यो अति एकीभाव भयो मानो अनिवारी ।जो मुझ-कर्म प्रबंध करत भव भव दुःख भारी ॥ताहि तिहांरी भक्ति जगतरवि जो निरवारै ।तो अब और कलेश कौन सो नाहिं विदारै ॥१॥
ज्योतीरूपं दुरित-निवहध्वान्त-विध्वंस-हेतुं, त्वामेवाहुर्जिनवर! चिरं तत्त्व-विद्याभियुक्ता:चेतोवासे भवसि च मम स्फार-मुद्भासमान-स्तस्मिन्नंह: कथमिव तमो वस्तुतो वस्तुमीष्टे॥२॥
हे नाथ जब आपको, अतिशय बुद्धि के धारक गणधरादि देवों ने, पापरूपी अंधकार को नाश करने के लिए सूर्य के समान कहा है और आप मेरे मन-मंदिर में अच्छी तरह से प्रकाशमान भी हो रहे हैं, तब उसमें पापरूपी अंधकार कैसे ठहर सकता है ?
आनँद-आँसू वदन धोंय तुम जो चित्त आने ।गदगद सरसौं सुयश मन्त्र पढ़ि पूजा ठानें ॥ताके बहुविधि व्याधि व्याल चिरकाल निवासी ।भाजें थानक छोड़ देह बांबइ के वासी ॥३॥
प्रागेवेह त्रिदिव-भवनादेष्यता भव्यपुण्यात्, पृथ्वी-चक्रं कनकमयतां देव! निन्ये त्वयेदम् ।ध्यानद्वारं मम रुचिकरं स्वान्तगेहं प्रविष्ट-स्तत्किं चित्रं जिन! वपुरिदं यत्सुवर्णीकरोषि ॥४॥
जब कि आपके स्वर्गलोक से माता के गर्भ में आने के छह महीने पहले ही देवों ने इस पृथ्वीमण्डल को सुवर्णमय बना दिया, तो फिर जिसके अन्त:करणरूप मंदिर के ध्यान द्वार द्वारा आप प्रविष्ट हो जाएं उसका शरीर यदि सुवर्णमय हो जाय तो इसमें क्या आश्चर्य है ?
प्रभु सब जग के बिना-हेतु बांधव उपकारी ।निरावरन सर्वज्ञ शक्ति जिनराज तिहांरी ॥भक्ति रचित मम चित्त सेज नित वास करोगे ।मेरे दुःख-संताप देख किम धीर धरोगे ॥५॥
जन्माटव्यां कथमपि मया देव! दीर्घं भ्रमित्वा, प्राप्तैवेयं तव नय-कथा स्फार-पीयूष-वापी ।तस्या मध्ये हिमकर-हिम-व्यूह-शीते नितान्तं,निर्मग्नं मां न जहति कथं दु:ख-दावोपतापा: ॥६॥
हे स्वामिन्! मुझे इस संसाररूप विषम अटवी में भ्रमण करते हुए और दु:खों को सहते हुए अनन्तकाल बीत गया है। अब मुझे बड़े भारी भाग्योदय से यह आपकी स्याद्वादरूप अमृतरस से भरी हुई वापिका बावड़ी प्राप्त हुई है जो चन्द्रमा और बर्फ़ से भी अत्यन्त शीतल है। ऐसी वापिका में उन्मज्जन करते हुए मेरे क्या थोड़े से दु:ख सन्ताप दूर न होंगे?
श्रीविहार परिवाह होत शुचिरुप सकल जग ।कमल कनक आभाव सुरभि श्रीवास धरत पग ॥मेरो मन सर्वंग परस प्रभु को सुख पावे ।अब सो कौन कल्यान जो न दिन-दिन ढिग आवे ॥७॥
पश्यन्तं त्वद्वचनममृतं भक्ति-पात्र्या पिबन्तं, कर्मारण्यात्-पुरुष-मसमानन्द-धाम-प्रविष्टम् ।त्वां दुर्वार-स्मर-मद-हरं त्वत्प्रसादैक-भूमिं, क्रूराकारा: कथमिव रुजा कण्टका निर्लुठन्ति ॥८॥
हे भगवन्! कर्मरूपी वन से निकलकर आपने अनुपम अनंत सुखस्वरूप आनन्दधाम को प्राप्त किया है तथा आप दुर्जय कामदेव के मद को हरण करने वाले हैं। आपको देखने वाले और भक्तिरूपी पात्र से आपके अमृतरूपी वचनों को पाने वाले भव्यपुरुषों को फिर क्रूर आकार वाले रोग रूपमयी काँटे कैसे पीड़ा दे सकते हैं? अर्थात् नहीं दे सकते
मानथंभ पाषान आन पाषान पटंतर ।ऐसे और अनेक रतन दीखें जग अंतर ॥देखत दृष्टि प्रमान मानमद तुरत मिटावे ।जो तुम निकट न होय शक्ति यह क्योंकर पावे ॥९॥
हृद्य: प्राप्तो मरुदपि भवन्मूर्ति-शैलोपवाही, सद्य: पुंसां निरवधि-रुजा धूलिबन्धं धुनोति ।ध्यानाहूतो हृदय-कमलं यस्य तु त्वं प्रविष्ट- स्तस्याशक्य: क इह भुवने देव! लोकोपकार: ॥१०॥
हे नाथ! जबकि आपके शरीर के पास से बहने वाली वायु भी, लोगों के तरह-तरह के रोग दूर कर देती है, तब आप जिस भव्यपुरुष के हृदय में विराजमान हो जाते हैं वह संसार के प्राणियों का कौन सा उपकार नहीं कर सकता-अर्थात् लोक की सच्ची-सजीव सेवा करना अथवा आहार पान, औषधादि के द्वारा दीन दु:खियों की सेवा कर उन्हें दु:ख से उन्मुक्त करना तो सरल है परन्तु जब कोई भद्रमानव जिनेन्द्र भगवान को अपने हृदयवर्ती बना लेता है अर्थात् चैतन्य जिनप्रतिमा को अपने हृदय-कमल में अंकित कर लेता है और स्तुति पूजा-ध्यानादि के द्वारा उनके पवित्र गुणों का स्तवन-पूजन वंदनादि किया करता है एवं उनके नक्शे कदम पर चलकर तदनुकूल प्रवृत्ति करने लगता है तब उस भव्य पुरुष के अनादिकालीन कर्मबंधन भी उसी तरह शिथिल होने लगते हैं जिस तरह चन्दन के वृक्ष पर मोर के आने पर सर्पों के बंधन ढीले पड़ कर नीचे खिसकने लगते हैं
जनम जनम के दुःख सहे सब ते तुम जानो ।याद किये मुझ हिये लगें आयुध से मानों ॥तुम दयाल जगपाल स्वामि मैं शरन गही है ।जो कुछ करनो होय करो परमान वही है ॥११॥
प्रापद्दैवं तव नुति-पदैर्जीवकेनोपदिष्टै:, पापाचारी मरण-समये सारमेयोऽपि सौख्यम् ।क: सन्देहो यदुपलभते वासव-श्री-प्रभुत्वं,जल्पञ्जाप्यैर्मणिभिरमलैस्-त्वन्-नमस्कार-चक्रम् ॥१२॥
जबकि एक पापी कुत्ता भी मृत्यु के समय (न कि जीवन भर) जीवन्धर कुमार द्वारा बताये हुए मंत्राऽक्षरों के ध्यान से यक्षों का स्वामी यक्षेन्द्र हो सकता है तब निर्मल मणियों के द्वारा आपके नमस्कारमंत्र का ध्यान करने वाला भद्र मानव यदि इन्द्र की विभूति को प्राप्त कर ले तो इसमें क्या आश्चर्य है अर्थात् कुछ नहीं है
जो नर निर्मल ज्ञान मान शुचि चारित साधै ।अनवधि सुख की सार भक्ति कूंची नहिं लांघे ॥सो शिव वांछक पुरुष मोक्ष पट केम उघारे ।मोह मुहर दिढ़ करी मोक्ष मंदिर के द्वारै ॥१३॥
प्रच्छन्न: खल्वय-मघ-मयैरन्धकारै: समन्तात्,पन्था मुक्ते: स्थपुटित-पद: क्लेश-गर्तैरगाधै: ।तस्कस्तेन व्रजति सुखतो देव! तत्त्वावभासी,यद्यग्रेऽग्रे न भवति भवद्भारती रत्न-दीप: ॥१४॥
हे देव! मुक्ति का मार्ग मिथ्यात्वरूप अज्ञान अंधकार से व्याप्त है, आच्छादित है और अगाध दु:खरूप गड्ढों से विषम है, दुष्प्रवेश है। ऐसा होने पर भी यदि सप्ततत्त्वों के स्वरूप को प्रकाशित करने वाला अथवा सप्त तत्त्वों के द्वारा मोक्षमार्ग का निरूपण करने वाला-आपकी पवित्र दिव्यध्वनिरूप वाणीरूपी दीपक का प्रकाश आगे-आगे नहीं होता, तो ऐसा कौन पुरुष है जो आपकी वाणीरूप दीपक के प्रकाश के बिना ही उस कंटकाकीर्ण विषम मार्ग से सुखपूर्वक गमन कर सकता है? और अपने इष्टस्थान को सुगमता से प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है अर्थात् कोई नहीं। अस्तु: हे नाथ! आपकी पवित्र वाणीरूपी दीपक के प्रकाश से ही संसारी जीव हेयोपादेयरूप तत्वों का परिज्ञान करते हैं और उसी के अनुकूल आचरण कर कर्मबंधन से छूटने का उपाय करते हैं। अर्थात् मोक्ष के साधक सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को धारण करते हैं उन्हें अपने जीवन में उतारते हैं साथ ही रत्नत्रय की पूर्णता एवं परम प्रकर्षता से ज्ञानावरणादि अष्टकर्मों का समूल नाशकर कृत-कृत्य अवस्था को प्राप्त करते हैं और अनन्तकाल तक उस आत्मोत्थ अव्याबाध निराकुल सुख का अनुभव करते रहते हैं। यह सब वीतराग भगवान की उस दिव्यवाणी का ही माहात्म्य एवं प्रभाव है
कर्म पटल भू माहिं दबी आतम निधि भारी ।देखत अतिसुख होय विमुख जन नाहिं उघारी ॥तुम सेवक ततकाल ताहि निहचै कर धारै ।थुति कुदाल सों खोद बंद भू कठिन विदारै ॥१५॥
प्रत्युत्पन्ना नय-हिमगिरे-रायता चामृताब्धे:, या देव! त्वत्पद-कमलयो: संगता भक्ति-गङ्गाचेतस्तस्यां मम रुचि-वशादाप्लुतं क्षालितांह:, कल्माषं यद्भवति किमियं देव! सन्देह-भूमि:॥१६॥
हे नाथ! स्याद्वादनयरूप हिमालय से निकली और मोक्षरूपी समुद्र तक लम्बी यह आपकी भक्तिरूपी गंगा मुझे बड़े भारी भाग्योदय से प्राप्त हुई है, गंगा में स्नान करने से जिस तरह शरीर का बाह्य मैल धुल जाता है और वह स्वच्छ हो जाता है, उसी प्रकार आपकी भक्तिरूपी गंगा में स्नान करने से, उसमें गोता लगाने से यदि मेरे अन्त:करण की पापरूप कालिका धुलकर मेरा मन पवित्र-राग-द्वेषादि विभावभावों से रहित निर्विकार हो जाये, तो इसमें क्या संदेह है? अर्थात् कुछ नहीं है
तुम शिव सुखमय प्रगट करत प्रभु चिंतन तेरो ।मैं भगवान समान भाव यों वरतै मेरो ॥यदपि झूठ है तदपि त्रप्ति निश्चल उपजावे ।तुव प्रसाद सकलंक जीव वांछित फल पावे ॥१७॥
मिथ्यावादं मल-मपनुदन्सप्तभङ्गी-तरङ्गै-र्वागम्भोधि-र्भुवन-मखिलं देव! पर्येति यस्ते ।तस्यावृत्तिं सपदि विबुधाश्चेतसैवाचलेन,व्यातन्वन्त: सुचिर-ममृतासेवया तृप्नुवन्ति ॥१८॥
हे नाथ! सप्तभंगरूपतरंगों से अथवा अनेकांत के माहात्म्य से शरीरादिक बाह्य पदार्थों में आत्मत्व बुद्धिरूपी जीव के विपरीताभिनिवेश को दूर करने वाले आपके वचन समुद्र का जो भव्य प्राणी निरन्तर अभ्यास मनन एवं परिशीलन करता है अर्थात् आगमोक्त विधि से अभ्यास कर चित्त की निश्चलतारूप परम समाधि को प्राप्त करता है वह शीघ्र ही मोक्ष को प्राप्त करता है और अनन्तकाल तक यहाँ सुख में मग्न रहता है। यह सब आपके वचन समुद्र का ही माहात्म्य है
जो कुदेव छविहीन वसन भूषन अभिलाखे ।वैरी सों भयभीत होय सो आयुध राखे ॥तुम सुंदर सर्वांग शत्रु समरथ नहिं कोई ।भूषन वसन गदादि ग्रहन काहे को होई ॥१९॥
इन्द्र: सेवां तव सुकुरुतां किं तया श्लाघनं ते, तस्यैवेयं भव-लय-करी श्लाघ्यता-मातनोति ।त्वं निस्तारी जनन-जलधे: सिद्धि-कान्ता-पतिस्त्वं,त्वं लोकानां प्रभुरिति तव श्लाघ्यते स्तोत्रमित्थम् ॥२०॥
हे नाथ! इन्द्र आपकी सेवा, वन्दना, पूजा, स्तुति आदि करता है, केवल इसी से आपकी कोई महत्ता और प्रशंसा नहीं हो सकती है, क्योंकि इन्द्र तो आपकी समीचीन भक्ति एवं स्तुति, पूजादि से महान पुण्य का संचय करता है और वह भक्ति उसके लिए भवलयकरी संसार का नाश करने वाली होती है। इसी से वह एक भवावतारी हो जाता है अर्थात् मनुष्य का एक भव धारण करके ही मोक्ष चला जाता है परन्तु आप संसार-समुद्र से स्वयं तरने और तारने वाले हैं और मुक्तिरूपी लक्ष्मी के अधिपति हैं तथा संसार के समस्त जीवों के अकारण बंधु हैं-उन्हें संसार के दु:खों से छुटाने वाले हैं और हेयोपादेयरूप तत्वों का परिज्ञान कराते हैं इसलिए आप उनके प्रभु हैं, आपने जिस उच्च आदर्श को प्राप्त किया है वही संसारी जीवों के द्वारा प्राप्त करने योग्य हैं, इन्हीं सब कारणों से आपकी महत्ता एवं प्रभुता संसार में प्रकट होती है
वचन जाल जड़ रुप आप चिन्मूरति झांई ।तातैं थुति आलाप नाहिं पहुंचे तुम तांई ॥तो भी निर्फल नाहिं भक्ति रस भीने वायक ।संतन को सुर तरु समान वांछित वरदायक ॥२१॥
कोपावेशो न तव न तव क्वापि देव! प्रसादो,व्याप्तं चेतस्तव हि परमोपेक्षयै-वानपेक्षम् ।आज्ञावश्यं तदपि भुवनं सन्निधि-र्वैर-हारी,क्वैवं भूतं भुवन-तिलक! प्राभवं त्वत्परेषु ॥२२॥
हे नाथ! आपको न किसी से राग और न द्वेष, आप न किसी पर प्रसन्न ही होते हैं और न किसी को अपने क्रोध का भाजन ही बनाते हैं, क्योंकि आप परम वीतरागी हैं, राग-द्वेषादि के अभावरूप परम उपेक्षाभाव को अंगीकार किए हुए हैं परन्तु फिर भी, आपकी आज्ञा त्रैलोक्यवर्ती जीवों के द्वारा मान्य है तथा आपकी समीपता वैर-विरोध का नाश करने वाली है। साथ ही, आपकी प्रशांत मुद्रा मुमुक्षु जीवों के लिए साक्षात् मोक्षमार्ग को प्रकट करती है, उसके ध्यान एवं चिंतन से भव्यात्मा आत्मा के वास्तविक स्वरूप का परिज्ञान करते हैं और उसी तरह चैतन्य जिनप्रतिमा बनने का अभ्यास करते हैं अतएव जैसा प्रभाव आपका है वैसा अन्य हरिहरादिक देवों का कहाँ हो सकता है? क्योंकि वे रागी-द्वेषी हैं, अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर अनुग्रह करते हैं और निंदकों पर रुष्ट होते हैं उन्हें शाप दे देते हैं परन्तु हे देव! ये सब बातें आप में नहीं हैं, पूजक और निन्दकों पर आपका समान भाव रहता है क्योंकि आप जिन हैं, इन सब विकारों को जीत चुके हैं अत: आप जैसा प्रभाव अन्य किसी भी देवी-देवता का नहीं हो सकता है
सुरतिय गावें सुजश सर्वगत ज्ञान स्वरुपी ।जो तुमको थिर होहिं नमैं भवि आनंद रुपी ॥ताहि छेमपुर चलन वाट बाकी नहिं हो हैं ।श्रुत के सुमरन माहिं सो न कबहूं नर मोहै ॥२३॥
चित्ते कुर्वन्निरवधि-सुख-ज्ञान-दृग्वीर्य-रूप, देव! त्वां य: समय-नियमादाऽऽदरेण स्तवीति ।श्रेयोमार्गं स खलु सुकृती तावता पूरयित्वा,कल्याणानां भवति विषय: पञ्चधा पञ्चितानाम् ॥२४॥
अनन्तचतुष्टयस्वरूप हे नाथ! जो भव्य पुरुष आपका आदरपूर्वक भक्ति से स्तवन करता है, वह पुण्यात्मा पंचकल्याणकों का पात्र होता हुआ मोक्षमार्ग का नेता होता है
अहो जगत पति पूज्य अवधि ज्ञानी मुनि हारे ।तुम गुन कीर्तन माहिं कौन हम मंद विचारे ॥थुति छल सों तुम विषै देव आदर विस्तारे ।शिव सुख-पूरनहार कलपतरु यही हमारे ॥२५॥
(स्वागता छंद)वादिराजमनु शाब्दिक-लोको, वादिराजमनु तार्किक-सिंह:वादिराजमनु काव्यकृतस्ते, वादिराजमनु भव्य-सहाय: ॥२६॥