आर्यिका-ज्ञानमती
न्याय (आप्त-मीमांसा)
सर्वथा एकांतवाद प्रमाण से बाधित है
त्वन्मतामृतबाह्यानां, सर्वथैकांतवादिनाम्
आप्ताभिमानदग्धानां, स्वेष्टं दृष्टेन बाध्यते ॥७॥
अन्वयार्थ : [सर्वथैकांतवादिनां] वस्तु के एक-एक धर्म को सर्वथारूप से स्वीकार करने वाले एकांतवादी जन [त्वन्मतामृतबाह्यानां] जो कि आपके मतरूपी अमृत से बहिर्भूत हैं [आप्ताभिमानदग्धानां] और जो 'मैं आप्त हूँ' इस प्रकार के अभिमान से दग्ध हैं [स्वेष्टं दृष्टेन बाध्यते] उनका जो अपना इष्ट-मत है, वह प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित है ॥७॥
टीका :
आर्यिका-ज्ञानमती
आर्यिका-ज्ञानमती
प्रभु तव मत अमृत से बाहर, दुराग्रही-एकांतमती
'मैं हूँ आप्त' सदा इस मद से, दग्ध हुए अज्ञानमती
उनका वह ऐकांतिक शासन, इष्ट उन्हें फिर भी बाधित
प्रत्यक्षादि प्रमाणों से वह, तत्त्व सदा निन्दित दूषित
हे भगवन् ! आपके मत रूप अमृत से जो बहिर्भूत हैं सर्वथा एकांतरूप मत को कहने वाले हैं और 'मैं ही आप्त हूँ' इस प्रकार के अभिमान से जो दग्ध हैं उनका इष्ट-मत प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित होता है ॥७॥