सब मिल देखो हेली

सब मिल देखो हेली म्हारी हे, त्रिसलाबाल वदन रसाल ॥टेक॥

आये जुतसमवसरन कृपाल, विचरत अभय व्याल मराल,

फलित भई सकल तरूमाल ॥

सब मिल देखो हेली म्हारी हे, त्रिसलाबाल वदन रसाल ॥१॥

नैन न हाल भृकुटी न चाल, वैन विदार विभ्रम जाल,

छवि लखि होत संत निहाल ॥

सब मिल देखो हेली म्हारी हे, त्रिसलाबाल वदन रसाल ॥२॥

वंदन काज साज समाज, संग लिये स्वजन पुरजन वाज,

श्रेणिक चलत है नरपाल ॥

सब मिल देखो हेली म्हारी हे, त्रिसलाबाल वदन रसाल ॥३॥

यों कहि मोदजुत पुरबाल, लखन चाली चरम जिनाल,

'दौलत' नमत धर धर भाल ॥

सब मिल देखो हेली म्हारी हे, त्रिसलाबाल वदन रसाल ॥४॥

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