वर्णन किया गया है!पंचम चक्रवर्ती पद के धारक एवं सोलहवे तीर्थंकर के सुख करने वाले थे,जिन के नायक इंद्र और राजा आपकी पूजा शान्तिके लिए करते थे,शांतिनाथ भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ !दिव्य (अशोक) वृक्ष के (भगवान् समवशरण में उपस्थित समस्त जीवों को शोक रहित होने का प्रतीक, अशोक वृक्ष के नीचे विराजमान होते है)पुष्पों की वर्षा (देवों द्वारा होती है)दुंदुभि/बाजे (देवों द्वारा बाजे बजाये जाते है) ,आसन – सिंहासन का होना (भगवान समवशरण में सिंहासन के ऊपर रखे कमल से चार अंगुल ऊपर अंतरिक्ष में विराजमान होते है),वाणी – (आत्मा को दिव्य ज्ञान द्वारा आनंदित करने वाली दिव्य ध्वनि का खिरना),तीन छत्रों का होना (भगवान् के त्रिलोक के स्वामी के उद्घोषक, उनके सिर के ऊपर तीन छत्र होते है,सबसे ऊपर छोटा ,सबसे नीचे सबसे बड़ा और बीच में मंझला),चमर – (देवताओं /इन्द्रों द्वारा ६४ चमर भगवन के ऊपर डोरे जाते हैं !)भामंडल – (यह आभा मंडल विशेष होता है,( भगवान का औरा होता है), जिसमे समवशरण में उपस्थित प्रत्येक भव्यजीव को अपने अपने सात भव;-३ भूत,१ वर्तमान और ३ भविष्यत स्पष्ट दिखते है) ये आपके प्रातिहार्य मनोहर / मन को हरने वाले हैं !,विशेष :-इन पंक्तियों में बताया है कि समवशरण में जब आप विराजमन होते है तो वहाँ उपस्थित प्रत्येक जीव को अष्टप्रातिहार्य स्पष्ट दृष्टिगोचर होते है!प्रातिहार्य-सामान्य लोगो में नहीं पाये जाने वाली विशेषताओं को प्रातिहार्य कहते है !ये देवों द्वारा बनाये जाते है!चक्रवर्ती मात्र मध्यलोक के स्वामी होने के कारण उनके सिर के ऊपर एक छत्र लगाया जाता है !जगत्पूज्य – तीनों लोकों में पूज्य, पूजौ-मैं पूजा करता हूँ, नाई-नवाकर / झुका करहे शांतिनाथ जिनेश!आप शांति और सुख प्रदान करने वाले हैं, तीनोलोकों में पूज्य हैं, मैं मस्तक झुका कर आपकी पूजा करता हूँ । भगवन हम सब को जो ये शांति पाठ पढ़ रहे है और चतुरसंघ; मुनि,आर्यिका श्रावक, श्राविका को परम शान्ति प्रदान कीजिये !मुकुट, हार, रत्नों आदि के धारक इन्द्रादि देव, जिनके कमल चरणों की पूजा करते है,ऐसे शांतिनाथ भगवान् जो श्रेष्ठ वंश मे उत्पन्न हुए, संसार को दीपक के समान प्रकाशित करने वाले दीपक के समान, मेरे को अनुपम शांति सदा प्रदान करे !हे शांतिनाथ जिनेन्द्र भगवन आप सभी पूजा करने वाले, हमारे रक्षकों, मुनियों और आचार्यों को, राजा, प्रजा और राष्ट्र, देश को शांति प्रदान कर सुखी कीजिये !हे भगवन समस्त प्रजा सुखी, राजा धर्मधारी और बलवान समुचित वर्षा समय पर हीनाधिक नहीं, रंचमात्र भी रोगो का अंदेशा नहीं, चोरी नहीं हो और आग नहीं लगे, सारे में अच्छा समय वरते (रहे), अकाल कभी नहीं पड़े, हैज़ा आदि भी नहीं फैले, सारे देश अर्थात विश्व सदा सुखकारी जैन धर्म को धारण करे !ऋषभादि भगवान्,जिन्होंने घातिया कर्मो का नाश कर केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया है वे समस्त जगत को शांति प्रदान करे !भक्त भगवान् से प्रार्थना कर रहा है कि,शास्त्रों को पढ़ कर लोग सुखी हो!सत्संगती का सब को लाभ हो,अच्छे आचरणों वालों की प्रशंसा करे,सभी के दोषो को ढकूं,जब भी बोलू हितकारी प्यारे वचन बोलूँ, अपकी वीतराग मुद्रा का निरंतर चिंतवन करूँ।मैं तब तक आपके चरणों की सेवा करता रहूँ जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं हो जाए !!प्रभु ,आपके चरण मेरे हृदय में और मेरा हृदय आपके पवित्र चरणों में तब तक लीन रहे जब तक मुझे मुक्ति प्राप्त न हो जाए ।प्रभु, मैंने अभिषेक पूजन और शांति पाठ किया है, इनमे मेरे से जो अक्षर ,पद और मात्रा में दूषित कहा गया हो उन सब दोषों के लिए मुझे क्षमा कीजिये तथा करुणा कर संसार के दुखो से छुड़वा दीजिये । हे संसार के बंधु जिनेश्वर मैं आपके चरणों की शरण में अपना सब कुछ न्यौछावर, समर्पित करता हूँ, आपके चरणों की शरण के अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं चाहिए! भगवन मेरी अत्यंत कठिन समाधि मरण हो मेरे कर्मों का क्षय हो, सुखकारी रत्न त्रय की प्राप्ति हो ।

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