ऐसैं यों प्रभु पाइये

ऐसैं यों प्रभु पाइये, सुन पंडित प्रानी ।

ज्यों मथि माखन काढिये, दधि मेल मथानी ॥टेक॥

ज्यों रसलीन रसायनी, रसरीति अराधै ।

त्यों घट में परमारथी, परमारथ साधै ॥१॥

जैसे वैद्य विथा लहै, गुण दोष विचारै ।

तैसे पंडित पिंड की, रचना निरवारै ॥२॥

पिंड स्वरूप अचेत है, प्रभुरूप न कोई ।

जाने माने रवि रहै, घट व्यापक सोई ॥३॥

चेतन लच्छन जीव है, जड लच्छन काया ।

चंचल लच्छन चित्त है, भ्रम लच्छन माया ॥४॥

लच्छन भेद विलोकिये, सुविलच्छन वेदै ।

सत्त-सरूप हिये धरै, भ्रमरूप उछेदै ॥५॥

ज्यों रज सोधै न्यारिया, धन सौ मनकीलै ।

त्यों मुनिकर्म विपाक में, अपने रस झीलै ॥६॥

आप लखै जब आपको, दुविधा पद मेटै ।

सेवक साहिब एक हैं, तब को किहि भेंटे ॥७॥

Commentary (अर्थ)

अर्थ : हे ज्ञानी पंडित ! ईश्वर की प्राप्ति इस तरह होती है जैसे दही में मथानी डालकर उसको मथकर मक्खन निकाला जाता है ।

जैसे रस में मग्न हुया रसायनी रस की आराधना करता हुआ रसायन को पाता है। उसी तरह ईश्वर को प्राप्त करनेवाला भव्य जीव अपने घट में अपनी ही साधना करता है। और जिस समय आप में अपने आपका निरीक्षण करता है उसी समय वह खुद ही ईश्वर बन जाता है ॥1॥

मन की दुविधा नष्ट हो जाती है और साहिब और सेवक एक हो जाते है तब कौन किसकी भेंट करें। हे मूर्ख ! ईश्वर की प्राप्ति इस तरह नहीं होती है। अरे! तू कहाँ भटक रहा है ॥7॥

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