अब थे क्यों दुख पावो

अब थे क्यों दुख पावो रे जियरा, जिनमत समकित धारौ ॥टेक॥

निलज नारि सुत व्यसनी मूरख, किंकर करत विगारो ।

सा नूम अब देखत भैया, केसे करत गुजारौ ॥१॥

वाय पित्त कफ खांसी तन दृग, दीसत नाहिं उजारौ ।

करजदार अह वेरुजगारी, कोऊ नाहिं सहारौ ॥२॥

इत्यादिक दुख सहज जानियो, सुनियौ अब विस्तारौ ।

लख चौरासी अनंत भवनलौं, जनम मरन दुख भारौं ॥३॥

दोषरहित जिनवर पद पूजौ गुरु निरग्रंथ विचारौ ।

'बुधजन' धर्म दया उर धारौ, ह-ह जैकारो ॥४॥

निलज=निर्लज्ज; दृग=आंख; दीसत=दिखाई देना; वेरुजगारी=बेगारी; भवनलौं=भवों तक; ह-ह=होगा

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