जानौं पूरा ज्ञाता सोई

जानौं पूरा ज्ञाता सोई ॥टेक॥

रागी नाहीं रोषी नाहीं, मोही नाहीं होई ॥

क्रोधी नाहीं मानी नाहीं, लोभी धी ना ताकी ।

ज्ञानी ध्यानी दानी जानी, बानी मीठी जाकी ॥

जानौं पूरा ज्ञाता सोई ॥१॥

सांई सेती सच्चा दीसै, लोगों का प्यारा ।

काहू जीका दोषी नाहीं, नीका पैंडा धारा ॥

जानौं पूरा ज्ञाता सोई ॥२॥

काया सेती माया सेती, जो न्यारा है भाई ।

'द्यानत' ताको देखै जाने, ताहीसों लौ लाई ॥

जानौं पूरा ज्ञाता सोई ॥३॥

Commentary (अर्थ)

अर्थ : हे प्राणी, उसे ही पूर्ण ज्ञानी जानी जो रागी नहीं है, द्वेषी नहीं है, जो मोही नहीं है ।

जिसके क्रोध नहीं है, मान नहीं है, लोभ की बुद्धि नहीं है । जो ज्ञानी है, ध्यानी है, दानी है (अभयदान करनेवाला है) और जिसकी सबको प्रिय लगनेवाली और सबका कल्याण करनेवाली मीठी वाणी है ।

जो परमात्मा के जितना / जैसा सच्चा / निर्मल दिखाई दे, जो सब लोगों को प्यारा लगे । जो किसी जीव की विराधना का दोषी नहीं है, उसे ही पूर्ण ज्ञानी जानो, उनका पदानुगमन / अनुसरण ही उचित है ।

जो काया से और माया से, सबसे न्यारा है, चैतन्य रूप है । द्यानतराय कहते हैं कि उसको देखो, उसको जानो, उसके गुणों को जानो, उससे लौ लगाओ, उसका हो अनुसरण करो, उसके प्रति भक्ति से समर्पित होवो ।

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