आदिनाथ तारन तरनं

राग : गौरीतर्ज : रघुपति राघव राजा

आदिनाथ तारन तरनं ।

नाभिराय मरुदेवी नन्दन, जनम अयोध्या अघहरनं ॥टेक॥

कलपवृच्छ गये जुगल दुखित भये, करमभूमि विधिसुखकरनं ।

अपछर नृत्य मृत्य लखि चेते, भव तन भोग जोग धरनं ॥

आदिनाथ तारन तरनं ॥१॥

कायोत्सर्ग छमास धर्यो दिढ़, वन खग मृग पूजत चरनं ।

धीरजधारी वरसअहारी, सहस वरस तप आचरनं ॥

आदिनाथ तारन तरनं ॥२॥

करम नासि परगासि ज्ञानको, सुरपति कियो समोसरनं ।

सब जन सुख दे शिवपुर पहुँचे, 'द्यानत' भवि तुम पद शरनं ॥

आदिनाथ तारन तरनं ॥3॥

Commentary (अर्थ)

अर्थ : हे भगवान आदिनाथ! आप स्व व पर को अर्थात् सबको तारनेवाले हैं। पापों का नाश करने के लिए आपका जन्म अयोध्या नगरी में नाभिराय व मरुदेवी के पुत्र के रूप में हुआ।

काल की गति व परिणमन के कारण कल्पवृक्ष लुप्त हो गए. इसमें जो जुगलिया उत्पन्न हुए वे दुःखी हो गए। तब आपने कर्मभूमि में जीवन-निर्वाह की सुखकारी विधि बताई / अप्सरा नीलांजना की नृत्य करते समय हुई मृत्यु को देखकर उससे वस्तु-स्वरूप को जानकर आपको संसार से वैराग्य हो गया और आप भव (संसार), तन व उसके भोग से विरक्त हो गए।

वन में जाकर छह माह का कायोत्सर्ग तप किया। तब वहाँ पशु-पक्षी सब आपके चरणों की वंदना करते थे। आप धैर्यवान थे । आपने एक वर्ष के अन्तराल पर आहार ग्रहण किया और सहस्र वर्षों तक तप-साधन किया।

कर्मों का नाशकर ज्ञान का प्रकाश किया अर्थात् केवलज्ञान प्रकट किया, तब इन्द्र ने समवसरण की रचना की । आप सभी भव्यजनों को अत्यन्त आनंदित करते हुए मोक्ष पधारे। द्यानतराय कहते हैं कि भव्यजन आपके चरणों की शरण ग्रहण करते हैं।

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