चेतन रूप अनुप अमूरत

चेतनरूप अनूप अमूरत, सिद्ध समान सदा पद मेरो ॥टेक॥

मोह महातम आतम अंग कियो, परसंग महातम-घेरो ॥१॥

ज्ञानकला उपजी अब मोहि, कहूँ गुण नाटक आगम केरो ॥२॥

जासु प्रसाद सधे शिव मारग, वेगि मिटे भववास बसेरो ॥३॥

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