देव शास्त्र गुरु पण्डित द्यानतराय

प्रथम देव अरिहंत भगवान्, जिनवाणी माता, और महान निस्पृही (अपरिग्रही) गुरु-साधु, मोक्ष-मार्ग (को बताने वाले) है । संसार के भव्य जीव जो इन तीन रत्नों को ध्याते (भक्ति से) हैं उन्हें इनकी भक्ति के प्रसाद से परम पद (मोक्ष) मिलता है ।मैं अष्ट विधि से नित्य अरिहंत भगवन् के चरणों की पूजा करता हूँ, फिर सार-भूत गुरुओं के चरणों की पूजा करता हूँ और फिर जिनवाणी माता (सरसवती देवी) को पूजता हूँ ।

हे भगवान् ! इंद्र, धरणेन्द्र और चक्रवर्ती आपके चरणों में मस्तक झुकाकर नमस्कार करते हैं इसलिए आपके चरण निर्मल स्वर्ण के समान शोभायमान प्रतीत होते हैं, इनकी छवि (कान्ति) देखकर समवशरण की सभाएं मोहित हो जाती है । क्षीर सागर के पवित्र जल का कलश भरकर आपके समक्ष नृत्य कर जल अर्पित करते है । मैं इस प्रकार अरिहंत भगवान्, जिनवाणी और निर्ग्रन्थ गुरुओं की नित्य पूजा करता हूँ ।जल का स्वभाव सभी मलिन पदार्थों के मल को नष्ट करने का है; इसलिए देव, शास्त्र, गुरु के श्रेष्ठ पदों की पूजा के लिए जल अर्पित करता हूँ ।

हे भगवान् ! तीनों लोक के प्राणी दुखों के ताप से अत्यंत दुखी हैं, आपके प्रवचन इन दुखी प्राणियों के दुखों को हर कर शीतलता / शांति प्रदान करते हैं । इसलिए अत्यंत सुगन्धित चन्दन को घिस कर लाया हूँ, जिस की पवित्र सुगंध सूंघ कर भंवरे लोभित हो रहे है । उस चंदन से अरिहंत भगवान्, जिनवाणी और गुरु की पूजा करता हूँ ।चन्दन तप्ती हुई वस्तु को शीतलता प्रदान करने में सामर्थ्यवान है; इसलिए देव, शास्त्र और गुरु की चन्दन से पूजा करता हूँ ।

हे भगवान् ! यह संसार रुपी समुद्र अपार है; इसको पार करने के लिए आपकी अत्यंत दृढ़, परम-पवित्र और सच्ची भक्ति रुपी नाव ही सामर्थ्यवान है । इसलिए मैं ताज़े और स्वच्छ चमकते हुए अखंडित शालि-वन के चावलों के पुंजो को अर्पित कर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र तीनों गुणों की याचना करता हूँ । इस प्रकार अरिहंत भगवान्, जिनवाणी और गुरु की की नित्य पूजा करता हूँ ।मैं शालीधान के अत्यंत सुगन्धित, अखण्डित, श्रेष्ठ चावलों को एक-एक बीन कर, देव शास्त्र गुरु तीन परम पदों की पूजा करता हूँ ।

हे जिनेन्द्र देव ! आप भक्ति कर रहे भव्य जीवों के हृदय रूपी कमलों को प्रकाशित करने के लिए सूर्य के सामान है, जो प्रधानता से चारित्र का उपदेश देते है, वे तीनो लोकों में सर्व श्रेष्ठ हैं, इसलिए मैं कुंद, कमल आदि पुष्पों को लेकर अनेक जन्मों के खोटे वेदों (तीनों वेद पुरुष, स्त्री और नपुंसक) काम विकार के कष्टों से बचने के लिए मैं अरिहंत भगवान्, जिनवाणी और निर्ग्रथ गुरु की नित्य पूजा करता हूँ ।मेरे पास भिन्न भिन्न प्रकार के सुगन्धित पुष्प से जिनकी सुगंध वश भवरे हो जाते है, मैं तीनो परम पदों; देव, शास्त्र और गुरु की पूजा करता हूँ ।

अत्यंत बलवान मद के वेग को धारण करने वाला महान क्षुधारूपी सर्प का विष असहनीय और भयंकर है । उस का नाश करने के लिए आप गरूड़ के सामान हैं, इसलिए मैं उत्तम छ: रसों युक्त, घी में पकाये नैवद्य से अरिहंत भगवान्, जिनवाणी और निर्ग्रन्थ गुरु तीनों की नित्य पूजा करता हूँ ।मैं नाना प्रकार के विभिन्न रसों से युक्त, ताज़े नैवैद्य (पकवान) से देव, शास्त्र और गुरु, की पूजा करता हूँ ।

हे भगवान् ! तीनों लोक के जीवों के पुरुषार्थ को नष्ट करने वाला मोह रूपी अन्धकार अत्यंत बलवान है । उस मोहनीय कर्म को नाश करने के लिए आपके ज्ञान रुपी दीपक की ज्योति / प्रकाश सामर्थ्यवान है । इस प्रकार में दीपक को प्रज्जवलित कर सोने के पात्र में सजाकर ,अरिहंत भगवान्, जिनवाणी और निर्ग्रन्थ गुरु की नित्य पूजा करता हूँ ।इस (केवल) ज्ञान रुपी दीपक से मैं देव शास्त्र और गुरु तीनों परम पदों की पूजा करता हूँ, जिस की ज्योति अन्धकार रहित, स्व और पर पदार्थों की प्रकाशक है ।

हे भगवान् ! कर्मरुपी ईंधन को जलाने के लिए आप अग्नि के सामान प्रकाशित है । अच्छी धुप की सुगंध से सभी सुगंधिया मंद हो जाती है । इसी तरह देव ! प्रतिदिन धुप अर्पित करता हूँ जिससे मै संसार रुपी अग्नि से दूर रह सकूँ; इस प्रकार नित्य तीनों, देव, जिनवाणी और अपरिग्रही गुरु की पूजा करता हूँ ।चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों सहित धुप को अग्नि में जला कर देव, शास्त्र और गुरु ,तीनों परम पदों की पूजा करता हूँ ।

भगवन मैं, नेत्रों, जीव्हा, नासिका और मन को उत्साहित करने वाले अनुपम और समस्त श्रेष्ठ गुणों वाले फलों को अर्पित कर हर्षित होता हुआ श्रेष्ठ मोक्ष-रस को प्राप्त करने की भावना से नित्य अरिहंत भगवान्, जिनवाणी और निर्ग्रन्थ गुरु की पूजा करता हूँ ।जो फलों में प्रधान है, जिन के रस में पाँचों इन्द्रिय लीन हो रही है, ऐसे फलों से तीनों परम पद, देव शास्त्र और गुरु की पूजा करता हूँ ।

भगवन ! मैंने श्रेष्ठ उज्जवल जल, चन्दन से सुगन्धित जल, अक्षत, पुष्प, नैवद्य, दीपक, श्रेष्ट धुप और विविध प्रकार के निर्मल फलों को मिलाकर, अनेक जन्मों के पापों को नष्ट करने के लिए अर्घ बना कर लाया हूँ । इस प्रकार नित्य अर्घ्य अर्पित कर मैं मोक्ष की पंक्ति में लगता हूँ । मै तीनों अरिहंत भगवान्, जिनवाणी और अपरिग्रही गुरु की नित्य पूजा करता हूँ ।आठ प्रकार के अर्घ्य से, मन से अत्यंत उत्साहपूर्वक तीनों परम-पद देव शास्त्र और गुरु कि पूजा करता हूँ ।

देव शास्त्र गुरु रतन शुभ, तीन रतन करतारभिन्न भिन्न कहुं आरती, अल्प सुगुण विस्तार ॥१॥

(पद्धरि छन्द)कर्मन की त्रेसठ प्रकृति नाशि, जीते अष्टादश दोषराशिजे परम सुगुण हैं अनंत धीर, कहवत के छयालिस गुणगंभीर ॥२॥

शुभ समवशरण शोभा अपार, शत इंद्र नमत कर सीस धारदेवाधिदेव अरहंत देव, वंदौं मन-वच-तन करि सुसेव ॥३॥

जिनकी ध्वनि ह्वै ओंकाररुप, निर-अक्षर मय महिमा अनूपदश अष्ट महाभाषा समेत, लघुभाषा सात शतक सुचेत ॥४॥

सो स्याद्वादमय सप्तभंग, गणधर गूंथे बारह सुअंगरवि शशि न हरें सो तम हराय, सो शास्त्र नमौं बहु प्रीति ल्याय ॥५॥

गुरु आचारज उवझाय साधु, तन नगन रतनत्रय-निधि अगाधसंसारदेह वैराग्य धार, निरवांछि तपैं शिवपद निहार ॥६॥

गुण छत्तिस पच्चिस आठबीस, भवतारन तरन जिहाज ईसगुरु की महिमा वरनी न जाय, गुरु-नाम जपौं मन-वचन-काय ॥७॥

(सोरठा)कीजै शक्ति प्रमान, शक्ति बिना सरधा धरेद्यानत सरधावान, अजर अमरपद भोगवे ॥ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यः जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा

श्रीजिन के परसाद तें, सुखी रहें सब जीवया तें तन मन वचन तें, सेवो भव्य सदीव ॥(इत्याशीर्वादः – पुष्पांजलिं क्षेपत्)

0:00
0:00