और ठौर क्‍यों हेरत प्यारा

और ठौर क्‍यों हेरत प्यारा, तेरे हि घट में जाननहारा ॥टेक॥

चलन हलन थल वास एकता, जात्यान्तर तैं न्यारा न्‍यारा ॥१॥

मोह उदय रागी-द्वेषी ह्वै, क्रोधादिक का सरजन हारा ।

भ्रमत फिरत चारों गति भीतर, जनम-मरन भोगत दुख भारा ॥२॥

गुरु उपदेश लखैं पद आपा, तबहिं विभाव करै परिहारा ।

ह्वै एकाकी 'बुधजन' निश्चल, पावै शिवपुर सुखद अपारा ॥३॥

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