निरख सखी ऋषिन

निरख सखी ऋषिन को ईश यह ऋषभ जिन,

परखि कैं स्व-पर परसौंज छारी ॥

नैन नाशाग्र धरि, मैन विनसाय कर,

मौनयुत स्वास दिशि सुरभिकारी ॥

धरासम क्षांतियुत, नरामरखचर-नुत,

वियुत रागादि मद दुरित हारी ।

जास क्रम पास भ्रम नाश पंचास्य-मृग,

वास करि प्रीति की रीति धारी ॥

ध्यान-दौं माहिं विधि-दारु प्रजराहिं,

शिर केश शुभ किधों धूवाँ विथारी ।

फँसे जगपंक जन रंक तिन काढ़ने,

किधों जगनाह बाँह प्रसारी ॥

तप्त हाटक वरण, वसन विन आभरण,

खरे थिर ज्यों शिखर मेरुकारी ।

'दौल' को देन शिवधौल जगमौल जे,

तिन्हें कर जोर वन्दना हमारी ॥

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