पहली ढाल
ढाल-2
(चाल छंद)रे जिय यह नरभव पाया, कुल जाति विमल तू आयाजो जैनधर्म नहिं धारा, सब लाभ विषयसंग हारा ॥१॥लखि बात हृदय गह लीजे, जिनकथित धर्म नित कीजेभव दुख सागर को वरिये, सुख से नवका ज्यों तरिये ॥२॥ले सुधि न विषय रस भरिया, भ्रम मोह ने मोहित करियाविधि ने जब दई घुमरिया, तब नरक भूमि तू परिया ॥३॥अब नर कर धर्म अगाऊ, जब लों धन यौवन चाऊजब लों नहिं रोग सतावैं, तोहि काल न आवन पावै ॥४॥ऐश्वर्य रु आश्रित नैना, जब लों तेरी दृष्टि फिरै नाजब लों तेरी दृष्टि सवाई, कर धर्म अगाऊ भाई ॥५॥ओस बिंदु त्यों योवन जैहे, कर धर्म जरा पुन यै हैज्यों बूढो बैल थकै है, कछु कारज कर न सकै है ॥६॥औ छिन संयोग वियोगा, छिन जीवन छिन मृत्यु रोगाछिन में धन यौवन जावै, किस विधि जग में सुख पावै ॥७॥अंबर धन जीवन येहा, गज-करण चपल धन देहातन दर्पण छाया जानो, यह बात सभी उर आनौ ॥८॥
तीसरी ढाल
ढाल-4
(अडिल्ल छंद)जरापने जो दुख सहे, सुन भाई रेसो क्यों भूले तोहि, चेत सुन भाई रेजो तू विषयों से लगा, सुन भाई रेआतम सुधि नहिं तोहि, चेत सुन भाई रे ॥१॥झूठ वचन अघ ऊपजै, सुन भाई रेगर्भ बसो नवमास, चेत सुन भाई रेसम धातु लहि पाप से, सुन भाई रेअबहू पाप रताय, चेत सुन भाई रे ॥२॥नहीं जरा गदआय है, सुन भाई रेकहाँ गये यम यक्ष वे, सुन भाई रेजे निश्चिन्तित हो रह्यो, सुन भाई रेसो सब देख प्रत्यक्ष, चेत सुन भाई रे ॥३॥टुक सुख को भवदधि पड़े, सुन भाई रेपाप लहर दुखदाय, चेत सुन भाई रेपकड़ो धर्म जहाज को, सुन भाई रेसुख से पार करेय, सुन भाई रे ॥४॥ठीक रहे धन सास्वतो, सुन भाई रेहोय न रोग न काल, चेत सुन भाई रेउतम धर्म न छोड़िये, सुन भाई रेधर्म कथित जिन धार, चेत सुन भाई रे ॥५॥डरपत जो परलोक से, सुन भाई रेचाहत शिव सुखसार, चेत सुन भाई रेक्रोध लोभ विषयन तजो, सुन भाई रेकोटि कटै अघजाल, चेत सुन भाई रे ॥६॥ढील न कर आरम्भ तजो, सुन भाई रेआरम्भ में जिय घात, चेत सुन भाई रेजीवघात से अघ बढें, सुन भाई रेअघ से नरक लहात, चेत सुन भाई रे ॥७॥नरक आदि त्रैलोक्य में, सुन भाई रेये परभव दुख राशि, चेत सुन भाई रेसो सब पूरब पाप से, सुन भाई रेसबहि सहै बहु त्रास, चेत सुन भाई रे ॥८॥
पाँचवीं ढाल
ढाल-6
(दोहा)भोंदू धनहित अघ करे, अघ से धन नहिं होयधरम करत धन पाइये, मन वच जानो सोय ॥१॥मत जिय सोचे चिंतवै, होनहार सो होयजो अक्षर विधना लिखे, ताहि न मेटे कोय ॥२॥यद्यपि द्रव्य की चाह में, पैठै सागर मांहिशैल चढ़े वश लाभ के, अधिको पावै नाहिं ॥३॥रात-दिवस चिंता चिता, मांहि जले मत जीवजो दीना सो पायगा, अधिक न मिलै सदीव ॥४॥लागि धर्म जिन पूजिये, सत्य कहैं सब कोयचित प्रभु चरण लगाइये, मनवांछित फल होय ॥५॥वह गुरु हों मम संयमी, देव जैन हो सारसाधर्मी संगति मिलो, जब लों हो भव पार ॥६॥शिव मारग जिन भाषियो, किंचित जानो सोयअंत समाधी मरण करि,चहुँगति दुख क्षय होय ॥७॥षट्विधि सम्यक् जो कहै, जिनवानी रुचि जाससो धन सों धनवान है, जन में जीवन तास ॥८॥सरधा हेतु हृदय धरै, पढ़ै सुनै दे कानपाप कर्म सब नाश के, पावै पद निर्वाण ॥९॥हित सों अर्थ बताइयो, सुथिर बिहारी दाससत्रहसौ अठ्ठानवे, तेरस कार्तिक मास ॥१०॥क्षय-उपशम बलसों कहै, द्यानत अक्षर येहदेख सुबोध पचासका, बुधिजन शुद्ध करेहु ॥११॥त्रेपन क्रिया जो आदरै, मुनिगण विंशत आठहृदय धरैं अति चाव सो, जारैं वसु विधि काठ ॥१२॥ज्ञानवान जैनी सबै, बसैं आगरे मांहिसाधर्मी संगति मिले, कोई मूरख नाहिं ॥१३॥