कोई जब साथ न आये

तर्जः कोई जब राह न पाये - दोस्ती

कोई जब साथ न आये, ना संग में जाये ।

तो फिर क्यों प्रीत बढ़ाये, झूठी ममता में पड़ यार ॥टेक॥

तू तेरा ले रूप पिछान, तन तेरा नही है नादान ।

काया है पुद्गल, तू चेतन है, मान ।

ज्ञाता-दृष्टा कहलाये, क्यों बोध भुलाये ॥

तो फिर क्यों प्रीत बढ़ाये, झूठी ममता में पड़ यार ॥1॥

अब भी समय है प्यारे मान, पुण्य घड़ी मत बिसर अजान ।

आतम निधि यह, शिव सुख खान ।

जीवन सार कमाले 'सौभाग्य' पद पाले ॥

तो फिर क्यों प्रीत बढ़ाये, झूठी ममता में पड़ यार ।

कोई जब साथ न आये, ना संग में जाये ॥2॥

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