जगत में होनहार सो होवै

राग : आसावरी

जगत में होनहार सो होवै, सुर नृप नाहि मिटावै ॥टेक॥

आदिनाथ से कौ भोजन में, अन्तराय उपजावै ।

पारसप्रभु कौं ध्यान लीन लखि कमठ मेघ बरसावै ॥

जगत में होनहार सो होवै, सुर नृप नाहि मिटावै ॥१॥

लक्ष्मन से सग भ्राता जाके, सीता राम गमावै ।

प्रतिनारायण रावण से की, हनुमत लंक जरावै ॥

जगत में होनहार सो होवै, सुर नृप नाहि मिटावै ॥२॥

जैसो कमावै तैसो ही पावै, यो 'बुधजन' समझावै ।

आप आपकौ आप कमावो, क्यो परद्रव्य कमावै ॥

जगत में होनहार सो होवै, सुर नृप नाहि मिटावै ॥३॥

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