श्रीशांतिनाथ पूजन पण्डित बख्तावर

आप सर्वार्थसिद्धि विमान को छोड़कर [गजपुर] हस्तिनापुर में पधारे थे, विश्वसेन [भूपाल] राजा के [नन्द] पुत्र कहलाये थे । आप पांचवें चक्रवर्ती हुए और [द्वादश] बारहवें [मदन] कामदेव हुए । मैं आपके चरणों की सेवा करता हूँ, आप मेरे हृदय में पधारिये जिससे मेरे समस्त सांसारिक [भाजे] दुःख दूर हो जाए ।

[पंचम उदधि] क्षीर सागर के निर्मल जल को सोने के कलश में लेकर, अत्यंत प्रसन्नता पूर्वक श्री जी के सम्मुख धार देने [तनो] से जन्म, जरा और मृत्यु नष्ट हो जाते है । शांतिनाथ भगवान्, आपने पांचवें चक्रवर्ती, बारहवें [मदन] कामदेव का पद पाया । आपके चरण कमलों की पूजा करने से रोग, शोक, दुःख और दारिद्रता नष्ट हो जाते हैं ।

मैं मलियागिरि का उत्कृष्ट चंदन, [कदली नंदन] कपूर, कुंकुम को जल के साथ घिसकर, भव भव के समस्त दुखों को नष्ट करने के लिए लेकर आपके चरणों की पूजा करता हूँ जो कि सब सुख देने वाली है शांतिनाथ भगवान् जी आप पांचवें चक्रवर्ती, बारहवें कामदेव का पद पाया था । आप के चरण कमलों की पूजा करने से रोग, शोक, दुःख और दारिद्रता नष्ट हो जाते है ।

मैं, पुण्यराशि के समान स्वच्छ अक्षत के पुंजो को जिन्हे देख कर [शशिमारीचि] चंद्रमा की किरणे भी लज्जित हो जाती है, मोक्ष पद की प्राप्ति के लिए, आपके चरणों के समक्ष अर्पित कर रहा हूँ ।

मैं [सुर] देवों द्वारा लाये गये [पुनीत] पवित्र (कल्पवृक्ष के) अथवा [अवनी] पृथ्वी/मध्यलोक के मनोहर [कुसुम] पुष्प को मंगाकर, आप के चरणों के समक्ष अर्पित कर रहा हूँ जिससे तुरंत काम-वासना नष्ट हो जाए ।

मैं क्षुधा की वेदना को [वेग] शीघ्रता से निवारण के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के, [सद्य] ताज़े मनोहर पकवान संवारकर, थाली में रखकर आपके सम्मुख अर्पित करने के लिए लाया हूँ ।

[सनेह] चिकने घी और कपूर से [परजार] प्रज्ज्वलित करके दीपक आपके सम्मुख [धरे] अर्पित करता हूँ जिससे मंदिर जी में जग मग ज्योति होती है और मोहरुपी अन्धकार [सुटार] पूर्णतया दूर हो जाता है ।

[देवदारु] देवदार की लकड़ी, चंदन और कपूर मिलाकर अत्यंत सुगंधित धुप बनाकर, अष्टकर्मों के [जारन] नष्ट के लिए खेता हूँ । मेरे कर्मो को नष्ट करने की कृपा करे ।

[माहिं] मैं नारंगी, बादाम, केला, [एला] इलाइची, [दाड़िम] अनार, [सहकार] आम आदि फलों को सोने के थाल में भरकर आपकी पूजा करने के लिए लाया हूँ जिससे [शिवनार] मोक्ष लक्ष्मी प्राप्ति हो ।

जल फल आदि आठों द्रव्य को [संवार] मिलाकर मंगल गान करते हुए आपको अर्घ्य अर्पित करता हूँ । बख्तावर कवि कहते है कि आप ही हमारे [साहिब] स्वामी हो हमे [अनर्घ] मोक्ष [राज्य] दिलवा दीजिये ।

आप सर्वार्थसिद्धि त्यागकर भादव [श्यामा] वदी सप्तमी को माता ऐरा के उदर में, [नागपुर] हस्तिनापुर में पधारे मैं आपकी पूजा और ध्यान कर, शुभ अर्घ आपके समक्ष समर्पित करता हूँ ।

तीर्थंकर नाथ का जन्म [वर] श्रेष्ट, ज्येष्ठ [असित] कृष्णा चतुर्दशी को हुआ । [हरि-गण] देव और इंद्र ने भगवान् को [नावें माथं] नमस्कार किया । मैं भी शांति नाथ भगवान् के दोनों चरणों की पूजा करता हूँ ।

भगवान् ने ज्येष्ट वदी चतुर्दशी को [कानन] जंगल में जाकर [योग] दीक्षा धारण करी । उन्होंने नवनिधियों, रत्नो चक्रवर्ती पद को भी [सुछारी] त्याग दिया । मैं ऐसे शांतिनाथ भगवान् की वंदना करता हूँ [चीन्हा] जिन्होंने [आत्मसार] आत्मा की श्रेष्ठता को पहिचान लिया है ।

पौष [उजियारा] शुक्ल दशमी को भगवान् ने [अरि] कर्मशत्रु का घात कर/चार घातिया कर्मों को नष्ट कर अपने, ज्ञान रूपी सूर्य का उदय किया अर्थात उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ । केवल ज्ञान प्राप्त होते ही उनको अष्ट प्रातिहार्य प्राप्त हुए, देवों और मनुष्यों ने भी उनके यशगान किया है; ऐसे भगवान् शांतिनाथ भगवान की मैं सेवा/पूजा करता हूँ ।

सम्मेदशिखर पर्वत पर अघाती-कर्मों को [हंकार] नष्ट कर जिन्होंने जेठ चतुर्दशी [कारी] वदी को मोक्ष प्राप्त किया, मैं भगवान् के सुखदायी निर्वाण-क्षेत्र की पूजा करता हूँ ।

आप जिनेन्द्र भगवान् हो गए हैं, आपने जगत में सुख का विस्तार किया है, अनेक भव्य जीवों को संसार से पार लगाकर उनके संकट दूर किये है । आपने आठों कर्मों को नष्ट कर उनको भी मोक्ष सुख प्राप्त कराया है आप के [विरद] यश को [निहार] देखकर मैं आपकी शरण में आया हूँ ।

मैं आपके चरणों को नमन करता हूँ मेरे दुःख, दरिद्रता और संताप को हर लीजिये । एक क्षण [छिन] में मेरे [सकल] समस्त कर्मों को हर लीजिये । शांतिनाथ भगवन आप शांति प्रदान करें ।

आपके चरण में [सारंग] हिरन का [लक्षण] चिन्ह है, ऊंचाई ४० धनुष, [हाटक] स्वर्णमयी शरीर की काँति थी, हे जगत के स्वामी शांति नाथ भगवान् मैं आपको नमस्कार करता हूँ ।

प्रभु आपने बहुत लोगों के फंदे तोड़े है, अर्थात उन्हें मुक्ति दिलाई है उनमे से कुछ के नाम मैं गिनाता हूँ । जब श्रीपाल [राई] राजा [अम्बु] समुद्र के बीच में गिर गया था तब उसने आप का नाम जपा था तब आपने उन की सहायता करी थी । कथा – मैना-सुंदरी कथा में, मैना सुंदरी के पति श्रीपाल, को धवल सेठ ने मायाचारी से धक्का देकर समुद्र में फिंकवा दिया था तब श्रीपाल, भगवान के नाम की माला जपते जपते समुद्र से पार लग गए थे ।

राय राजा ने सेठ सुदर्शन को सूलि पर चढ़ा दिया था, उन्होंने आपके नाम की [सार] श्रेष्ठ जाप जपी थी तब देवों ने आकर उनकी फूलों की वर्षा कर तथा सिंहासन बनाकर, उस पर उन्हें बैठा कर, सम्मान कर (सहाई) सहायता करी थी ।

पांडवों के लाख के [धाम] घर में [वह्नि] आग [प्रजारी] लगाने से, उन पर महान कष्ट आया था जब उन्होंने आपका नाम लेकर आपको [टेर] पुकारा था तब विदुर ने उन्हें रास्ता बता दिया था

द्रोपदी को घातकी खंड में हर लिया गया था वहाँ अन्य कोई नहीं था, आप ही तो सहारा थे उसने । आपका नाम लेकर शील का पालन किया, आपने उसकी वहाँ रक्षा कर उसके सभी दुःख को दूर किया । कथा – एक बार द्रोपदी के महल में नारद के आने पर उसने उनको देख कर नाक मुँह सिकोड़ा था, जिससे नारद ने अपने को अपमानित महसूस किया । तब नारद ने घातकी खंड के राजा पद्मनाभ को जाके द्रौपदी का चित्र दिखाया पद्मनाभ ने अपनी विद्या को भेजकर द्रौपदी को अपने पास घातकी खंड में बुलवा लिया जिससे यहाँ तो हाहाकार मच गया और वहाँ द्रौपदी ने विचार किया मैं यहाँ कैसे आ गयी, तब उसने आपका नाम लिया जिससे उस का सारा संकट दूर हो गया, अर्जुन वहाँ पहुंचकर द्रोपदी को वापिस ले आये ।

जब राम जी ने गर्भावस्था में, (जानकी) सीता को निकाल कर (उद्यान) जंगल में छुड़वा दिया था तब उसने आपका नाम लिया था जिससे आपने उनकी पीड़ा को दूर करने में देर नहीं लगाई, उनकी पीड़ा क्षण भर में समाप्त हो गयी ।

अंजन चोर सप्त व्यसन का सेवन करता था, [तस्कराई] चोरी करता था, किन्तु जब उसने इन सब का त्याग कर आपको चित्त में धारण किया तब आपको उसे संसार से पार लगाने में एक घड़ी भी नहीं लगी । अंजना और चंदना भी कितने कितने दुःख भोगे, वे आपका नाम लेते ही दूर हो गये । नोट – अंजना जी हनुमान जी की माता जी थी, चंदना जी भगवान् महावीर (की मौसी) ने उन्हें आहार दिया था

सास ने एक घड़े में सांप डाल गिया था, सोमसती ने आपका नाम भली प्रकार लिया था । घड़े में से उसे निकालने के लिए जब गई तो वह फूल माला बन गया, जिससे उसके शील की सब जगह प्रशंसा हुई । भगवन आपने उसके सारे दुखों को दूर कर दिया । नोट – सोम नाम की सती थी जिसके चरित्र पर दोष लगाया गया था ।

इनका मैं बखान कहाँ तक करू, आपका यश तो बड़ा भारी है । तीनों लोक में हर जीव जानता है । हे नाथ भगवन ! मेरी ओर जरा [हेरो] देख लीजिये, आपकी नाव बहुत बड़ी है मेरा तो भार [रती] थोड़ा सा ही है, (मैं भी उस में बैठ कर पार हो जाऊँ) ।

भक्त भगवान् से विनती करते हुए कह रहा है, भगवन आप मेरा हाथ [गहो] पकड़ कर [वेग] जल्दी से पार लगा दीजिये अब आपसे और क्या कहूं, मैं तो अपनी (पुकारा) विनती आपके सामने कर रहा हूँ आपके ज्ञान के बीच में सब [भासी] प्रकाशमान है, (आपसे मैं अपने भूत और वर्त्तमान के दुखों के विषय में क्या कहूं आपको सब पता है) केवल ज्ञानी हैं, मेरे शांति नाथ प्रभु अब और देर मत कीजिये, अनंत काल से मैं भटकता रहा, अन्य देवों भगवानों के चककर में भटकता रहा जो कि गलत था, अब मैं सही जगह आ गया हूँ, जल्दी से संसार से मुझे निकाल लीजिये ।

शांतिनाथ भगवान् आपका यश तीनों लोक में बहुत फैला हुआ है । देवता हो, मनुष्य, स्त्री आदि सभी आपके गुणों की माला को धारण करते हैं अर्थात निरंतर आपका गुणगान करते हैं । बख्तावर कवि कहते हैं कि जो आपका ध्यान करता है और आपके गुणों का गान करता है वे सब पार होते हैं । मैंने भी आपके गुणों का गान किया है मेरे भी दुःख और दरिद्रता को दूर कीजिये ।

मैंने [श्रुति] सुना है कि एरा देवी के पुत्र, आपकी छवि देखते ही [अरणं] सूर्य भी अत्यंत लज्जित हो जाता है, सूर्य समझता था कि सर्वाधिक प्रकाशमान आभा उसके पास ही है किन्तु भगवान की आभा तो करोडो सूर्य के प्रकाश से भी अधिक है इसलिए मैं आपकी शरण में आ गया हूँ । भगवान् जी, जो आपकी सेवा/भक्ति में लगते है वे श्रेष्ठ सुखों को क्षण में प्राप्त कर लेते है आपने तो बहुतों को पार लगा दिया है हम चाहते है कि हमारा भी वास उनमे हो जाए ।

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