हमारी वीर हरो भवपीर

तर्ज : मान न कीजिए ओ परवीन

हमारी वीर हरो भवपीर ॥टेक॥

मैं दुख-तपित दयामृतसर तुम, लखि आयो तुम तीर ।

तुम परमेश मोखमगदर्शक, मोहदवानलनीर ॥

हमारी वीर हरो भवपीर ॥१॥

तुम विनहेत जगतउपकारी, शुद्ध चिदानंद धीर ।

गनपतिज्ञान-समुद्र न लंघै, तुम गुनसिंधु गहीर ॥

हमारी वीर हरो भवपीर ॥२॥

याद नहीं मैं विपत सही जो, धर-धर अमित शरीर ।

तुम गुन-चिंतत नशत तथा भय, ज्यों घन चलत समीर ॥

हमारी वीर हरो भवपीर ॥३॥

कोटवारकी अरज यही है, मैं दुख सहूं अधीर ।

हरहु वेदना फन्द 'दौलको', कतर कर्म जंजीर ॥

हमारी वीर हरो भवपीर ॥४॥

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