बाईस परीषह आर्यिका ज्ञानमती

अग्नि शिखा सम क्षुदा वेदना, मुनिजन वन में सहते हैंबेला तेला पक्ष मास का, अनशन कर तप तपते हैंनरक पशुगति क्षुदा वेदना, का नित चिन्तन करते हैंइस विधि आतम चिंतनकर नित, क्षुदा परिषह सहते हैं ॥१॥

कप कप कप कपती रहती, शीत पवन से देह सदातथापि आतम चिंतवन में वे, कहते मम यह काय जुदा ॥शीतकाल में सरिता तट पर, ऋषिगण ध्यान लगाते हैंकर्मिंधन को जला जलाकर, शीत परिषह सहते हैं ॥३॥

दंश मक्षिका की परिषह को, मुनिजन वन में सहते हैंरात समय में खड़े-खड़े वे, आतम चिंत्तवन करते हैं ॥डांस मक्खियां मुनि तन पर जब, कारखून को पीते हैंनहीं उड़ाकर उन जीवों पर, समता रख नित सहते हैं ॥५॥

तन रति तजकर तपरत होकर, मुनि जब वन में रहते हैंक्रूर प्राणिजन सदा मुनि के, निकट उपस्थित रहते हैं ॥तथापि आगमरूपी अमृत, पी मुनि ध्यान लगाते हैंअमृत पीकर निर्भय होकर, अरति परिषह सहते हैं ॥७॥

कंकर पत्थर चुभकर पथ में, घाव बना कर पगतल मेंकमलपत्र सम कोमल पग से, खून बह रहा जंगल में ॥तथापि मुनिजन मुक्तिरमा से, रति रख चलते रहते हैंमुमुक्षु बनकर मोक्षमार्ग में, चर्या परिषह सहते हैं ॥९॥

ध्यान परिश्रम शम करने यति, दो घड़ी निशि में सोते हैंतथापि मन को वश रख निद्रा, एक करवट से लेते हैं ॥तदा मुनि पर महा उपद्रव, वन पशु करते रहते हैंतथापि करवट अविचल रखकर, शय्या परिषह सहते हैं ॥११॥

सघन वनों में व शहरों में, जब मुनि विहार करते हैंदुष्ट जनों के वध बन्धन, ताड़न भी पथ सहते हैं ॥प्राण हरण करने वाले उस, वध परिषह को सहते हैंक्षमता रख मुनि मौन धार कर, कर्म निर्जरा करते हैं ॥१३॥

पक्ष मास का अनशन कर मुनि, गमन नगर में जब करतेअन्नादिक का लाभ नहीं होने, पर तब वापिस आते ॥उस दिन उदराग्नि की पीड़ा, क्षण-क्षण पल-पल में सहतेअहोसाधना पथ पर इस विध, अलाभ परिषह मुनि सहते ॥१५॥

शुष्क पत्र जल कण तन पर, गिरने से खुजली चलती रहतीतथापि मुनिवर नहीं खुजाते, वह तो चलती ही रहती ॥कण-कण कंकर कंटक चुभते, गमन समय में जंगल मेंइस तृण स्पर्श परिषह सह मुनि, कर्म खिपाते पल-पल में ॥१७॥

मुनि की स्तुति नमन प्रशंसा, करना यह सुन है सत्कारआगे रखकर पीछे चलना, पुरस्कार हैं गुण भंडार ॥परन्तु यदि कोई जग मे, स्तुति या विनयादिक नहीं करतेपुरस्कार सत्कार परिषह को, नित तब मुनि है सहते ॥१९॥

अहो सुनो यह ज्ञानहीन मुनि, वृथा जगत में तप तपताकठिन तपस्या करने पर भी, श्रुत में विकास नहीं दिखता ॥इस विध मुनि को मूढमति जन, वचन तिरस्कृत कर कहतेतदा कर्म का पाक समझ, अज्ञान परिषह मुनि सहते ॥२१॥

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