रुल्यो चिरकाल

राग : सोठ कड़खातर्ज : अपनी सुधि भूल आप

रुल्यो चिरकाल, जगजाल चहुँगति विषैं,

आज जिनराज-तुम शरन आयो ॥टेक॥

सह्यो दुख घोर, नहिं छोर आवै कहत,

तुमसौं कछु छिप्यो नहिं तुम बतायो ॥1॥

तु ही संसारतारक नहीं दूसरो,

ऐसो मुह भेद न किन्हीं सुनायो ॥2॥

सकल सुर असुर नरनाथ बंदत चरन,

नाभिनन्दन निपुन मुनिन ध्यायो ॥

रुल्यो चिरकाल, जगजाल चहुँगति विषैं,

आज जिनराज-तुम शरन आयो ॥3॥

तु ही अरहन्त भगवन्त गुणवन्त प्रभु,

खुले मुझ भाग अब दरश पायो ॥4॥

सिद्ध हौं शुद्ध हौँ बुद्ध अविरुद्ध हौं,

ईश जगदीश बहु गुणनि गायो ॥

रुल्यो चिरकाल, जगजाल चहुँगति विषैं,

आज जिनराज-तुम शरन आयो ॥5॥

सर्व चिन्ता गई बुद्धि निर्मल भई,

जब हि चित जुगलचरननि लगायो ॥६॥

भयो निहचिन्त 'द्यानत' चरन शर्न गहि,

तार अब नाथ तेरो कहायो ॥

रुल्यो चिरकाल, जगजाल चहुँगति विषैं,

आज जिनराज-तुम शरन आयो ॥7॥

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