मंगल थाल सजाकर, मंगल दीप जलाकर
पारस प्रभु की बोल जय-जय, मंगल वाद्य बजाकर ॥टेक॥
मन की कलियाँ निकस गई हैं, पारस प्रभु के दर्शन से ।
मनता पूर्ण हुई है मेरी, चिंतामणि पद वंदन से ॥
मंगल थाल सजाकर, मंगल दीप जलाकर
पारस प्रभु की बोल जय-जय, मंगल वाद्य बजाकर ॥१॥
आज जगा सौभाग्य हमारा, जिनमंदिर में आकर ।
सुंदर मूरति तरु तट सोहे, छत्र-त्रय फैराने से ।
सुमन, सुवृष्टि करे देवगण, मंगल वाद्य बजाकर ॥
मंगल थाल सजाकर, मंगल दीप जलाकर
पारस प्रभु की बोल जय-जय, मंगल वाद्य बजाकर ॥२॥
चौसठ चँवर ढुरावे सुरगण, मधुर गुण गाने से ।
मनहर नृत्य करे किन्नरियां, नूपुरों की झंकारों से
बीन मंजीरा शंख झल्लरी, सुर टाई ताल बजाकर ॥
मंगल थाल सजाकर, मंगल दीप जलाकर
पारस प्रभु की बोल जय-जय, मंगल वाद्य बजाकर ॥३॥