भज ऋषिपति

भज ऋषिपति ऋषभेश जाहि नित, नमत अमर असुरा ।

मनमथ-मथ दरसावन शिव-पथ, वृष-रथ-चक्र-धुरा ॥1॥

जा प्रभु गर्भ छ-मास पूर्व सुर, करी सुवर्ण धरा ।

जन्मत सुरगिरि धर सुरगण युत, हरि पय-न्हवन करा ॥2॥

नटत नृत्यकी विलय देख प्रभु, लहि विराग सु थिरा ।

तबहि देवऋषि आय नाय शिर, जिन पद पुष्प धरा ॥3॥

केवल समय जास वच-रवि ने, जगभ्रम-तिमिर हरा ।

सुदृग-बोध-चारित्र-पोत लहि, भवि भव-सिन्धु तरा ॥4॥

योग संहार निवार शेष विधि, निवसे वसुम धरा ।

'दौलत' जे याको जस गावें, ते ह्वैं अज अमरा ॥5॥

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