[चारु] सुन्दर चरणों और आचरण वाले, चित्त को हरने वाले चंद्रमा के चिन्ह से सुशोभित चरण, परम पवित्र चंद्रमा के सामान स्वच्छ [तनचरित] शरीर और चारित्र के धारक चन्द्रप्रभ भगवान, उन [चंदथल] चन्द्रप्रभ की शरण भक्त / धर्मात्मा चाहते हैं, जिन्होनें चार [चंड] निर्दयी (घातिया कर्म) कर्म को नष्ट कर दिया है, [चिदचक्र] चैतन्य समूह के चार गुणों (अनंत चतुष्टय) के भंडार / धारक हैं, जिन्हे निरंतर इंद्र, चक्रवर्ती, धनुषधारी [चूलनत] सभी नमस्कार करते हैं, ऐसे भगवान आप हैं ।
आप [चर] त्रस व [अचर] स्थावर जीवों के [हितू] हितकारी है (क्योकि उनकी अहिंसा का निरंतर आप उपदेश देते है) आप संसार को [तारन] स्वयं पार करने तथा [तरन] अन्यों को पार कराने वाले है । आपके [शुचि] पवित्र [चिरनंद] अनंतसुख की चर्चा सुनकर भव्य जीव प्रसन्न हो जाते है । ऐसे चन्द्रप्रभ भगवान् के चरणों की [चरच्यो] पूजा करने को [चहत] इच्छा रखता हुआ मेरा चित रुपी चकोर नाच / (प्रसन्न हो) रहा है । अर्थात ऐसे चन्द्र प्रभु भगवान् की मैं हृदय से पूजा कर रहा हूँ ।
शरीर डेढ़सौ धनुष [तुंग] ऊंचा, महासेन [नृप] राजा के [नंद] पुत्र, माता लछमना के उर से उत्पन्न चन्द्रप्रभ भगवान् की मैं यहाँ स्थापना करता हूँ ।
हे [वर] श्रेष्ठ वीर ! [गंगाहृद] गंगा नदी का स्वच्छ [नीर] जल, [हाटक] स्वर्ण के [भृंग] घड़े में भरकर, मैं आपके चरणों की [जजों] पूजा करता हूँ । आप मेरे जन्म और बुढ़ापे को नष्ट कर दीजिये । श्री चन्द्रप्रभ भगवान् की [दुति] कांति [चंद] चंद्रमा समान है, उनके चरणों में [चंद] चंद्रमा का चिन्ह है, मैं मनवचनकाय और [अमंद] अच्छे/शुद्ध भावों से अपनी आत्मा का प्रकाश जागृत करने के लिये / आत्मा के भान के लिए उनकी [जजत] पूजा करता हूँ ।
मैं [श्रीखण्ड] चंदन और [सुचंग] श्रेष्ठ कपूर लेकर केशर के रंग से परिपूर्ण, प्रासुक जल में घिस कर आपको, अपने संसार के दुखों के निवारण हेतु, अर्पित करता हूँ ।
[सोम] चद्रमा के समान [सित] सफ़ेद शालीवन के [अनियारे] साबुत [तंदुल] चावलों के मनोहर पुंज लेकर आपके [पदतर] पूजनीय चरणों में अक्षय पद की प्राप्ति के लिए रख रहा हूँ ।
मैं [सुर] देवताओं के [द्रुम] वृक्षों अर्थात कल्पवृक्ष से [सुरंग] अच्छे रंगो के सुगन्धित, [अलि] भंवरो से मंडराते [सुमन] फूलों को [तासों] आपके चरणों में [चंग] उत्साहपूर्वक [काम बिथा] कामवासना को नष्ट करने के लिए रखता हूं ।
विभिन्न प्रकार के इंद्रियों को [बलकारी] शक्ति प्रदान करने वाले नेवज से अपनी [आकुलता हारी] क्षुधा की वेदना को नष्ट करने के लिए आपके [सार] श्रेष्ठ चरणों की पूजा करता हूँ ।
मोह रूपी [तम] अन्धकार को [भंजन] नष्ट करने के लिए, [दीप संवार] दीप को प्रज्ज्वलित करके, आपके [ढिग] समक्ष, रखता हूँ क्योकि आपमें यह गुण है इसलिए मेरा [तिमिरमोह] मोह-अन्धकार दूर कर दीजिये ।
मैं [दशगंध] दस प्रकार के सुगन्धित पदार्थो से धूप बना कर, दुष्ट कर्म को [जरि] जलाने के लिए, [हुताशन] अग्नि में [खेवतु] खेकर आप की प्रभु सेवा/पूजा कर रहा हूँ ।
मै सर्वोत्तम फलों को मंगाकर आपके गुणो को गाता हूँ, तन मन से हर्षित होकर आपकी मैं पूजा करता हूँ क्योकि आप विघ्नो को नष्ट करने वाले हैं ।
आठों [पुनीत] पवित्र द्रव्यों को [सजी] सजाकर, [आठों अंग नमों] आठों अंगो को झुक कर नमस्कार करता हुआ । आठवें हितकारी जिनेन्द्र भगवान चन्द्रप्रभू की बारम्बार, [अष्टम अवनी] आठवी पृथ्वी – सिद्धशिला, पर [गमों] जाने के लिए पूजा करता हूँ ।
चैत्र की [कलि] वदी पंचमी [अलि] बहुत [सुहात] अच्छी लगती है क्योकि इस दिन आप [गरभागम] गर्भ में पधारे थे और आपने जीवों को मंगल एवं [मोद भरी] प्रसन्नता प्रदान करी थी [हरि] इंद्र ने हर्षित होकर माता पिता की पूजा करी थी । हम आपका ध्यान करके [शर्मसिता] पवित्र सुख को प्राप्त करते है ।
भगवान् आपने पौष [कलि] वदी एकादशी को जन्म लिया था उस समय समस्त लोक [सुखथोक] पूर्णतया सुखी हो गया था । [सुर ईश] तब इंद्र ने आपकी [गिरशीश] समेरू पर्वत पर ले जाकर [जजें] पूजा करी थी । हम यहाँ [अबै] अब आपकी मस्तक झुका कर नित्य पूजा करते हैं ।
आपने पौष [कलि] कृष्ण एकादशी [पर्व वरा] श्रेष्ठ पर्व के दिन अत्यंत [दुद्धर] दुर्लभ और महान तप को धारण किया (आपका तप कल्याणक हुआ), आप अपनी आत्मा के ध्यान में लवलीन हो गए जो धन्य जीव इस दिन कि पूजा करते है उनके विघ्न नष्ट हो जाते है ।
हे [वर] भगवन् [तणों] आपने केवलज्ञान रुपी [भानु] सूर्य को [उद्योत] प्रकट किया था । [तिहुँ] तीनों लोक के जीवों का [भ्रम] मिथ्यात्व मेट दिया था फाल्गुन [कलि] कृष्ण सप्तमि के दिन इंद्र ने आपकी पूजा करी थी । हम भी आपकी पूजा करते है जिससे सभी कर्म कलंक नष्ट हो जाए ।
भगवन आप फाल्गुन [सित] शुक्ल सप्तमि को मोक्ष पधारे, आप [गुणवंत अनंत] अनंतगुणों सहित, [अबाध] बाधा रहित हो गए । [हरि] इंद्र ने आकर अत्यंत [मोद] प्रसन्नता पूर्वक [तित] आपकी [जजें] पूजा करी थी । हम भी समस्त पापों को [हरे] हरने हेतु आपकी पूजा करते है ।
हे चन्द्रप्रभ भगवान् ! आपके चरणों में [मृगांक] चंद्रमा का चिन्ह अंकित है आपके अनन्तगुण [अगम] अवर्णीय [अपार] अथाह है, गणधर देव भी उनकी [पार] थाह नहीं प्राप्त कर सकते [तौ] तो [को] कौन उनकी [सार] श्रेष्ठता का [वरनत] वर्णन कर सकता है ।
[पै] फिर भी मेरे [हिये] हृदय में आपकी भक्ति मुझे [प्रेरे] प्रेरित करके अत्यंत [उमगाय] उत्साहित कर रही है इसलिए आपके गुणों का गान करता हूँ, इसमें आप ही मेरी सहायता कीजिये ।
हे चंद्रप्रभ भगवान् आपकी जय हो । आप दया के [निधान] भण्डार है, संसार रुपी [कानन] जंगल को नष्ट करने के लिए दावानल के समान है, आपका गर्भ और जन्म कल्याणक हुआ था, आपकी जय हो, [भवि] भव्यजीव रुपी कमलों के हृदय को [विकाशन] विकसित करने के लिए आप सूर्य के समान है और [शर्मकन्द] सुख को उत्पन्न करने वाले हो ।
भगवन आपने दस लाख पूर्व की आयु प्राप्त करी जिस के गृहस्थ अवस्था में मन वांछित सुखों को भोगो था । कुछ कारणवश आप संसार से उदासीन होकर, सुख के स्थानों, बारह भावनाओं का चिंतवन करने लगे ।
लौकान्तिक देव अपने नियोगानुसार उनके [बोध्यो नियोग] वैराग्य की अनुमोदना के लिए [तित] वहां आये । इंद्र ने [शिविका] पालकी सजा कर रखी । चन्द्रप्रभ भगवान् ! [तापै] उस पर चढ़ कर आप, तप धारण करने के लिए जंगल की ओर बढ़े, [ताछिन] उस समय की शोभा का वर्णन करने में कौन समर्थ है ।
जिनेन्द्र भगवान् का [अंग सेत] शरीर [सित] श्वेत चंद्रमा के समान था, उन के ऊपर सफ़ेद चॅवर ढोरे जा रहे थे, सिर के ऊपर भी सफ़ेद छत्र थे, गले में [गुलक] सुंदर, श्वेत रत्नों से जड़ित हार था, भिन्न-भिन्न आभूषण भी पहने हुए थे ऐसे श्वेत पवित्र चरणों वाले चन्द्रप्रभ भगवान् की हम अर्चना / पूजा करते है ।
आपके शरीर की कांति सफ़ेद है आप [नाकाधीश] देवताओं के स्वामी है, आपकी श्वेत [सुचाप] धनुषाकार [शिविका] पालकी को इंद्र और देव कंधे पर रख कर ले जाते है । उस जलूस में सभी सुरेश नरेश आपके यश (गुणों )का चिंतवन करते हुए जाते है ।
भगवन आप चन्द्रनगर से निकलकर वन में [सकल] सब के साथ पहुंचे । वहाँ श्वेत, स्वच्छ और [शिरोमणि] श्रेष्ठ शिला पर आप ने तप धारण किया अर्थात सारे वस्त्र, आभूषण त्याग कर आपने निर्ग्रन्थ मुनि दीक्षा धारण करी ।
आपकी [सित पय] श्वेत दूध की श्रेष्टम रसीली [पारण] पारणा उदार सेठ चन्द्रदत्त द्वारा हुई । आपके श्वेत हाथों में वे दूध की धार देते थे, ऐसा लग रहा था जैसे संसार सागर पर [सेत] पुल ही बांध रहे हो ।
आपके हाथ में दूध की धारा प्रत्यक्ष पुण्य की धारा बहती हुई लग रही थी । वहाँ पर देवताओं ने [ततच्छ] उसी क्षण [अचरज] पञ्चाशचर्य (रत्नवर्षा, पुष्पवर्षा, मंदसुगंध, बयार, भिन्न-भिन्न बाजे बजना, अबोध आनंद का उच्चारण) किए । फिर आप गहन तप करने के लिए चले गए जिसके द्वारा आपने अनंत केवलज्ञान रुपी ज्योति को [जग्यो] प्राप्त किया ।
केवलज्ञान प्राप्त करते ही आपने समवशरण विभूति प्राप्त करी अर्थात इंद्र ने कुबेर को भेजकर महान समवशरण की रचना करवाई । जिसको देखते ही सब पाप नष्ट हो जाते है । वहाँ [उतंग] ऊँचा अशोक [तरु] वृक्ष शोभित हो रहा था जो कि समस्त शोक के प्रसंगो को [चूरै] नष्ट कर रहा था ।
वहाँ, देवता [नभ] आकाश से सुगन्धित सुहावने पुष्पों की [वर्षा] वृष्टि करते है, ऐसा लगता है मानो [मन्मथ] कामदेव अपने हथियारों को छोड़ कर भाग रहा हो । भगवन के मुख से वहाँ श्रेष्ठ वाणी, दिव्यध्वनि, खिरती है जो कि मानो तत्वों के प्रकाशन के लिए साक्षत [मुकुर धार] दर्पणमय है ।
जहाँ चौसठ चँवर [अमर] देव निरंतर ढोरते है, ऐसा लगता है मानो आपके यश की [झरि] वर्षा मेघों द्वारा हो रही हो, गंध-कुटी के ऊपर सिंहासन है, जिस पर कमल है । यह कमल, मोक्षरूपी सरोवर का ही श्वेतकमल लग रहा है ।
[जित] जहाँ मधुर सुरों में दुंदभि बज रही है, ऐसा लगा मानो कर्मों पर विजय का नगाड़ा बज रहा हो । आपके सिर के ऊपर तीन छत्र, श्वेत वर्ण के फिर रहे हैं, मानो ये तीन रत्नो (रत्नत्रय) के देने वाले और तीन प्रकार के ताप अर्थात जन्म जरा मृत्यु को हरने वाले हों ।
आपके शरीर की प्रभा का जो सुहावना मंडल है उसमे भव्य जीव अपने-अपने सात-सात (तीन भूत, तीन भविष्य के और १ वर्तमान) भव देखते हैं । जैसे वे दर्पण में अपना मुख स्पष्ट देख कर आते है ।
इन अनेक विभूतियों को देखकर आपकी बाह्य महिमा का वर्णन करना कठिन है फिर अंतरंग महिमा का वर्णन कौन कर सकता है ।
भगवान् आपने अपने अनंतगुणों सहित विहार किया है और भव्य जीवों को संसार से पार लगने का उपदेश दिया । फिर योग-निरोध अर्थात मन-वचन-काय तीनों योगो का निरोध करके, चार अघातिया कर्मों को नष्ट करके सम्मेदशिखर पर्वत से मोक्ष प्राप्त कर लिया ।
वृंदावन कवि शीश नवकार बारम्बार प्रभु की वंदना करते है – प्रभू ! आप सब जानते हो कि मेरे हृदय में क्या है, उसे मैं बार बार क्या कहूं, मेरे मन की इच्छा, [सार सार] श्रेष्ठ मोक्ष की प्राप्ति [कारज] करवा दीजिये ।
अर्थ – जिनेन्द्र चन्द्र प्रभ आपकी जय हो । आप आनंद के समूह हैं, संसार के भय को नष्ट करने वाले हैं, रागादि द्वंदों के फंदो को हरने वाले हैं, आप मोक्ष में भली प्रकार विराजमान हैं ।
अर्थ – जो भव्य जीव आठों द्रव्यों को लेकर चन्द्र प्रभ भगवान् की पूजा करते है उनके भव-भव के [अघ] पाप नष्ट हो जाते हैं और मुक्ति-सुख की प्राप्ति होती है । जन्म के [त्रास] दुःख मिट जाते है, समस्त अमंगल दूर हो जाते हैं । वृंदावन कवि ये देखकर, पूजा करते है जिस से मोक्ष सुख की प्राप्ति हो सके ।