(दोहा)परम-ज्योति परमात्मा, परम-ज्ञान परवीनवंदूँ परमानंदमय घट-घट-अंतर-लीन ॥(चौपाई)निर्भयकरन परम-परधान, भव-समुद्र-जल-तारन-यानशिव-मंदिर अघ-हरन अनिंद, वंदूं पार्श्व-चरण-अरविंद ॥
यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाम्बुराशेः,स्तोत्रं सुविस्तृत-मतिर्न विभुर्विधातुम् ।तीर्थेश्वरस्य कमठ-स्मय-धूमकेतोस्-तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये ॥२॥
[गरिमाम्बुराशे:] गौरव के समुद्र [यस्य] जिन पार्श्वनाथ की [स्तोत्रम्] स्तुति, [विधातुम्] करने के लिए [स्वयं सुरगुरु:] खुद बृहस्पति भी [सुविस्तृतमति] विस्तृत बुद्धि वाले [विभु-] समर्थ (न अस्ति) नहीं हैं, [कमठस्मयधूमकेतो:] कमठ का मान भस्म करने के लिए अग्निस्वरूप [तस्य] उन [तीर्थेश्वरस्य] पार्श्वनाथ भगवान की [किल] आश्चर्य है कि [एष: अहम्] यह मैं [संस्तवनम्] स्तुति [करिष्ये] करूँगा ।
प्रभु-स्वरूप अति-अगम अथाह, क्यों हम-सेती होय निवाहज्यों दिन अंध उल्लू को होत, कहि न सके रवि-किरण-उद्योत ॥
मोह-क्षयादनुभवन्नपि नाथ मर्त्योनूनं गुणान्गणयितुं न तव क्षमेत ।कल्पान्त-वान्त-पयसः प्रकटोऽपि यस्मान्-मीयेत केन जलधेर्ननु रत्नराशिः ॥४॥
[नाथ!] हे पाश्र्वनाथ! [मत्र्य:] मनुष्य [मोहक्षयात्] मोहनीय कर्म के क्षय से [अनुभवन् अपि] अनुभव करता हुआ भी [तव] आपके [गुणान्] गुणों को [गणयितुम्] गिनने के लिए [नूनम्] निश्चय करके [न क्षमेत] समर्थ नहीं हो सकता है । [यस्मात्] क्योंकि [कल्पान्तवान्तपयस:] प्रलय काल के समय जिसका जल बाहर हो गया है, ऐसे [जलधे:] समुद्र की [प्रकट: अपि] प्रकट हुई भी [रत्नराशि:] रत्नों की राशि [ननु केन मीयेत] किसके द्वारा गिनी जा सकती है?
तुम असंख्य निर्मल गुणखान, मैं मतिहीन कहूँ निज बानज्यों बालक निज बाँह पसार, सागर परमित कहे विचार ॥
ये योगनामपि न यान्ति गुणास्तवेश !वक्तुं कथं भवति तेषु ममावकाशः ?जाता तदेवमसमीक्षित-कारितेयं,जल्पन्ति वा निज-गिरा ननु पक्षिणोऽपि ॥६॥
[ईश!] हे स्वामिन्! [तव] आपके [ये गुणा:] जो गुण [योगिनाम् अपि] योगियों को भी [वत्तुम्] कहने के लिए [न यान्ति] नहीं प्राप्त होते [तेषु] उनमें [मम] मेरा [अवकाश:] अवकाश [कथम् भवति] कैसे हो सकता है? [तत्] इसलिए [एवम्] इस प्रकार [इयम्] मेरा यह [असमीक्षितकारिता जाता] बिना विचारे काम करता हुआ [वा] अथवा [पक्षिण: अपि] पक्षी भी [निजगिरा] अपनी वाणी से [जल्पन्तिननु] बोला करते हैं ।
तुम जस-महिमा अगम अपार, नाम एक त्रिभुवन-आधारआवे पवन पदमसर होय, ग्रीषम-तपन निवारे सोय ॥
हृद्वर्तिनि त्वयि विभो ! शिथिलीभवन्ति,जन्तोः क्षणेन निबिडा अपि कर्म-बन्धाःसद्यो भुजंगममया इव मध्य-भाग-मभ्यागते वन-शिखण्डिनि चन्दनस्य ॥८॥
[विभो!] हे पार्श्वनाथ! [त्वयि] आपके [हृद्वर्तिनि] हृदय में रहते हुए [जन्तो:] जीवों के [निविडा: अपि] सघन भी [कर्म-बंधा:] कर्मों के बंधन [क्षणेन] क्षण भर में [वन शिखण्डिनि] वन मयूर के [चन्दनस्य मध्यभागम् अभ्यागते 'सत'] चन्दन तरु के बीच में आने पर [भुजंगममया इव] सर्पों की कुण्डलियों के समान [सद्य:] शीघ्र ही [शिथिली भवन्ति] ढीले हो जाते हैं ।
तुम निरखत जन दीनदयाल, संकट तें छूटें तत्कालज्यों पशु घेर लेहिं निशि चोर, ते तज भागहिं देखत भोर ॥
त्वं तारको जिन ! कथं भविनां त एवत्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्तः ।यद्वा दृतिस्तरति यज्जलमेष नून-मन्तर्गतस्य मरुतः स किलानुभावः ॥१०॥
[जिन!] हे जिनेन्द्रदेव! [त्वम् भविनाम् तारक: कथम्] आप संसारी जीवों के तारने वाले कैसे हो सकते हैं? [यत्] क्योंकि [उत्तरन्त:] संसार-समुद्र से पार होते हुए [ते एव] वे ही [हृदयेन] हृदय से [त्वम्] आपको [उद्वहन्ति] तिरा ले जाते हैं [यद्वा] अथवा ठीक है कि [दृति:] मसक [यत्] जो [जलम् तरति] पानी में तैरती है, [स: एष:] वह [नूनम्] निश्चय से [अन्तर्गतस्य] भीतरस्थित [मरुत:] हवा का ही [अनुभाव: किल] प्रभाव है ।
जिहँ सब देव किये वश वाम, तैं छिन में जीत्यो सो कामज्यों जल करे अगनि-कुल हान, बडवानल पीवे सो पान ॥
स्वामिन्ननल्प-गरिमाणमपि प्रपन्नास्त्वां जन्तवः कथमहो हृदये दधानाः ।जन्मोदधिं लघु तरन्त्यतिलाघवेनचिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभावः ॥१२॥
[स्वामिन्!] हे प्रभो! [अहो] आश्चर्य है कि [अनल्पगरिमाणम् अपि] अधिक गौरव से युक्त भी विरोध पक्ष में अत्यन्त वजनदार [त्वाम्] आपको [प्रपन्ना:] प्राप्त हो [हृदये दधाना:] हृदय में धारण करने वाले [जन्तव:] प्राणी [जन्मोदधिम्] संसार समुद्र को [अति लाघवेन] बहुत ही लघुता से [कथम्] कैसे [लघु] शीघ्र [तरन्ति] तर जाते हैं । [यदि वा] अथवा [हन्त] हर्ष है कि [महताम्] महापुरुषों का [प्रभाव:] प्रभाव [चिन्त्य:] चिन्तवन के योग्य [न भवति] नहीं होता है ।
क्रोध-निवार कियो मन शांत, कर्म-सुभट जीते किहिं भाँतयह पटुतर देखहु संसार, नील वृक्ष ज्यों दहै तुषार ॥
त्वां योगिनो जिन ! सदा परमात्मरूप-मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुज-कोश-देशे ।पूतस्य निर्मल-रुचेर्यदि वा किमन्य-दक्षस्य सम्भव-पदं ननु कर्णिकायाः ॥१४॥
[जिन!] हे पार्श्वनाथ! [योगिन:] ध्यान करने वाले मुनीश्वर [सदा] हमेशा [परमात्मरूपम्] परमात्मस्वरूप [त्वाम्] आपको [हृदयाम्बुजकोषदेशे] अपने हृदयरूपी कमल के मध्य भाग में [अन्वेषयन्ति] खोजते हैं । [यदि वा] अथवा ठीक है कि [पूतस्य] पवित्र और [निर्मल-रुचे:] निर्मल कान्तिवाले [अक्षस्य] कमल के बीज का अथवा शुद्धात्मा का [संभवपदम्] उत्पत्ति स्थान अथवा खोज करने का स्थान [कर्णिकाया: अन्यत्] कमल की डण्ठल को छोड़कर [अन्यत् किम् ननु] दूसरा क्या हो सकता है?
जब तुव ध्यान धरे मुनि कोय, तब विदेह परमातम होयजैसे धातु शिला-तनु त्याग, कनक-स्वरूप धवे जब आग ॥
अन्तः सदैव जिन ! यस्य विभाव्यसे त्वंभव्यैः कथं तदपि नाशयसे शरीरम् ।एतत्स्वरूपमथ मध्य-विवर्तिनो हियद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावाः ॥१६॥
[जिन!] हे जिनेन्द्र! [भव्यै:] भव्यजीवों के द्वारा [यस्य] जिस शरीर के [अन्त:] भीतर [त्वम्] आप [सदैव] हमेशा [विभाव्यसे] ध्याये जाते हों [तत्] उस [शरीरम् अपि] शरीर को भी आप [कथम्] क्यों [नाशयसे] नष्ट करा देते हैं? [अथ] अथवा [एतत्स्वरूपम्] यह स्वभाव ही है [यत्] कि [मध्यविवर्तिन:] बीच में रहने वाले और रागद्वेष से रहित [महानुभावा:] महापुरुष [विग्रहम्] विग्रह-शरीर और द्वेष को [प्रशमयन्ति] शान्त करते हैं ।
करहिं विबुध जे आतमध्यान, तुम प्रभाव तें होय निदानजैसे नीर सुधा अनुमान, पीवत विष विकार की हान ॥
त्वामेव वीत-तमसं परवादिनोऽपिनूनं विभो हरि-हरादि-धिया प्रपन्नाः ।किं काच-कामलिभिरीश सितोऽपि शङ्खोनो गृह्यते विविध-वर्ण-विपर्ययेण ॥१८॥
[विभो!] हे पार्श्वनाथ! [परवादिन: अपि] अन्यमतावलम्बी पुरुष भी [वीत-तमसम्] अज्ञान अंधकार से रहित [त्वाम् एव] आपको ही [नूनम्] निश्चय से [हरिहरादिधिया] विष्णु महादेव आदि की कल्पना से [प्रपन्ना:] पूजते हैं । [किम्] क्या [ईश] हे विभो! [काचकामलिभि:] जिनकी आँख पर रंगदार चश्मा है, अथवा जिन्हें पीलिया रोग हो गया है ऐसे पुरुषों द्वारा [शंखसित: अपि] शंख सफेद होने पर भी [विविधवर्णविपर्ययेण] तरह-तरह के विपरीत वर्णों से [नो गृह्यते] नहीं ग्रहण किया जाता है ?
(दोहा)निकट रहत उपदेश सुन, तरुवर भयो 'अशोक'ज्यों रवि ऊगत जीव सब, प्रगट होत भुविलोक ॥
चित्रं विभो कथमवाङ्गमुख-वृन्तमेवविष्वक्पतत्यविरला सुर-पुष्प-वृष्टिः ।त्वद्-गोचरे सुमनसां यदि वा मुनीशगच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि ॥२०॥
[विभो!] हे जिनेन्द्र [चित्तम्] आश्चर्य है कि [विष्वक्] सब ओर [अविरला] व्यवधान रहित [सुरपुष्पवृष्टि:] देवों के द्वारा की हुई फूलों की वर्षा [अवाङ्मुखवृन्तम्] नीचे को बंधन करके ही [कथम्] क्यों [पतति] पड़ती है? [यदि वा] अथवा [मुनीश!] हे मुनियों के नाथ! [त्वद्गोचरे] आपके समीप [सुमनसाम्] पुष्पों अथवा विद्वानों के [बंधनानि] कर्मों के बंधन [नूनम् हि] निश्चय से [अध: एव गच्छन्ति] नीचे को ही जाते हैं ।
उपजी तुम हिय उदधि तें, 'वाणी' सुधा समानजिहँ पीवत भविजन लहहिं, अजर अमर-पदथान ॥
स्वामिन्! सुदूरमवनम्य समुत्पतन्तो, मन्ये वदन्ति शुचय: सुर-चामरौघा: ।येऽस्मै नतिं विदधते मुनि-पुङ्गवाय,ते नूनमूध्र्व-गतय: खलु शुद्ध-भावा:॥२२॥
[स्वामिन्] हे प्रभो! [मन्ये] मैं मानता हूँ कि [सुदूरम्] बहुत दूर तक [अवनम्य] नम्रीभूत होकर [समुत्पतन्त:] ऊपर को जाते हुए [शुचय:] पवित्र [सुरचामरौघा] देवों के चामर समूह [वदन्ति] कह रहे हैं कि [ये] जो [अस्मै मुनिपुङ्गवाय] इन श्रेष्ठ मुनि को [नतिम्] नमस्कार [विदधते] करते हैं, [ते] वे [नूनम्] निश्चय से [शुद्ध भावा:] विशुद्ध परिणाम वाले होकर [ऊध्र्वगतय:] ऊध्र्वगति वाले हो जाते हैं ।
'सिंहासन' गिरि मेरु सम, प्रभु धुनि गरजत घोरश्याम सुतनु घनरूप लखि, नाचत भविजन मोर ॥
उद्गच्छता तव शिति-द्युति-मण्डलेन,लुप्तच्छदच्छविरशोक-तरुर्बभूव ।सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग !नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि ॥२४॥
[उद्गच्छता] स्पुâरायमान [तव] आपके [शितिद्युतिमण्डलेन] श्यामप्रभामण्डल के द्वारा [अशोकतरु:] अशोकवृक्ष [लुप्तच्छदच्छवि:] कान्तिहीन पत्रों वाला [बभूव] हो गया, [यदि वा] अथवा [वीतराग!] हे रागद्वेष रहित देव! [तव सान्निध्यत: अपि] आपकी समीपता मात्र से ही [क: सचेतन: अपि] कौन पुरुष सचेतन होकर भी [नीरागताम्] अनुराग के अभाव को [न व्रजति] नहीं प्राप्त होता है ?
सीख कहे तिहुँ-लोक को, ये 'सुर-दुंदुभि' नादशिवपथ-सारथ-वाह जिन, भजहु तजहु परमाद ॥
उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ !,तारान्वितो विधुरयं विहताधिकार: ।मुक्ता-कलाप-कलितोल्ल-सितातपत्र-व्याजात्त्रिधा धृत-तनुर्ध्रुवमभ्युपेत: ॥२६॥
[नाथ!] हे स्वामिन्! [भवता भुवनेषु उद्योति तेषु] आपके द्वारा तीनों लोकों के प्रकाशित होने पर [विहताधिकार:] अपने अधिकार से भ्रष्ट तथा [मुक्ताकलापकलितोल्लसितातपत्रव्याजात्] मोतियों के समूह से सहित अतएव शोभायमान सफेद छत्र के छल से [तारान्वित] ताराओं से वेष्टित [अयम् विधु:] यह चन्द्रमा [त्रिधा धृततनु] तीन-तीन शरीर धारण कर [ध्रुवम्] निश्चय से [अभ्युपेत:] सेवा को प्राप्त हुआ है ।
(पद्धरि छन्द)प्रभु तुम शरीर दुति रतन जेम,परताप पुंज जिम शुद्ध-हेमअतिधवल सुजस रूपा समान, तिनके गुण तीन विराजमान ॥
दिव्य-स्रजो जिन! नमत्त्रिदशाधिपाना-मुत्सृज्य रत्न-रचितानपि मौलि-बन्धान् ।पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वापरत्र,त्वत्सङ्गमे सुमनसो न रमन्त एव ॥२८॥
[जिन!] हे जिनेन्द्र! [दिव्यस्रज:] दिव्यपुरुषों की मालाएँ [नमत्त्रिदशाधिपानाम्] नमस्कार करते हुए इन्द्रों के [रत्न रचितान् अपि मौलिबन्धान्] रत्नों से बने हुए मुकुटों को भी [विहाय] छोड़कर [भवत: पादौ श्रयन्ति] आपके चरणों का आश्रय लेती हैं । [यदि वा] अथवा [त्वत्सङ्गमे] आपका समागम होने पर [सुमनस:] पुष्प अथवा विद्वान पुरुष [परत्र] किसी दूसरी जगह [न एव रमन्ते] नहीं रमण करते हैं ।
प्रभु भोग-विमुख तन करम-दाह, जन पार करत भवजल निवाहज्यों माटी-कलश सुपक्व होय, ले भार अधोमुख तिरहिं तोय ॥
विश्वेश्वरोऽपि जन-पालक! दुर्गतस्त्वं,किं वाऽक्षर-प्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश !अज्ञानवत्यपि सदैव कथंचिदेव,ज्ञानं त्वयि स्फुरति विश्व-विकास-हेतु: ॥३०॥
[जनपालक!] हे जीवों के रक्षक! [त्वम्] आप [जिनेश्वर: अपि दुर्गत:] तीन लोक के स्वामि होकर भी दरिद्र हैं [किं वा] और [अक्षर प्रकृति: अपि त्वम् अलिपि:] अक्षर स्वभाव होकर भी लेखन क्रिया से रहित हैं । [ईश!] हे स्वामिन्! [कथञ्चित्] किसी प्रकार से [अज्ञानवति अपि त्वयि] अज्ञानवान होने पर भी आप में [विश्वविकास हेतु ज्ञानम्] सभी पदार्थों को प्रकाशित करने वाला ज्ञान [सदा एव स्पुरति] हमेशा स्पुरायमान रहता है ।
कोपियो कमठ निज बैर देख, तिन करी धूलि वरषा विशेषप्रभु तुम छाया नहिं भई हीन, सो भयो पापी लंपट मलीन
यद्गर्जदूर्जित-घनौघमदभ्र-भीमभ्रश्यत्तडिन्-मुसल-मांसल-घोरधारम् ।दैत्येन मुक्तमथ दुस्तर-वारि दध्रे,तेनैव तस्य जिन! दुस्तर-वारिकृत्यम् ॥३२॥
[अथ] और [जिन!] हे जिनेश्वर! [दैत्येन] उस कमठ ने [गर्जदूर्जितघनौघम्] खूब गर्ज रहे हैं बलिष्ठ-मेघ-समूह जिसमें [भ्रश्यत्तडित्] गिर रही है बिजली और [मुसलमांसलघोरधारम्] मूसल के समान बड़ी है मोटी धारा जिसमें तथा [अदभ्रभीम] अत्यंत भयंकर [यत्] जो [दुस्तरवारि] अथाह जल [मुक्तम्] वर्षाया था [तेन] उस जलवृष्टि से [तस्य एव] उस कमठ ने ही अपने लिए [दुस्तरवारिकृत्यम्] तीक्ष्ण तलवार का काम कर लिया था ।
(वास्तु छन्द)मेघमाली मेघमाली आप बल फोरिभेजे तुरत पिशाच-गण, नाथ-पास उपसर्ग कारणअग्नि-जाल झलकंत मुख, धुनिकरत जिमि मत्त वारणकालरूप विकराल-तन, मुंडमाल-हित कंठह्वे निशंक वह रंक निज, करे कर्म दृढ़-गंठ ॥
धन्यास्त एव भुवनाधिप! ये त्रिसंध्य-माराधयन्ति विधिवद्विधुतान्य-कृत्या: ।भक्त्योल्लसत्पुलक-पक्ष्मल-देह-देशा:,पादद्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाज: ॥३४॥
[भुवनाधिप!] हे तीन लोक के नाथ! [ये] जो [जन्मभाज:] प्राणी [विधुतान्यकृत्या:] जिन्होंने अन्य काम छोड़ दिये हैं और [भक्त्या] भक्ति से [उल्लसत्] प्रकट हुए [पक्ष्मलदेहदेशा:] रोमांचों से जिनके शरीर का प्रत्येक अवयव व्याप्त है, ऐसे [सन्त:] होते हुए [विधिवत्] विधिपूर्वक [त्रिसन्ध्यम्] तीनों कालों में [तव] आपके [पादद्वयम् आराधयन्ति] चरण युगल की आराधना करते हैं । [विभो!] हे स्वामिन्! [भुवि] संसार में [ते एव] वे ही [धन्या:] धन्य हैं ।
भवसागर में फिरत अजान, मैं तुव सुजस सुन्यो नहिं कानजो प्रभु-नाम-मंत्र मन धरे, ता सों विपति भुजंगम डरे ॥
जन्मान्तरेऽपि तव पाद-युगं न देव !मन्ये मया महितमीहित-दान-दक्षम् ।तेनेह जन्मनि मुनीश! पराभवानां,जातो निकेतनमहं मथिताशयानाम् ॥३६॥
[देव!] हे देव! [मन्ये] मैं मानता हूँ कि मैंने [जन्मान्तरे अपि] दूसरे जन्म में भी [ईहितदानदक्षम्] इच्छित फल देने में समर्थ [तव पादयुगम्] आपके चरण कमल [न महितम्] नहीं पूजे, [तेन] उसी से [इह जन्मनि] इस भव में [मुनीश!] हे मुनीश! [अहम्] मैं [मथिताशयानाम्] हृदयभेदी [पराभवानाम्] तिरस्कारों का [निकेतनम्] घर [जात:] हुआ हूँ ।
मोहतिमिर छायो दृग मोहि, जन्मान्तर देख्यो नहिं तोहिजो दुर्जन मुझ संगति गहें, मरम छेद के कुवचन कहें ॥
आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि,नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या ।जातोऽस्मि तेन जनबान्धव! दु:खपात्रम्,यस्मात्क्रिया: प्रतिफलन्ति न भाव-शून्या: ॥३८॥
[जनबान्धव!] हे जगद् बन्धो! [मया] मेरे द्वारा [आकर्णित: अपि] दर्शन किये गये हो [महित: अपि] पूजित भी हुए हो और [निरीक्षित: अपि] अवलोकित भी हुए हो फिर भी [नूनम्] निश्चय है कि [भक्त्या] भक्तिपूर्वक [चेतसि] चित्त में [न विधृत: असि] धारण नहीं किये गये हो । [तेन] उसी से [दु:खपात्रम् जात: अस्मि] दु:खों का पात्र हो रहा हूँ [यस्मात्] क्योंकि [भावशून्या:] भाव रहित [क्रिया:] क्रियाएँ [न प्रति फलन्ति] सफल नहीं होतीं ।
महाराज शरणागत पाल, पतित-उधारण दीनदयालसुमिरन करहूँ नाय निज-शीश, मुझ दु:ख दूर करहु जगदीश ॥
नि:संख्य-सार-शरणं शरणं शरण्य-मासाद्य सादित-रिपु-प्रथितावदानम् ।त्वत्पाद-पङ्कजमपि प्रणिधान-वन्ध्यो,वन्ध्योऽस्मि चेद्भुवन-पावन! हा हतोऽस्मि ॥४०॥
[भुवनपावन] हे संसार को पवित्र करने वाले भगवन्! [नि:संख्यसारशरणम्] असंख्यात श्रेष्ठ पदार्थों के घर की [शरणम्] रक्षा करने वाले [शरण्यम्] शरणागत प्रतिपालक और [सादितरिपुप्रथितावदानम्] कर्मशत्रुओं के नाश से प्रसिद्ध है, पराक्रम जिनका ऐसे [त्वत्पादपज्र्जम्] आपके चरणकमलों को [आसाद्य अपि] पाकर भी [प्रणिधानबन्ध्य:] उनके ध्यान से रहित हुआ मैं [बन्ध्य: अस्मि] फलहीन हूँ [तत्] उससे [हा] खेद है कि मैं [हत: अस्मि] नष्ट हुआ जा रहा हूँ ।
सुर-गन-वंदित दया-निधान, जग-तारण जगपति अनजानदु:ख-सागर तें मोहि निकासि, निर्भय-थान देहु सुख-रासि ॥
यद्यस्ति नाथ! भवदङ्घ्रि-सरोरुहाणां,भक्ते: फलं किमपि सन्ततसञ्चिताया: ।तन्मे त्वदेक-शरणस्य शरण्य! भूया:,स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि ॥४२॥
[नाथ!] हे नाथ! [त्वदेकशरणस्य] केवल आप ही की है शरण जिसको ऐसे मुझे [सन्तत सञ्चिताया:] चिरकाल से सञ्चित-एकत्रित हुई [भवदंघ्रिसरोरुहाणाम्] आपके चरण कमलों की [भ्क्ते:] भक्ति का [यदि] यदि [किमपि फलम् अस्ति] कुछ फल हो, [तत्] तो उससे [शरण्य] हे शरणागत प्रतिपालक! [त्वम् एव] आप ही [अत्र भुवने] इस लोक में और [भवान्तरे अपि] परलोक में भी [स्वामि] मेरे स्वामी [भूया:] होवें ।
(बेसरी छंद – षड्पद)इहविधि श्री भगवंत, सुजस जे भविजन भाषहिंते निज पुण्यभंडार, संचि चिर-पाप प्रणासहिं ॥रोम-रोम हुलसंति अंग प्रभु-गुण मन ध्यावहिंस्वर्ग संपदा भुंज वेगि पंचमगति पावहिं ॥यह कल्याणमंदिर कियो, कुमुदचंद्र की बुद्धिभाषा कहत 'बनारसी', कारण समकित-शुद्धि ॥