रे भाई करुना जान रे

राग : धमाल

रे भाई! करुना जान रे ॥टेक॥

सब जिय आप समान हैं रे, घाट बाध नहिं कोय ।

जाकी हिंसा तू करै रे, तेरी हिंसा होय ॥

रे भाई! करुना जान रे ॥१॥

छह दरसनवाले कहैं रे, जीवदया सरदार ।

पालै कोई एक है रे, कथनी कथै हजार ॥

रे भाई! करुना जान रे ॥२॥

आधे दोहे में कहा रे, कोटि ग्रंथ को सार ।

परपीड़ा सो पाप है रे, पुन्य सु परउपगार ॥

रे भाई! करुना जान रे ॥३॥

सो तू परको मति कहै रे, बुरी जु लागै तोय ।

लाख बात की बात है रे, 'द्यानत' ज्यों सुख होय ॥

रे भाई! करुना जान रे ॥४॥

Commentary (अर्थ)

अर्थ : अरे भाई! तू करुणाभाव, दयाभाव को जान ।

सारे जीव तेरे ही समान हैं, ऐसा समझ, ऐसा मान । उन जीवों में तुझसे कोई कमी अथवा बढ़ती नहीं है। जिनकी तू हिंसा करता है, उससे तेरे ही अपने सद्भावों की हिंसा होती है ।

*छहों दर्शन कहते हैं कि जीवदया ही सर्वोपरि है। हजारों लोग यही कहते हैं पर इसका पालन कोई बिरला ही / एक ही करता है ।

इस आधे दोहे में ही कि 'दूसरों को पीड़ा पहुँचाना पाप है'- करोड़ों ग्रंथों का सार कहा गया है। दूसरे के उपकार की भावना करना ही पुण्य है ।

जो बात तुझे स्वयं को बुरी लगती है, वह तू दूसरे को मत कह । द्यानतराय कहते हैं कि लाख बातों में मुख्य बात एक यह ही है जिससे सुख होता है ।

* सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त । इनके प्रणेता कपिल, पतंजलि, गौतम, कणाद, जैमिनि और बादरायण थे ।

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