भूधर शतक पण्डित भूधरदास

सवैयाज्ञानजिहाज बैठि गनधर-से, गुनपयोधि जिस नाहिं तरे हैं ।अमर-समूह आनि अवनी सौं, घसि-घसि सीस प्रनाम करे हैं ।किधौं भाल-कुकरम की रेखा, दूर करन की बुद्धि धरे हैं ।ऐसे आदिनाथ के अहनिस, हाथ जोड़ि हम पाँय परे हैं ॥1॥सवैयाकाउसग्ग मुद्रा धरि वन में, ठाड़े रिषभ रिद्धि तजि हीनी1 ।निहचल अंग मेरु है मानौ, दोऊ भुजा छोर जिन दीनी ।फँसे अनंत जंतु जग-चहले, दुखी देखि करुना चित लीनी ।काढ़न काज तिन्हैं समरथ प्रभु, किधौं बाँह ये दीरघ कीनी ॥२॥सवैयाकरनौं कछु न करन तैं कारज, तातैं पानि प्रलम्ब करे हैं ।रह्यौ न कछु पाँयन तैं पैबौ, ताही तैं पद नाहिं टरे हैं ।निरख चुके नैनन सत्र यातैं, नैन नासिका-अनी धरे हैं ।कानन कहा सुनैं यौं कानन, जोगलीन जिनराज खरे हैं ॥3॥छप्पयजयौ नाभिभूपाल-बाल सुकुमाल सुलच्छन ।जयौ स्वर्गपातालपाल गुनमाल प्रतच्छन ।दृग विशाल वर भाल लाल नख चरन विरजहिं ।रूप रसाल मराल चाल सुन्दर लखि लज्जहिं ॥रिप-जाल-काल रिसहेश हम, फँसे जन्म-जंबाल-दह ।यातें निकाल बेहाल अति, भो दयाल दुख टाल यह ॥4॥

2 – श्री चन्द्रप्रभ स्तुति

जिनके निर्मल चन्द्रमा के समान मुख का दर्शन करते ही भव्य जीवों का चित्त समस्त चिन्ताओं का त्याग कर अकामी (समस्त इच्छाओं से रहित) हो जाता है, जो तीन लोकों के चन्द्रमा हैं, जो पापरूपी आतप के लिए चन्दन हैं, जिनके चरणों में बड़े प्रसिद्ध चन्द्रादिक देव भी प्रणाम करते हैं, जिनकी उज्ज्वल कीर्तिरूपी चाँदनी तीनों लोकों में छाई हुई है, जिनके चन्द्रमा का चिह्न है, मोक्षाभिलाषी जीव जिनका स्मरण करते हैं, जो बुद्धिमान पुरुषरूपी चकोरों के लिए चन्द्रमा हैं, और जिनका वर्ण चन्द्रमा के समान उज्ज्वल है; उन चन्द्रप्रभ स्वामी को मैं प्रणाम करता हूँ ॥5॥

मत्तगयन्द सवैयाशांति जिनेश जयौ जगतेश, हरै अघताप निशेश की नांई ।सेवत पाय सुरासुरराय, नमैं सिर नाय महीतल तांई ।मौलि लगे मनिनील दिपैं, प्रभु के चरनौं झलकैं वह झांई ।सूंघन पाँय-सरोज-सुगंधि, किधौं चलि ये अलिपंकति आई ॥६॥

4 – श्री नेमिनाथ स्तुति

हे भगवान नेमिनाथ ! आपका शरीर प्रियंगु के फूल के समान श्याम वर्ण से सुशोभित है, आपके दर्शन से सारा दुःख दूर हो जाता है। और जिसप्रकार सूर्य की प्रभा के सामने दीपक लज्जित होता है, उसीप्रकार आपके सामने कामदेव लज्जित होता है। हे यादवनाथ ! आप बालब्रह्मचारी हैं। आपने सांसारिक कीचड़ के अनन्त दुःखों में से महाराजा उग्रसेन की कन्या (राजुल) को भी निकाला है। हे सुप्रसिद्ध नेमिनाथ स्वामी ! अब मैंने यह भली प्रकार समझ लिया है कि इस भयानक संसाररूपी जंगल में मुझे आपके अतिरिक्त अन्य कोई शरण नहीं है, इसलिए मैं आपकी ही शरण में आया हूँ। हे कृपाकंद ! जिस प्रकार आपने पशुओं को बन्धन से मुक्त किया था, उसी प्रकार मुझ सेवक को भी संसार-जाल से मुक्त कर दीजिये ॥7॥

छप्पयजनम-जलधि-जलजान, जान जनहंस-मानसर ।सरव इन्द्र मिलि आन, आन जिस धरहिं सीस पर ॥परउपगारी बान, बान उत्थपइ कुनय-गन ।गन-सरोजवन-भान, भान मम मोह-तिमिर-घन ॥घनवरन देहदुख-दाह हर, हरखत हेरि मयूर-मन ।मनमथ-मतंग-हरि पास जिन, जिन विसरहु छिन जगतजन! ॥८॥

6 – श्री वर्द्धमान स्तुति

प्रबल कर्मरूपी पर्वत को चकनाचूर करने के लिए जो वज्र के समान हैं, भव्यजीवरूपी कमलों को खिलाने के लिए जो श्रेष्ठ सूर्य के समान हैं और जिनकी प्रभा स्वर्णिम है; उन भगवान महावीर के चरणों में मैं हाथ जोड़ कर प्रणाम करता हूँ। विशेष :- यहाँ कवि ने 'दिढ़ कर्माचल दलन पवि' कहकर भगवान के वीतरागता गुण की ओर संकेत किया है, 'भवि-सरोज-रविराय' कहकर हितोपदेशीपने की ओर संकेत किया है और 'कंचन छवि' कहकर सर्वज्ञता गुण की ओर संकेत किया है । तात्पर्य यह है कि जो वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी हैं, उन वर्द्धमान जिनेन्द्र के चरणों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ॥9॥हे भगवान महावीर ! आपके अन्तरंग गुणों की महिमा तो दूर, बहिरंग गुणों का वर्णन करने की भी सामर्थ्य किसी में नहीं है। एक हजार आठ लक्षणों से युक्त आपके शरीर का तेज करोड़ों सूर्यों की किरणों को उखाड़ फेंकता है अर्थात् आपके शरीर के तेज की बराबरी करोड़ों सूर्य भी नहीं कर सकते हैं। देवताओं का राजा इन्द्र हजार आँखों की अंजुलि से भी आपके रूपामृत को पीता हुआ तृप्त नहीं होता है। हे वार प्रभो ! इस जगत् में आपके अतिरिक्त अन्य कौन ऐसा समर्थ है, जो जीवों को संसार से निकालकर मोक्ष में स्थापित कर सके ? ॥10॥

मत्तगयंद सवैयाध्यान-हुताशन मैं अरि-ईंधन, झोंक दियो रिपुरोक निवारी ।शोक हर्यो भविलोकन कौ वर, केवलज्ञान-मयूख उघारी ॥लोक-अलोक विलोक भये शिव, जन्म-जरा-मृत पंक पखारी ।सिद्धन थोक बसैं शिवलोक, तिन्हैं पगधोक त्रिकाल हमारी ॥११॥तीरथनाथ प्रनाम करैं, तिनके गुनवर्णन मैं बुधि हारी ।मोम गयौ गलि मूस मँझार, रह्यौ तहँ व्योम तदाकृतिधारी ॥लोक गहीर-नदीपति-नीर, गये तिर तीर भये अविकारी ।सिद्धन थोक बसैं शिवलोक, तिन्हैं पगधोक त्रिकाल हमारी ॥१२॥

8 – श्री साधु स्तुति

जो धीर, जब सब लोग अपने शरीर को संकुचित किये रहते हैं ऐसी कड़ाके की सर्दी में, अपने शरीर को बिना कुछ भी मोड़े, नदी-किनारे खड़े रहते हैं, जब चील अंडा छोड़ दे और पशु-पक्षी छाया चाहते फिरें ऐसी जेठ माह की लूओं (गर्म हवाओं) वाली तेज गर्मी में पर्वत-शिखर पर तप करते हैं तथा गरजती हुई घनघोर घटाओं और प्रबल पवन के झोंकों में अपने पुरुषार्थ को अधिकाधिक स्फुरायमान करते हुए डटे रहते हैं, शरीर सम्बन्धी राग को तोड़कर परमार्थ से प्रीति जोड़ते हैं; उन गुरुओं को हम हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं ॥13॥

मत्तगयंद सवैयावीर-हिमाचल तैं निकसी, गुरु-गौतम के मुख-कुण्ड ढरी है ।मोह-महाचल भेद चली, जग की जड़ता-तप दूर करी है ।ज्ञान-पयोनिधि माहिं रली, बहु भंग-तरंगनि सौं उछरी है ।ता शुचि-शारद गंगनदी प्रति, मैं अंजुरी करि शीश धरी है ॥14॥या जग-मन्दिर मैं अनिवार, अज्ञान-अंधेर छयौ अति भारी ।श्रीजिन की धुनि दीपशिखा-सम, जो नहिं होत प्रकाशनहारी ॥तो किस भांति पदारथ-पाँति, कहाँ लहते? रहते अविचारी ।या विधि सन्त कहैं धनि हैं, धनि हैं, जिनवैन बड़े उपगारी ॥15॥

10 – जिनवाणी और मिथ्यावाणी

केतकी और कनेर को एक समान कैसे कहा जा सकता है? उन दोनों में तो बहुत अन्तर है। आक के दूध और गाय के दूध को एक समान कैसे कहा जा सकता है? उन दोनों में तो बहुत अन्तर है।इसीप्रकार यद्यपि पीतल भी पीला होता है, पर वह कंचन की समानता नहीं कर सकता है। हे भाई ! जरा तुम ही विचारो! कहाँ कौए की आवाज और कहाँ कोयल की टेर! कहाँ दैदीप्यमान सूर्य और कहाँ बेचारा जुगनू ! कहाँ पूर्णिमा का प्रकाश और कहाँ अमावस्या का अन्धकार !हे पारखी ! अपना पक्ष (दुराग्रह) छोड़कर जरा सावधानीपूर्वक देखो, जिनवाणी और अन्यवाणी में उपर्युक्त उदाहरणों की भाँति बहुत अन्तर है।केतकी' एक ऐसे वृक्ष विशेष का नाम है जिस पर अत्यन्त सुगन्धित पुष्प आते हैं और जिसे सामान्य भाषा में केवड़ा' भी कहते हैं । तथा 'कनेर' यद्यपि देखने में केतकी' जैसा ही लगता है, पर वस्तुतः वह एक विषवृक्ष होता है और उसके पुष्प सुगन्धादि गुणों से हीन होते हैं।

कवित्त मनहरकब गृहवास सौं उदास होय वन सेऊँ,वेऊँ निजरूप गति रोकूँ मन-करी की ।रहि हौं अडोल एक आसन अचल अंग,सहि हौं परीसा शीत-घाम-मेघझरी की ॥सारंग समाज खाज कबधौं खुजेहैं आनि,ध्यान-दल-जोर जीतूं सेना मोह-अरी की ।एकलविहारी जथाजातलिंगधारी कब, होऊँ इच्छाचारी बलिहारी हौं वा घरी की ॥17॥

12 – राग और वैराग्य का अन्तर

पंचेन्द्रिय के विषयभोग और उन्हें भोगने के भाव, राग (मिथ्यात्व) के उदय में सुहावने-से लगते हैं, परन्तु वैराग्य होने पर काले नाग के समान (दुःखदायी और हेय) प्रतीत होते हैं।राग ही के कारण अज्ञानी जीव शरीरादि में रम रहे हैं – एकत्वबुद्धि कर रहे हैं । राग समाप्त हो जाने पर तो शरीरादि से भेदज्ञान प्रकट होकर विरक्ति उत्पन्न हो जाती है।राग ही के कारण अज्ञानी जीव जगत् की समस्त झूठी स्थितियों को सच्ची मान रहा है; राग समाप्त हो जाने पर तो जगत् का सारा खेल असार दिखाई देता है।इसप्रकार रागी (मिथ्यादृष्टि) और विरागी. (सम्यग्दृष्टि) के विचार (मान्यता) में बड़ा भारी अन्तर होता है । बैंगन किसी को पच जाते हैं और किसी को बादी करते हैं – वायुवर्द्धक होते हैं।

राग : मत्तगयंद सवैयाभाग्य बिना कछु हाथ न आवेतू नित चाहत भोग नए नर ! पूरवपुन्य विना किम पैहै ।कर्मसँजोग मिले कहिं जोग, गहे तब रोग न भोग सकै है ।जो दिन चार को ब्योंत बन्यौं कहुँ, तौ परि दुर्गति मैं पछितैहै ।याहितैं यार सलाह यही कि, गई कर जाहु निबाह न ह्वै है ॥१९॥

14 – देह-स्वरूप

यह शरीर माता-पिता के रज-वीर्य से उत्पन्न हुआ है, और इसमें अत्यन्त अपवित्र सप्त धातुएँ (रस, रुधिर, मांस, चर्बी, हड्डी, मज्जा और वीर्य) भरी हुई हैं । वह तो इसके ऊपर मक्खी के पर के समान पतला-सा वेष्टन चढ़ा हुआ है ।अन्यथा इस पर इसी वक्त बगुले-कौए आकर टूट पड़ें और यह देखते ही देखते साफ हो जाये, घड़ी भर भी न बचे। हे भाई ! शरीर की ऐसी अपवित्र दशा को देखकर भी तुम इससे विरक्त क्यों नहीं होते हो ? तुम्हारी बुद्धि किसने हर ली है?

राग : कवित्त मनहरकाहू घर पुत्र जायौ काहू के वियोग आयौ,काहू राग-रंग काहू रोआ रोई करी है ।जहाँ भान ऊगत उछाह गीत गान देखे,साँझ समै ताही थान हाय हाय परी है ॥ऐसी जगरीति को न देखि भयभीत होय,हा हा नर मूढ़ ! तेरी मति कौनैं हरी है ।मानुषजनम पाय सोवत विहाय जाय,खोवत करोरन की एक-एक घरी है ॥२१॥सोरठाकर कर जिनगुन पाठ, जात अकारथ रे जिया ।आठ पहर मैं साठ, घरी घनेरे मोल की ॥२२॥कानी कौड़ी काज, कोरिन को लिख देत खत ।ऐसे मूरखराज, जगवासी जिय देखिये ॥२३॥दोहाकानी कौड़ी विषयसुख, भवदुख करज अपार ।विना दियै नहिं छूटिहै, बेशक लेय उधार ॥२४॥

16 – शिक्षा

हे भाई ! विषयों का विनोद तो बस कुछ ही दिन का है, उसके बाद तो विपत्तियों पर विपत्तियाँ आने वाली हैं। विषय-विनोद का साधन यह शरीर तो अशचिगृह है, अचेतन है, जीव द्वारा किये गये स्नेह को समझता तक नहीं है।मित्रजन, बन्धु-बांधव, कुटुम्बी आदि समस्त रिश्ते-नातेदारों के भी सारे व्यवहार अज्ञानजन्य और दुःखदायी हैं। वे सब तो स्वार्थ के साथी हैं।अत: हे मूढराज ! तू दूसरों के लिए अपना नुकसान न कर। अब तो अपने हृदय में समझा गुरुवर कहते हैं कि आज तुझे अच्छा अवसर प्राप्त हुआ है, अतः लोकलाज का त्यागकर आत्मा का कल्याण कर ले।हे मेरे प्रिय मित्र! जब तक तुम्हारे शरीर को कोई रोगादि नहीं घेर लेता है, पराधीन कर डालनेवाला बुढ़ापा जब तक तुम्हारे पास नहीं आ जाता है, प्रसिद्ध शत्रु यमराज का डंका जब तक नहीं बज जाता है ।बुद्धि रूपी पत्नी जब तक तुम्हारी आज्ञा मानती है, बिगड़ नहीं जाती है; उससे पहले-पहले तुम आत्मकल्याण अवश्य कर लो, अन्यथा बाद में तुम्हारी शक्ति ही क्षीण हो जावेगी, तब क्या कर पाओगे?कुआँ आग लगने से पहले ही खोद लेना चाहिए। जब आग लग जाए और झोंपड़ी जलने लगे, तब कुआँ खुदाने से क्या लाभ ? मनुष्य की आयु सामान्यतः सौ वर्ष बताई जाती है; परन्तु यदि इसका हिसाब लगाकर देखा जाये तो आधी आयु तो सोने में ही व्यर्थ चली जाती है।पचास वर्ष; जिसमें भी अनेक रोग होते हैं, नासमझ रूप बाल दशा होती है, असमर्थरूप वृद्ध दशा होती है, उन्मत्तरूप भोंग दशा होती है तथा और भी कितने ही ऐसे-वैसे अनेक संयोग बन जाते हैं।कितनी शेष रही? नहीं के बराबर । अतः हे भाई! भलीप्रकार विचारकर प्रयोजनभूत बात को अपने हृदय में अच्छी तरह उतार लो, इसी में लाभ है।तथा यदि तुम्हारे हमारी बात जंचती हो तो भवबन्धनों से मुक्त हो जाओ; अन्यथा तुम्हारी मर्जी, फँसे रहो भवबन्धनों में; हमने तो तुम्हें समझा दिया है।

तर्ज : कवित्त मनहरबालपनैं बाल रह्यौ पीछे गृहभार वह्यौ,लोकलाज काज बाँध्यौ पापन कौ ढेर है ।आपनौ अकाज कीनौं लोकन मैं जस लीनौं,परभौ विसार दीनौं विषैवश जेर है ।ऐसे ही गई विहाय, अलप-सी रही आय,नर-परजाय यह आँधे की बटेर है ।आये सेत भैया अब काल है अवैया अहो,जानी रे सयानैं तेरे अजौं हू अँधेर है ॥२८॥मत्तगयन्द सवैयाबालपनै न संभार सक्यौ कछु, जानत नाहिं हिताहित ही को ।यौवन वैस वसी वनिता उर, कै नित राग रह्यौ लछमी को ॥यौं पन दोइ विगोइ दये नर, डारत क्यों नरकै निज जी को ।आये हैं सेत अजौं शठ चेत, गई सुगई अब राख रही को ॥२९॥कवित्त मनहरसार नर देह सब कारज कौं जोग येह,यह तौ विख्यात बात वेदन मैं बँचै है ।तामै तरुनाई धर्मसेवन कौ समै भाई,सेये तब विषै जैसैं माखी मधु रचै है ।मोहमद भोये धन-रामा हित रोज रोये,यौंही दिन खोये खाय कोदौं जिम मचै है ।अरे सुन बौरे ! अब आये सीस धौरे अजौं,सावधान हो रे नर नरक सौं बचे है ॥३०॥मत्तगयन्द सवैयाबाय लगी कि बलाय लगी, मदमत्त भयौ नर भूलत त्यौं ही ।वृद्ध भये न भजै भगवान, विषै-विष खात अघात न क्यौं ही ॥सीस भयौ बगुला सम सेत, रह्यो उर अन्तर श्याम अजौं ही ।मानुषभौ मुकताफलहार, गँवार तगा हित तोरत यौं ही ॥३१॥

18 – संसारी जीव का चिंतवन

संसारी प्राणी सोचता है कि यदि किसी तरह मेरे पास धन इकट्ठा हो जावे तो मेरे सारे काम सिद्ध हो जायें और मेरा मन पूरी तरह प्रसन्न हो जावे। धन होने पर मैं एक अच्छा-सा मकान बनाऊँ , थोड़ा-बहुत गहना (आभूषण) तैयार कराऊँ और बेटे-बेटियों का विवाह करके सारी समाज में मिठाइयाँ बँटवा दूँ।परन्तु इस प्रकार सोचते-सोचते ही सारा जीवन व्यतीत हो जाता है और अचानक यमराज हमला बोल देता है – शीघ्र मृत्यु आ जाती है। खिलाड़ी खेलते-खेलते ही चला जाता है और शतरंज की बाजी जहाँ की तहाँ जमी ही रह जाती है ॥३२॥भाजी = विवाहादि उत्सवों में जो मिष्ठान्न बाँटा जाता है, उसे भाजी कहते हैं द्वार पर तीव्रगामी (स्वस्थ और फुर्तीले) घोड़े खड़े हो गये, सुन्दर-सुन्दर रथ आ गये, ऊँचे-ऊँचे मस्त हाथी खड़े हो गये, नौकर-चाकर इकट्ठे हो गये, बड़े-बड़े भवन और अटारियाँ बन गईं, धन भी अनाप-शनाप इकट्ठा हो गया, कोषों के कोष भर गये – करोड़ों खजाने भर गये। परन्तु हे भाई ! ऐसी उन्नति से क्या होता है? अन्त समय तुम्हें ये सब यहीं छोड़कर अकेले ही चला जाना होगा। ये सारे भवन खड़े ही रह जायेंगे, काम पड़े ही रह जायेंगे, दाम (धन) गड़े ही रह जायेंगे; सब कुछ जहाँ का तहाँ धरा ही रह जाएगा।

कवित्त मनहरकंचन-भंडार भरे मोतिन के पुंज परे,घने लोग द्वार खरे मारग निहारते ।जान चढ़ि डोलत हैं झीने सुर बोलत हैं,काहु की हू ओर नेक नीके ना चितारते ॥कौलौं धन खांगे कोउ कहै यौं न लांगे,तेई, फिरैं पाँय नांगे कांगे परपग झारते ।एते पै अयाने गरबाने रहैं विभौ पाय,धिक है समझ ऐसी धर्म ना सँभारते ॥34॥कवित्त मनहरदेखो भरजोबन मैं पुत्र को वियोग आयौ,तैसैं ही निहारी निज नारी कालमग मैं ।जे जे पुन्यवान जीव दीसत हे या मही पै,रंक भये फिरैं तेऊ पनहीं न पग मैं ॥एते पै अभाग धन-जीतब सौं धरै राग,होय न विराग जानै रहूँगौं अलग मैं ।आँखिन विलोकि अंध सूसे की अंधेरी करै,ऐसे राजरोग को इलाज कहा जग मैं ॥35॥दोहाजैन वचन अंजनवटी, आँजैं सुगुरु प्रवीन ।रागतिमिर तोहु न मिटै, बड़ो रोग लख लीन ॥36॥

20 – निज अवस्था-वर्णन

हे मित्र ! मुझसे मेरे मिलने-जुलने वाले मेरी कुशलता के बारे में पूछते हैं; परन्तु तुम्हीं बताओ, कुशलता है कहाँ? दशा तो ऐसी हो रही है: जिस प्रकार अंजुलि का जल जैसे-जैसे उसमें से बूंद गिरती जाती है वैसेवैसे ही समाप्त होता जाता है; उसी प्रकार जैसे-जैसे दिन कटते जा रहे हैं वैसेवैसे ही यह आयु भी निश्चित रूप से घटती जा रही है, दिनों-दिन शरीर दुर्बल होता जा रहा है, आँखों की रोशनी कम होती जा रही है, युवावस्था बिगड़ती जा रही है, शक्ति क्षीण होती जा रही है, वृद्धावस्था पास आती जा रही है, मृत्युरूपी शिकारी इधर देखने लग गया है, परभव पास आता जा रहा है और अनुष्यभव व्यर्थ ही बीतता जा रहा है ॥20॥1. पाठान्तर : आव। . 2 पाठान्तर : आय। . 3. पाठान्तर : जाय।

मत्तगयंद सवैयादृष्टि घटी पलटी तन की छबि, बंक भई गति लंक नई है ।रूस रही परनी घरनी अति, रंक भयौ परियंक लई है ॥काँपत नार बहै मुख लार, महामति संगति छाँरि गई1 है ।अंग उपंग पुराने परे, तिशना उर और नवीन भई है ॥38॥कवित्त मनहररूप को न खोज रह्यौ तरु ज्यौं तुषार दह्यौ,भयौ पतझार किधौं रही डार सूनी-सी ।कूबरी भई है कटि दूबरी भई है देह,ऊबरी इतेक आयु सेर माहिं पूनी-सी ॥जोबन नैं विदा लीनी जरा नैं जुहार कीनी,हीनी भई सुधि-बुधि सबै बात ऊनीसी ।तेज घट्यौ ताव घट्यौ जीतव को चाव घट्यौ,और सब घट्यौ एक तिस्ना दिन दूनी-सी ॥३९॥कवित्त मनहरअहो इन आपने अभाग उदै नाहिं जानी,वीतराग-वानी सार दयारस-भीनी है ।जोबन के जोर थिर-जंगम अनेक जीव,जानि जे सताये कछ करुना न कीनी है ।तेई अब जीवराश आये परलोक पास,लेंगे बैर देंगे दुख भई ना नवीनी है ।उनही के भय को भरोसौ जान काँपत है,याही डर डोकरा ने लाठी हाथ लीनी है ॥40॥कवित्त मनहरजाको इन्द्र चाहैं अहमिंद्र से उमाह जासौं,जीव मुक्ति-माहैं जाय भौ-मल बहावै है ।ऐसौ नरजन्म पाय विषै-विष खाय खोयौ,जैसैं काच साँ, मूढ़ मानक गमावै है ।मायानदी बूड़ भीजा काया-बल-तेज छीजा,आया पन तीजा अब कहा बनि आवै है ।तातै निज सीस ढोलै नीचे नैन किये डोलै,कहा बढ़ि बोलै वृद्ध बदन दुरावै है ॥४१॥मत्तगयंद सरैयादेखहु जोर जरा भट को, जमराज महीपति को अगवानी ।उज्जल केश निशान धरै, बहु रोगन की सँग फौज पलानी ।कायपुरी तजि भाजि चल्यौ जिहि, आवत जोबनभूप गुमानी ।लूट लई नगरी सगरी, दिन दोय मैं खोय है नाम निशानी ॥42॥दोहासुमतिहिं तजि जोबन समय, सेवहु विषय विकार ।खल साँटैं नहिं खोइये, जनम जवाहिर सार ॥43॥

22 – कर्त्तव्य-शिक्षा

हे भाई! यदि तेरे हृदय में धर्मसाधन की अभिलाषा है तो तू सच्चे देव-गुरु की श्रद्धा कर ! सच्चे धर्म को हृदय में धारण कर ! सच्चे शास्त्र सुन ! सच्चे मार्ग पर चल ! जीवों की दया पाल ! झूठ का त्याग कर ! चोरी का त्याग कर! पराई स्त्री को बुरी नजर से मत देख ! तृष्णा कम कर ! अपनी बड़ाई और दूसरों की निन्दा मत कर ! और इसी में तेरी चतुराई है कि तू मद्य और मांस से बचकर रह ! देवपूजा आदि षट् आवश्यक कर्मों का पालन कर ! सज्जनों की संगति में बैठा कर! ॥44॥सच्चा देव वही है जिसमें किंचित् भी दोष (क्षुधादि अठारह दोष एवं रागद्वेषादि सर्व विकारी भाव) न हो, सच्चा गुरु वही है जिसके हृदय में किसी प्रकार की इच्छा नहीं हो, सच्चा धर्म वही है जिसमें दया की प्रधानता हो, सच्चा शास्त्र वही है जिसमें आदि से अन्त तक एकरूपता का निर्वाह हो अर्थात् जो पूर्वापरविरोध से रहित हो। इसप्रकार हे मित्र ! इस जगत् में वस्तुतः ये चार ही रत्न हैं :- देव, गुरु, शास्त्र और धर्म; अत: तू इनकी परीक्षा कर और पश्चात् सच्चे देव, गुरु, शास्त्र और धर्म को ग्रहण कर तथा झूठे देव, गुरु, शास्त्र और धर्म का त्याग कर। इसी में मनुष्यभव की सार्थकता है। __ हे भाई! विवेकहीन मनुष्य पशु के समान माना गया है, अतः भवसागर से पार उतारने वाली उचित सलाह यही है कि तुम उक्त चारों बातों का सम्यक् प्रकार से निश्चय करो ॥45॥

छप्पयजो जगवस्तु समस्त हस्ततल जेम निहारै ।जगजन को संसार-सिंधु के पार उतारै ॥आदि-अन्त-अविरोधि वचन सबको सुखदानी ।गुन अनन्त जिहँ माहिं दोष की नाहिं निशानी ॥माधव महेश ब्रह्मा किधौं, वर्धमान के बुद्ध यह ।ये चिहन जान जाके चरन, नमो-नमो मुझ देव वह ॥46॥

24 – यज्ञ में हिंसा का निषेध

यज्ञ में बलि के लिए प्रस्तुत असहाय पशु पूछता है कि – हे यज्ञ करने वाले ! मुझे अग्नि में होम देने में तुम्हारी क्या बड़ाई है? अथवा इसमें तुम्हें क्या लाभ है? सुनो ! मुझे स्वर्गसुख नहीं चाहिए और न ही मैं तुमसे उसे माँगता हूँ। मुझे कुछ दो' – ऐसा मैं तुमसे नहीं कहता हूँ। मैं तो बस घास खाकर रहता हूँ, यही मेरी अभिलाषा है। और हे वीर पुरुष ! जो तुम ऐसा समझते हो कि यज्ञ में बलि के रूप में होम दिया जाने वाला जीव वेदानुसार सुखदायक स्वर्ग प्राप्त करता है, तो तुम इस यज्ञाग्नि में अपने कुटुम्ब को ही क्यों नहीं डालते हो? मुझे तो मत जलाओ, तुम्हें भगवान की सौगंध है ॥47॥

(छप्पय)अघ-अंधेर-आदित्य नित्य स्वाध्याय करिज्जै ।सोमोपम संसारतापहर तप कर लिज्जै ।जिनवरपूजा नियम करहु नित मंगलदायनि ।बुध संजम आदरहु धरहु चित श्रीगुरु-पांयनि ॥निजवित समान अभिमान बिन, सुकर सुपत्तहिं दान कर ।यौं सनि सुधर्म षटकर्म भनि, नरभौ-लाहौ लेहु नर ॥48॥(दोहा)ये ही छह विधि कर्म भज, सात विसन तज वीर ।इस ही पैंडे पहुँचिहै, क्रम-क्रम भवजल-तीर ॥49॥

26 – सप्त व्यसन

जुआ खेलना, मांसभक्षण, मद्यपान, वेश्यासेवन, शिकार, चोरी और परस्त्रीरमण – ये सात व्यसन हैं । तथा ये सातों पापरूप हैं, अत: इनका त्याग अवश्य करो।

छप्पयसकल-पापसंकेत आपदाहेत कुलच्छन ।कलहखेत दारिद्र देत दीसत निज अच्छन ।गुनसमेत जस सेत केत रवि रोकत जैसै ।औगुन-निकर-निकेत लेत लखि बुधजन ऐसै ॥जूआ समान इह लोक में, आन अनीति न पेखिये ।इस विसनराय के खेल कौ, कौतुक हू नहिं देखिये ॥५१॥

28 – मांसभक्षण-निषेध

मांस की प्राप्ति त्रस जीवों का घात होने पर ही होता है। मांस का स्पर्श, आकार, नाम और गन्ध – सभी हृदय में ग्लानि उत्पन्न करते हैं । मांस का भक्षण नरक जाने की योग्यतावाले निर्दयी, नीच और अधर्मी पुरुष करते हैं; उत्तम कुल और कर्म वाले तो इसका नाम लेते ही अपना भोजन तक छोड़ देते हैं। मांस अत्यन्त निन्दनीय है, अत्यन्त अपवित्र है और उसमें सदैव अनन्त जीवसमूह पाये जाते हैं । यही कारण है कि मांस सदैव अभक्ष्य बतलाया गया है । हे दयालु चित्त वाले! तुम इस मांस-भक्षणरूप दोष का त्याग करो ।1. पाठान्तर : जौन। 2. पाठान्तर : याकौ।

दुर्मिल सवैयाकृमिरास कुवास सराय दहैं, शुचिता सब छीवत जात सही ।जिहिं पान कियैं सुधि जात हियैं, जननीजन जानत नारि यही ॥मदिरा सम आन निषिद्ध कहा, यह जान भले कुल मैं न गही ।धिक है उनकौ वह जीभ जलौ, जिन मूढ़न के मत लीन कही ॥५३॥

30 – वेश्यासेवन-निषेध

पापिनी वेश्या धन के लिए प्रेम करती है। यदि व्यक्ति के पास धन नहीं बचे तो सारा प्रेम ऐसे तोड़ फेंकती है जैसे तिनका। वेश्या अधम व्यक्तियों के होठों का चुम्बन करती है अथवा उनके मुंह से निःसृत लार आदि अपवित्र वस्तुओं का स्वाद लेती है / सम्पूर्ण शुचिता वेश्या के छूने से समाप्त हो जाती है। वेश्या सदा बाजारों में मांस-मदिरा खाती-पीती फिरती है। वेश्या-व्यसन से घृणा वे ही नहीं करते, जो व्यसनों में अंधे हो रहे हैं। जो मूर्ख वेश्या-सेवन में लीन हैं, उन्हें बारम्बार धिक्कार है ॥54॥

कवित्त मनहरकानन मैं बसै ऐसौ आन न गरीब जीव,प्रानन सौं प्यारौ प्रान पूँजी जिस यहै है ।कायर सुभाव धरै काहूँ सौं न द्रोह करे,सबही सौं डरै दाँत लियैं तृन रहै हैं ॥काहू सौं न दोष पुनि काहू पै न पोष चहै,काहू के परोष परदोष नाहिं कहै है ।नेकु स्वाद सारिवे कौं ऐसे मृग मारिवे कौं,हा हा रे कठोर तेरौ कैसे कर वहै है ॥55॥

32 – चोरी-निषेध

चोर कभी भी और कहीं भी निश्चित नहीं होता, हमेशा और हर जगह चौकना रहता है / देख लेने पर स्वामी (चोरी की गई वस्तु का मालिक) उसकी पिटाई करता है। अन्य अनेक व्यक्ति भी मिल कर उसे निर्दयतापूर्वक बहुत मारते हैं / राजा भी क्रोध करके उसे तोप के सामने खड़ा करके उड़ा देता है। चोर इस भव में भी बहुत दुःख भोगकर मरता है और परभव में भी उसे अधोगति प्राप्त होती है। चोरी नामक व्यसन अनेक विपत्तियों की जड़ है। उसमें प्रत्यक्ष ही बहुत दुः ख दिखाई देता है। समझदार व्यक्ति तो दूसरे के अदत्त (बिना दिये हुए) धन को अंगारे के समान समझकर कभी अपने हाथ से छूते भी नहीं।

छप्पयकुगति-वहन गुनगहन-दहन दावानल-सी है ।सुजसचंद्र-घनघटा देहकृशकरन खई1 है ॥धनसर-सोखन धूप धरमदिन-साँझ समानी ।विपतिभुजंग-निवास बांबई वेद बखानी ॥इहि विधि अनेक औगुन भरी, प्रानहरन फाँसी प्रबल ।मत करहु मित्र ! यह जान जिय, परवनिता सौं प्रीति पल ॥57॥

34 – परस्त्रीत्याग-प्रशंसा

परनारी एक ऐसी ज्वलित दीपक की लौ है जिस पर मूर्ख प्राणीरूपी पतंगे गिरते हैं, दुःख पाते हैं और जलकर प्राण गँवा देते हैं; रोकने और समझाने पर भी नहीं मानते, हठपूर्वक जलते ही हैं। विवेकी पुरुष इन्द्रियों के वश होकर ऐसा अनुचित कार्य नहीं करते। अहो ! जो व्यक्ति परनारी को देखकर अपनी नजर धरती की ओर नीची कर लेते हैं; वे धन्य हैं ! धन्य हैं !! धन्य हैं !!!जो व्यक्ति शीलरूपी सर्वोत्तम कार्य में दृढ़तापूर्वक लगे हैं, वे ही आर्य पुरुष हैं – श्रेष्ठ पुरुष हैं, वे ही जगत् में यश प्राप्त करते हैं। आचार्य कहते हैं कि ऐसे ही व्यक्तियों की आँखें वास्तव में कमल की उपमा देने लायक हैं, क्योंकि वे आँखें परस्त्री के मुखरूपी चन्द्रमा को देखकर सदा मुंद जाने की आदत ग्रहण किये हुए हैं। धन्य है ऐसे व्यक्तियों का जीवन तथा धन्य हैं उनकी मातायें जो ऐसे आर्यपुरुषों को अपने गर्भ में धारण करती हैं ।1: पाठान्तर – माँझ।

मत्तगयन्द सवैयाजे परनारि निहारि निलज्ज, हँसैं विगसैं बुधिहीन बड़े रे ।जूँठन की जिमि पातर पेखि, खुशी उर कूकर होत घनेरे ॥है जिनकी यह टेव वहै, तिनकौं इस भौ अपकीरति है रे ।है परलोक विषैं दृढ़दण्ड1, करै शतखण्ड सुखाचल केरे ॥60॥

36 – व्यसन-सेवन के उदाहरण व फल

1. पाठान्तर : सहे।पांडवों के राजा युधिष्ठिर ने जुआ नामक प्रथम व्यसन के सेवन से सब कुछ खो दिया, राजा बक ने मांस खाकर बहुत कष्ट उठाये, यादव बिना जाने मद्यपान कर जल मरे, चारुदत्त ने वेश्याव्यसन में फंसकर बहुत दुःख भोगे, राजा ब्रह्मदत्त (चक्रवर्ती) शिकार के कारण नरक गया, चोरी के कारण – धरोहर के प्रति नियत खराब कर लेने के कारण – शिवभूति ब्राह्मण ने बहुत दुःख सहा, और रावण परस्त्री में आसक्त होकर नरक गया। अहो ! जब एक-एक व्यसन का सेवन करने वालों की ही यह दुर्दशा हुई, तो जो सातों का सेवन करते हैं उनकी क्या दुर्दशा होगी?विशेष :-प्रस्तुत छन्द में कवि ने सातों व्यसनों के दृष्टान्तस्वरूप क्रमश: सात कथा-प्रसंगों की ओर संकेत किया है, जिनकी पूर्ण कथा प्रथमानुयोग के ग्रन्थों में प्राप्त होती है। अतिसंक्षेप में वे इसप्रकार हैं -1. जुआ : इसमें महाराजा युधिष्ठिर की कथा सुप्रसिद्ध है / एक बार युधिष्ठिर ने कौरवों के साथ जुआ खेलते हुए अपना सब-कुछ दाव पर लगा दिया था और पराजित होकर उन्हें राज्य छोड़कर वन में जाना पड़ा था। वन में उन्होंने अपार दु:ख सहन किये।2. मांस-भक्षण : मनोहर देश के कुशाग्र नगर में एक भूपाल नाम का धर्मात्मा राजा राज्य करता था। उसने नगर में जीव-हिंसा पर प्रतिबंध घोषित कर रखा था। किन्तु उसका अपना पुत्र बक ही बड़ा मांस-लोलुपी था। वह मांस के बिना नहीं रह सकता था, अत: उसने रसोइये को धनादि का लालच देकर अपने लिए मांसाहार का प्रबन्ध कर लिया। एक दिन रसोइये को किसी भी पशु-पक्षी का मांस नहीं मिला, अतः उसने श्मशान में से गड़े हुए बालक को निकालकर उसका ही मांस राजकुमार बक को खिला दिया। राजकुमार बक को यह मांस बहुत स्वादिष्ट लगा। उसने प्रतिदिन ऐसा ही मांस खाने की अभिलाषा व्यक्त की। रसोइया धनादि के लालच में ऐसा ही करने को तैयार हो गया। अब वह प्रतिदिन नगर के बालकों को मिठाई देने के बहाने बुलाता और उनमें से किसी एक बालक को छुपकर मार डालता। नगर में बालकों की संख्या घटने लगी। अंत में सारा भेद खुल गया। राजकुमार बक को देश निकाला मिला। वह इधर-उधर भटकता-भटकता नरभक्षी राक्षस बन गया। एक बार वसुदेव से उसकी भेंट हुई। वसुदेव ने उसे मार डाला।3. मदिरापान : भगवान नेमिनाथ के समय की बात है। एक बार द्वारिकानिवासी यादवगण (यदुवंशी मनुष्य) वन-क्रीड़ा हेतु नगर से बाहर निकले। वहाँ उन्हें बहुत प्यास लगी और उन्होंने अनजाने में ही एक ऐसे जलाशय का जल पी लिया जो वस्तुतः सामान्य जल नहीं, अपितु कदम्ब फलों के कारण मदिरा ही बन चुका था। इससे वे सब मदोन्मत्त होकर द्वीपायन मुनि को परेशान करने लगे। परिणामस्वरूप द्वीपायन की क्रोधाग्नि में जलकर समूची द्वारिका के साथ. साथ वे भी भस्म हो गये।4. वेश्यासेवन : चम्पापुरी में सेठ भानुदत्त और सेठानी सुभद्रा के एक चारुदत्त नाम का वैराग्य प्रकृति का पुत्र था। परन्तु उसे विषयभोगों की ओर से उदासीन रहकर उसकी माँ को बहुत दुःख होता था, अत: माँ ने उसे व्यभिचारी पुरुष की संगति में डाल दिया। इससे चारुदत्त शनैः-शनैः विषयभोगों में ही बुरी तरह फँस गया। वह 12 वर्ष तक वेश्यासेवन में लीन रहा। उसने अपना धन, यौवन, आभूषण आदि सब कुछ लुटा दिया। और अन्त में जब उसके पास कुछ भी शेष नहीं बचा तो वसन्तसेना वेश्या ने उसे घर से निकलवा कर गन्दे स्थान पर फिकवा दिया।5. शिकार : राजा ब्रह्मदत्त शिकार का प्रेमी था। वह प्रतिदिन वन के निरीह प्राणियों का शिकार करके घोर पाप का बन्ध करता था। एक दिन उसे कोई शिकार नहीं मिला। उसने इधर-उधर देखा तो एक मुनिराज बैठे थे। उसने समझा कि इन्हीं के कारण आज मुझे कोई शिकार नहीं मिला है। उसने अपने मन में मुनिराज से बदला लेने की ठानी। दूसरे दिन जब मुनिराज आहार हेतु गये, तब उसने उस शिला को अत्यधिक गर्म कर दिया। मुनिराज आहार करके आये तो अचल योग धारण करके उसी शिला पर बैठ गये। उनका शरीर जलने लगा, पर वे विचलित नहीं हुये। परिणामस्वरूप मुनिराज को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। उधर राजा ब्रह्मदत्त को घर जाने के बाद भयंकर कोढ़ हो गया। उसके शरीर से दुर्गध आने लगी। सबने उसका साथ छोड़ दिया। वह मरकर सातवें नरक में गया। नरक से निकलने के बाद महादुर्गन्ध शरीरवाली धीवर कन्या हुआ और उसके बाद भी अनेक जन्मों में उसने वचनातीत कष्टों को सहन किया।6. चोरी : सिंहपुर नगर में एक शिवभूति नाम का पुरोहित था। यद्यपि वह बडा चोर और बेईमान था, पर उसने मायाचारी से अपने संबंध में यह प्रकट कर रखा था कि मैं बड़ा सत्य बोलने वाला हूँ। वह कहता था कि देखो, मैं अपने पास सदा यह चाकू रखता हूँ, ताकि झूठ बोलूँ तो तुरन्त अपनी जीभ काट डालूँ। इससे अनेक भोले लोग उसे 'सत्यघोष' ही कहने-समझने लगे। यद्यपि अनेक लोग इस शिवभूति पुरोहित के चक्कर में आकर ठगाये जा चुके थे, पर कोई उसे झूठा नहीं सिद्ध कर पाता था। एक बार एक समुद्रदत्त नामक वणिक विदेश जाते समय अपने पाँच बहुमूल्य रत्नों को उस शिवभूति के पास रखकर गया और वहाँ से लौटकर उसने अपने रत्न वापस माँगे। हमेशा की तरह इस बार भी शिवभूति ने साफ-साफ इनकार कर दिया। बेचारा समुद्रदत्त दुःखी होकर रोता हुआ इधर-उधर घूमने लगा। आखिरकार रानी की कुशलता से शिवभूति का अपराध सामने आ गया। दण्डस्वरूप उसे तीन सजाएँ सुनाई गईं कि या तो वह अपना सर्वस्व देकर देश से बाहर चला जावे अथवा पहलवान के 32 मुक्के सहन करे अथवा तीन परात गोबर खाए। उसने सर्वप्रथम तीन परात गोबर खाना स्वीकार किया। पर नहीं खा सका। फिर उसने पहलवान के 32 मुक्के खाना स्वीकार किया, पर वे भी उससे सहन नहीं हुए और अन्त में उसे अपना सर्वस्व देकर नगर से बाहर जाना पड़ा।7. परस्त्री-सेवन : इसमें रावण की कथा सर्वजनप्रसिद्ध ही है, अतः उसे यहाँ नहीं लिखते हैं / रावण सीता के प्रति दुर्भाव रखने के कारण ही नरक गया ॥61॥ एक पाप नाम का राजा है जो नरकरूपी नगर में राज्य करता है और उसी ने अपने नगर की समृद्धि के लिए इस लोक में अपने सप्त व्यसनरूपी दूत छोड़ रखे हैं ॥62॥जिनके हृदय में जिनेन्द्र भगवान के वचनों की प्रतीति हुई हो और जो नरकवास से भयभीत हों, वे इन व्यसनों के प्रति अनुराग का त्याग करो ॥63॥

मत्तगयन्द सवैयाराग उदै जग अंध भयौ, सहजै सब लोगन लाज गवाँई ।सीख बिना नर सीख रहे, विसनादिक1 सेवन की सुघराई ।ता पर और रचैं रसकाव्य, कहा कहिये तिनकी निठुराई ।अंध असूझन की अँखियान मैं, झोंकत हैं रज रामदुहाई ॥64॥मत्तगयन्द सवैयाकंचन कुम्भन की उपमा, कह देत उरोजन को कवि बारे ।ऊपर श्याम विलोकत कै2, मनिनीलम की ढकनी ढँकि छारे ॥यौं सत वैन कहैं न कुपंडित, ये जुग आमिषपिंड उघारे ।साधन झार दई मुँह छार, भये इहि हेत किधौं कुच कारे ॥६५॥मत्तगयन्द सवैयाए विधि ! भूल भई तुमतैं, समुझे न कहाँ कसतूरि बनाई ।दीन कुरंगन के तन मैं, तृन दंत धरैं करुना किन3 आई ॥क्यौं न करी तिन जीभन जे, रसकाव्य करैं पर कौं दुखदाई ।साधु-अनुग्रह दुर्जन-दण्ड, दुहू सधते विसरी चतुराई ॥६६॥

38 – मन-रूपी हाथी

हे मनुष्य ! तुम्हारा मनरूपी हाथी बुरी तरह विचरण कर रहा है, तुम इसे वैराग्यरूपी स्तंभ से बाँधो। इस मनरूपी हाथी ने ज्ञानरूपी महावत को गिरा दिया है, सुमतिरूपी साँकल के टुकड़े-टुकड़े कर दिये हैं, गुरुवचनरूपी अंकुश की उपेक्षा कर रखी है और ब्रह्मचर्यरूपी वृक्ष को उखाड़ फेंका है। तथा यह मनरूपी हाथी सिद्धान्त (शास्त्र) रूपी सरोवर में स्नान करके भी पापरूपी धूल से खेल रहा है, अपने इन्द्रियरूपी कानों को चपलता-पूर्वक बारम्बार हिला रहा है और कुमतिरूपी हथिनी के साथ रतिक्रीड़ा कर रहा है। _इस प्रकार यह मनरूपी हाथी अत्यधिक मदोन्मत्त होता हुआ स्वच्छंदतापूर्वक घूम रहा है, गुणरूपी राहगीर इसके पास तक नहीं आ रहे हैं; अतः इसे वैराग्यरूपी स्तंभ से बाँधो। तात्पर्य यह है कि हमें अपने चंचल मन को वैराग्य-भावना के द्वारा स्थिर या एकाग्र करना चाहिए, अन्यथा यह हमारे ज्ञान, शील आदि सर्व गुणों का विनाश कर देगा और हमारे ऊपर गुरुवचनों व जिनवचनों का कोई असर नहीं होने देगा। जबतक हमारा मन चंचल है तब तक कोई सद्गुण हमारे समीप तक नहीं आएगा।

कवित्त मनहरढई-सी सराय काय पंथी जीव वस्यौ आय,रत्नत्रय निधि जापै मोख जाकौ घर है ।मिथ्या निशि कारी जहाँ मोह अन्धकार भारी,कामादिक तस्कर समूहन को थर है।सोवै जो अचेत सोई खोवै निज संपदा कौ,तहाँ गुरु पाहरु पुकारैं दया कर है।गाफिल न हजै भ्रात ! ऐसी है अँधेरी रात,जाग रे बटोही ! इहाँ चोरन को डर है ॥68॥

40 – कषाय जीतने का उपाय

क्रोधरूपी पिशाच, जिसमें कुशलता निवास करती है ऐसी क्षमा की धूनी दिये बिना दूर नहीं हटेगा, मानरूपी प्रबल मदिरा कोमलभाव के बिना नहीं उतरेगी, छलरूपी बेल आर्जवरूपी तीक्ष्ण कुल्हाड़ी के बिना नहीं कटेगी, और लोभरूपी विषैले सर्प का जहर सन्तोषरूपी महामन्त्र के जाप बिना नहीं उतरेगा। तात्पर्य यह है कि क्रोध, मान, माया और लोभरूप कषायों का अभाव करने का एक मात्र उपाय उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव और उत्तम शौचरूप आत्मधर्म ही है।

मत्तगयन्द सवैयाकाहे को बोलत बोल बुरे नर ! नाहक क्यौं जस-धर्म गमावै ।कोमल वैन चवै किन ऐन, लगै कछ है न सबै मन भावै ।तालु छिदै रसना न भिदै, न घटैं कछु अंक दरिद्र न आवै ।जीभ कहैं जिय हानि नहीं तुझ, जी सब जीवन कौ सुख पावै ॥70॥

42 – धैर्य-धारण का उपदेश

हे भाई ! यदि तुम्हारे ऊपर भयानक असाता कर्म का अचानक उदय आ गया है तो तुम इससे अधीर क्यों होते हो, क्योंकि अब इसे टालने में कोई समर्थ नहीं है। तुमने स्वयं ने अपनी इच्छानुसार प्रवर्तन करके जो-जो पाप पहले कमाये थे, वे ही अब अपना उदयकाल आने पर तुम्हारे पास आये हैं। तुम्हारे कर्मों के इस फल को अब दूसरा कोई नहीं बाँट सकता, तुम्हें स्वयं अकेले ही भोगना होगा। अत: अब चिंतित या उदास (दुःखी) होने से कोई लाभ नहीं है। चिन्ता करने से या उदास रहने से दु:ख मिट नहीं जावेगा। अत: हे मेरे सयाने भाई! तुम ज्ञाता-द्रष्टा बने रहो – तमाशा देखने वाले बने रहो।

कवित्त मनहरकैसे कैसे बली भूप भू पर विख्यात भये,वैरीकल काँपैं नेकु भहौं के विकार सौं ।लंघे गिरि-सायर दिवायर-से दिपैं जिनों,कायर किये हैं भट कोटिन हुँकार सौं ॥ऐसे महामानी मौत आये हू न हार मानी,क्यों ही उतरे न कभी मान के पहार सौं ।देव सौं न हारे पुनि दानो सौं न हारे और,काहू सौं न हारे एक हारे होनहार सौं ॥७२॥

44 – काल-सामर्थ्य

एक लौहमय किला बनवाइये, उसे अनेक परकोटों से घिरवा दीजिये, परकोटों के कंगूरों पर तोपें रखवा दीजिये, इन्द्र-चन्द्रादि जैसे सावधान पहरेदारों को चौकन्ने होकर पहरे पर बिठा दीजिये, किवाड़ भी बन्द कर लीजिये, चारों ओर चतुरंगिणी सेना का घेरा डलवा दीजिये तथा आप उस लौहमय किले के तलघर में जाकर बैठ जाइये, कोई चाहे कितनी ही आवाजें लगावे, आप बोलिये तक नहीं। इसी प्रकार के और भी कितने ही इन्तजामों (तामझाम) का ढेर लगा दीजिए, पर यह हमने खूब खोजकर देख लिया है कि मृत्यु कभी नहीं छोड़ती ॥73॥यह निश्चित है कि मृत्यु से बचा नहीं जा सकता है, तथापि अज्ञानी प्राणी निरन्तर भयभीत बना रहता है । वह सदा सुखसामग्री की इच्छा करता रहता है, किन्तु न तो उनकी प्राप्ति होती है और न कभी उसके मनोरथ पूरे होते हैं । परन्तु फिर भी वह भय और आशा से बँधा रहता है और व्यर्थ ही दुःखरूपी प्रबल आग में जलता रहता है। हे विचक्षण ! तुम इन मूर्खता के लक्षणों को त्याग कर एवं धैर्य धारण कर सुखी क्यों नहीं हो जाते हो? ॥74॥विशेष :- इसी प्रकार का भाव आचार्य समन्तभद्र ने भी स्वयंभू स्तोत्र, छन्द 34 में प्रकट किया है ।

मत्तगयन्द सवैयाजो धनलाभ लिलार लिख्यौ, लघु दीरघ सुक्रत के अनुसारै ।सो लहिहै कछू फेर नहीं, मरुदेश के ढेर सुमेर सिधारै ॥घाट न बाढ़ कहीं वह होय, कहा कर आवत सोच-विचारै ।कूप किधौं भर सागर मैं नर, गागर मान मिलै जल सारै ॥75॥

46 – आशारूपी नदी

आशारूपी नदी बड़ी अगाध – गहरी है। यह मोहरूपी महान् पर्वत से ढलकर आई है, तीनों लोकरूपी पृथ्वी पर बह रही है, इसमें विविध मनोरथमयी जल भरा हुआ है, तृष्णारूपी तरंगों के कारण इसमें आकुलता उत्पन्न हो रही है, भ्रमरूपी भँवरें पड़ रही हैं, रागरूपी बड़ा मगरमच्छ इसमें रहता है, चिन्तारूपी इसके विशाल तट हैं, और यह धर्मरूपी विशाल वृक्ष को गिरा कर बह रही है। अहो ! वे साधु धन्य हैं, जिन्होंने धैर्यरूपी जहाज पर चढ़कर इस आशा नदी को पार कर लिया है।

कवित्त मनहरजीवन कितेक तामैं कहा बीत बाकी रह्यौ,तापै अंध कौन-कौन करै हेर फेर ही ।आपको चतुर जानै औरन को मूढ़ मानै, साँझ होन आई है विचारत सवेर ही ॥चाम ही के चखन तैं चितवै सकल चाल,उर सौं न चौंधे, कर राख्यौ है अँधेर ही ।बाहै बान तानकैं अचानक ही ऐसौ जम,दीसहै मसान थान हाड़न कौ ढेर ही ॥७७॥कवित्त मनहरकेती बार स्वान सिंघ सावर सियाल साँप,सिँधुर सारङ्ग सूसा सूरी उदरै पर्यो ।केती बार चील चमगादर चकोर चिरा,चक्रवाक चातक चँडुल तन भी धर्यौ ।केती बार कच्छ मच्छ मेंडक गिंडोला मीन,शंख सीप कौंड़ी ह्वै जलूका जल मैं तिर्यो ।कोऊ कहै 'जाय रे जनावर !' तो बुरो मानै,यौं न मूढ़ जानै मैं अनेक बार ह्वै मर्यौ ॥78॥

48 – दुष्ट कथन

दुर्जन वास्तव में सर्प के समान है, क्योंकि उसमें सर्प की बहुत आदतें (विशेषताएँ) मिलती हैं। यथा : जिसप्रकार सर्प दूध पीकर भी जहर ही उगलता है, उसीप्रकार दुर्जन व्यक्ति भी गुणरूपी अमृत पीकर भी दोषरूपी भीषण जहर ही उगलता है। जिसप्रकार सर्प कभी अपनी टेढ़ी चाल को नहीं छोड़ता, उसी प्रकार दुर्जन व्यक्ति भी कभी मायाचार रूपी वक्रता का त्याग नहीं करता। जिसप्रकार सर्प के मुँह में दो जीभ होती हैं, उसीप्रकार दुर्जन भी दोगला होता है, वह कभी किसी को कुछ कहता है, और कभी किसी से कुछ और ही कहता है। जिसप्रकार सर्प सदा बिल की खोज में रहता है, उसीप्रकार दुर्जन भी सदा बुराइयों की ही खोज में रहता है । जिसप्रकार सर्प को जलता हुआ दीपक पसन्द नहीं होता, उसीप्रकार दुर्जन को दूसरे की उन्नति पसन्द नहीं होती। जिसप्रकार सर्प दूसरों को अकारण ही दुःखी करता है, उसीप्रकार दुर्जन भी दूसरों को अकारण ही परेशान करता है। जिसप्रकार सर्प जहर को कभी नहीं छोड़ता, उसीप्रकार दुर्जन भी बैररूपी जहर को कभी नहीं छोड़ता। जिसप्रकार सर्प मंत्र से वशीभूत हो जाता है, उसीप्रकार दुर्जन भी मौनरूपी श्रेष्ठ मन्त्र से वशीभूत हो जाता है । जिसप्रकार सर्प की संगति से व्यक्ति की हानि होती है, उसीप्रकार दुर्जन की संगति से भी व्यक्ति की हानि होती है।

कवित्त मनहरसज्जन जो रचे तौ सुधारस सौ कौन काज,दुष्ट जीव किये कालकूट सौं कहा रही ।दाता निरमापे फिर थापे क्यौं कलपवृक्ष,जाचक विचारे लघु तृण हू तैं हैं सही ॥इष्ट के संयोग तैं न सीरौ घनसार कछु,जगत कौ ख्याल इन्द्रजाल सम है वही ।ऐसी दोय-दोय बात दीखैं विधि एक ही सी,काहे को बनाई मेरे धोखौ मन है यही ॥80॥

50 – चौबीस तीर्थङ्करों के चिह्न

श्री ऋषभदेव से महावीर पर्यन्त चौबीस तीर्थङ्करों के चौबीस सुन्दर चिह्न क्रमशः इसप्रकार हैं :- 1. बैल, 2. हाथी, 3. घोड़ा, 4. बन्दर, 5. चकवा, 6. कमल, 7. साँथिया, 8. चन्द्र, 9. मगर, 10. कल्पवृक्ष, 11. गैंडा, 12. भैंसा, 13. शूकर, 14. सेही, 15. वज्र, 16. हिरन, 17. बकरा, 18. मछली, 19. कलश, 20. कछुआ, 21. नीलकमल, 22. शंख, 23. सर्प, 24. सिंह।

कवित्त मनहरआदि जयवर्मा, दूजे महाबल भूप, तीजे,सुरग ईशान ललितांग देव थयौ है ।चौथे वज्रजंघ, एह पाँचवें जुगल देह,सम्यक् ले दूजे देवलोक फिर गयौ है ॥सातवें सुबुद्धिराय, आठवैं अच्युत-इन्द्र,नवमैं नरेंद्र वज्रनाभ नाम भयौ है ।दशैं अहमिन्द्र जान, ग्यारवैं रिषभ-भान,नाभिनंद1 भूधर के सीस जन्म लयौ है ॥82॥

52 – श्री चन्द्रप्रभ के पूर्वभव

आठवें तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ के 7 भव क्रमशः इसप्रकार हैं : 1. श्रीवर्मा नामक राजा, 2. पहले स्वर्ग में देव, 3. अजितसेन चक्रवर्ती, 4. सोलहवें स्वर्ग में इन्द्र, 5. पद्मनाभि राजा, 6. वैजयन्त नामक दूसरे अनुत्तर विमान में देव, 7. चन्द्रप्रभ स्वामी।

सवैयासिरीसेन, आरज, पुनि स्वर्गी, अमिततेज खेचर पद पाय ।सुर रविचूल स्वर्ग आनत मैं, अपराजित बलभद्र कहाय ॥अच्युतेन्द्र, वज्रायुध चक्री, फिर अहमिन्द्र, मेघरथ राय ।सरवारथसिद्धेश, शांति जिन, ये प्रभु की द्वादश परजाय ॥84॥

54 – श्री नेमिनाथ के पूर्वभव

बाईसवें तीर्थंकर श्री नेमिनाथ के 10 भव क्रमशः इसप्रकार हैं: 1. वन में भील, 2. अभिकेतु नामक सेठ, 3. सौधर्म स्वर्ग में देव, 4. चिंतागति विद्याधर, 5. चौथे स्वर्ग में देव, 6. अपराजित राजा, 7. अच्युत स्वर्ग में इन्द्र, 8. सुप्रतिष्ठ राजा, 9. जयन्त विमान में देव, 10. नेमिनाथ ।

सवैयाविप्रपूत मरुभूत विचच्छन, वज्रघोष गज गहन मँझार ।सुरि, पुनि सहसरश्मि विद्याधर, अच्युत स्वर्ग अमरि-भरतार ॥मनुज-इन्द्र, मध्यम ग्रैवेयिक, राजपुत्र आनन्दकुमार ।आनतेंद्र, दशवैं भव जिनवर, भये पार्श्वप्रभु के अवतार ॥86॥

56 – राजा यशोधर के भवान्तर

राजा यशोधर और रानी चन्द्रमती ने आटे के मुर्गे की बलि देने के कारण क्रमश: इन सात भवों में अपार कष्ट सहन किये :- 1. मोर-मोरनी, 2. सर्पसर्पिणी, 3. मच्छ-मच्छी, 4. बकरा-बकरी, ५-भैंसा-भैंस, 6. बकरा-बकरी और 7. मुर्गा-मुर्गी । ज्ञानी पुरुष उनकी कहानी सुनकर अपने हृदय में बहुत वैराग्य उत्पन्न करते हैं।

मनहर कवित्तकहै एक सखी स्यानी सुन री सुबुद्धि रानी!तेरौ पति दुखी देख लागै उर आर है ।महा अपराधी एक पुग्गल है छहौं माहिं,सोई दुख देत दीसै नाना परकार है ।कहत सुबुद्धि आली कहा दोष पुग्गल कौं, अपनी ही भूल लाल होत आप ख्वार है ।खोटौ दाम आपनो सराफै कहा लगै वीर,काहू को न दोष मेरौ भौंदू भरतार है ॥८८॥

58 – गुजराती भाषा में शिक्षा

हे भोले भाई ! तुम सुख के पिण्ड हो। तुम्हारा रूप ज्ञानमय है, सुन्दर है, शाश्वत (सतत) है। तुम उसे पहिचानते क्यों नहीं हो? तथा शरीर तुमसे भिन्न है, पराया है, तुम उससे राग क्यों करते हो? उसका स्वरूप तो बरसात के ओले की भाँति क्षणभंगुर है। हे भाई! इस राग के कारण तुमने मेरु पर्वत के समान अपार दुःख झेले हैं, कभी एक तोला भी सुख प्राप्त नहीं किया, फिर भी तुम पुनः वही दुःखरूपी वृक्ष का बीज बो रहे हो और स्वयं ही अपने आपको भूल रहे हो।

मत्तगयन्द सवैयाशीत सहैं तन धूप दहें, तरुहेट रहैं करुना उर आनैं ।झूठ कहैं न अदत्त गहैं, वनिता न चहैं लव लोभ न जानैं ।मौन वहैं पढ़ि भेद लहैं, नहिं नेम जहैं व्रतरीति पिछानैं ।यौं निबहैं पर मोख नहीं, विन ज्ञान यहै जिन वीर बखानैं ॥90॥

60 – अनुभव-प्रशंसा

हे भाई ! यह मनुष्यजीवन वैसे ही बहुत थोड़ी आयुवाला है, ऊपर से उसमें बुद्धि और बल भी बहुत कम है, जबकि आगम तो अगाध समुद्र के समान है, अत: इस जीवन में उसका पार कैसे पाया जा सकता है? अत: हे भाई! वस्तुतः सम्पूर्ण द्वादशांगरूप जिनवाणी का मूल तो एक आत्मा का अनुभव है, जो बड़ी अपूर्व कला है और संसाररूपी ताप को शान्त करने के लिए चन्दन की शलाका है। अत: इस जीवन में एकमात्र आत्मानुभवरूप अपूर्व कला को ही सीख लो, उसका ही अभ्यास करो और उसको ही भरपूर आनन्द प्राप्त करो। यही भगवान महावीर की वाणी है। हे भाई! एक आत्मानुभव ही सारभूत है – प्रयोजनभूत है, करने लायक कार्य है, और इस आत्मानुभव के अतिरिक्त अन्य सब तो बस कोरी बातें हैं।

कवित्त मनहरआगम-अभ्यास होहु सेवा सरवज्ञ ! तेरी,संगति सदीव मिलौ साधरमी जन की ।सन्तन के गुन कौ बखान यह बान परौ,मेटौ टेव देव ! पर-औगुन-कथन की ॥सब ही सौं ऐन सुखदैन मुख वैन भाखौं, भावना त्रिकाल राखौं आतमीक धन की ।जौलौं कर्म काट खोलौं मोक्ष के कपाट तौलौं,ये ही बात हूजौ प्रभु! पूजौ आस मन की ॥९२॥

62 – जिनधर्म-प्रशंसा

अनादिकालीन अज्ञान के कारण संसारी प्राणियों की आँखें बन्द पड़ी हैं। उनके लिए अन्य सब मत तो धूल की मुट्ठी के समान हैं, अज्ञानी जीवों के अज्ञान का ही पोषण करते हैं; लेकिन जैनधर्म अंजन के समान है, जो जीवों के अज्ञान का अभाव करने वाला है ॥93॥भ्रमरूपी नदी को तिरने के लिए जैनधर्म के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है। जैनेतर सभी मत उस नदी के खोटे घाट हैं; एक जैनधर्म ही राजघाट है – सच्चा मार्ग है ॥94॥तीनों लोकों में त्रस और स्थावर जीव भरे हुए हैं। वहाँ अन्य सब मत तो उनके भक्षक हैं और जैनधर्म उनका सदा रक्षक है ॥95॥अहो, इस अपार संसार-सागर से पार होने के लिए जैनधर्म के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है, नहीं है। यहाँ अन्य सभी धर्म (मत/सम्प्रदाय) तो पत्थर की नौका के समान हैं, केवल एक जैनधर्म ही पार उतारने वाला जहाज है ॥96॥इस दुनिया में अन्यमतों को मानने वाले सब लोग मिथ्यास्व की मदिरा पीकर मतवाले हो रहे हैं। किन्तु जिनमत को अपनाने वाला कभी मदोन्मत्त नहीं होता – मिथ्यात्व का सेवन नहीं करता ॥97॥अन्यमतों को माननेवाले सब लोग अपने-अपने मत के अभिमानरूपी पहाड़ पर चढ़कर अपने ही मन में बड़े बन रहे हैं, वे अपने आगे सारी दुनिया को छोटा समझते हैं, कभी भी कैसे भी अभिमान के पहाड़ से नीचे नहीं उतरते ॥98॥जैनमत और अन्यमतों में इतना बड़ा अन्तर है कि अन्यमतों को मानने वाले तो चर्मचक्षुओं से ही देखकर निर्णय करते हैं, किन्तु जैन ज्ञानचक्षुओं से देखता है ॥99॥जिसप्रकार बजाज अनेक वस्त्रों को पास-पास रखकर श्रेष्ठ वस्त्र की परीक्षा (पहचान) कर लेता है; उसीप्रकार सत्यनिष्ठ पुरुष विभिन्न मतों की भलीभाँति तुलना करके श्रेष्ठ मत की परीक्षा (पहचान) कर लेता है ॥100॥जिनमत में निश्चय-व्यवहार नय रूप दो पक्ष हैं, जिनके बिना यह आत्मा संसार-सागर को पार कर मोक्ष की प्राप्ति कभी नहीं कर सकता। * किसी-किसी प्रति में 'मत' के स्थान पर 'जनि' लिखा मिलता है और वह भी ठीक हो सकता है। ब्रजभाषा में 'जनि' का अर्थ भी निषेध ही है हे दयाल ! तीन लोक तीन काल में आज तक जितने भी सिद्ध हुए हैं, हो रहे हैं, और भविष्य में होंगे; वह सब एकमात्र जिनमत का ही उपकार है। इसमें शंका न करो ॥102॥अहो! जिनेन्द्र भगवान के वचनों की महिमा वचनों से नहीं हो सकती ।अपार समुद्र को भुजाओं के बल से तैरकर न कभी कोई पार कर पाया, न कर पायेगा ॥103॥हे बुद्धिमान भाई ! हमारी उक्त बातों को, जिनमें अन्यमतों से जिनमत की श्रेष्ठता बताई गई है, वैसा ही मतपोषण करना मत समझना, जैसा कि दुनिया के सब लोग अपने-अपने मतों का पोषण करते हैं ॥104॥1. पाठान्तर : सरल।अहो ! इस असार संसार में जैनधर्म के अतिरिक्त अन्य कोई शरण नहीं है, साधन नहीं है। हमें जन्म-जन्म में जिनधर्म की ही सहायता प्राप्त होवे ॥105॥

मैं, भूधरदास खण्डेलवाल, आगरा में बालकों के खेल जैसी कविता-रचना करता हूँ। ये उक्त छन्द मैंने जयपुर के श्री हरिसिंहजी शाह के बंशज धर्मानुरागी हाकिम श्री गुलाबचन्द्रजी के अनुरोध से एकत्रित किये हैं / उन्हीं की पुनः-पुनः प्रेरणा से मेरे आलस्य का अन्त हुआ है। मैं उनका हृदय से आभार मानता हूँ ॥106॥यह शतक पौप कृष्णा त्रयोदशी रविवार विक्रम संवत् 1781 को पूरा किया ॥107॥

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