((अमितगति आचार्य कृत; हिंदी पद्यानुवाद पं रविन्द्रजी))मेरा आतम सब जीवों पर, मैत्री भाव करेगुण-गण मंडित भव्य जनों पर, प्रमुदित भाव रहे ॥दीन दुखी जीवों पर स्वामी, करुणा भाव करेऔर विरोधी के ऊपर नित, समता भाव धरे ॥१॥
शरीरत: कर्तुमनंतशक्तिं विभिन्नमात्मानमपास्तदोषम्जिनेंद्र कोषादिव खड्गयष्टिं, तव प्रसादेन ममास्तु शक्ति: ॥२॥
हे जिनेंद्रदेव ! म्यान से तलवार को निकालने के समान दोषों से रहित और अनंत शक्तिमान इस आत्मा को शरीर से पृथक् करने में आपके प्रसाद से मुझे शक्ति प्राप्त होवे।
छोडा है सब में अपनापन, मैनें मन मेरा बना रहे नित सुख में दुख में, समता का डेरा ॥शत्रु मित्र में मिलन विरह में, भवन और वन मेंचेतन को जाना न पडे फिर, नित नूतन तन में ॥३॥
मुनीश! लीनाविव कीलिताविव, स्थिरौ निखाताविव विम्बिताविवपादौ त्वदीयौ मम तिष्ठतां सदा, तमो-धुनानौ हृदि दीपिकाविव ॥४॥
हे मुनियों के ईश ! आपके दोनों चरण-कमल मेरे हृदय में हमेशा के लिये लीन के समान, कीलित हुए के समान, गढे हुए के समान, प्रतिबिंबित हुये के समान और अंधकार को दूर करते हुये दीपक के समान स्थित हो जावें ।
हो प्रमादवश जहां तहां यदि, मैनें गमन किया एकेंद्रिय आदिक जीवों को, घायल बना दिया ॥प्रथक किया या भिडा दिया हो, अथवा दबा दियामिथ्या हो दुष्कृत वह मेरा, प्रभुपद शीश किया ॥५॥
विमुक्तिमार्गप्रतिकूलवर्तिना:, मया कषायाक्षवशेन दुर्धियाचारित्र शुद्धेर्यदकारि लोपनं, तदस्तु मिथ्या मम दुष्कृतं प्रभो ॥६॥
मोक्षमार्ग के प्रतिकूल चलने वाले दुर्बुद्धि से मैंने कषाय और इंद्रियों के आधीन होकर चारित्र की शुद्धि का जो लोप किया है हे प्रभो ! वह मेरा सब दुष्कृत मिथ्या होवे ।
मंत्र शक्ति से वैद्य उतारें, ज्यों अहिविष सारात्यों अपनी निंदा गर्हा व, आलोचन द्वारा ॥मन वच तन से या कषाय से, संचित अघ भारीभव दुख कारण नष्ट करूं मैं, होकर अविकारी ॥७॥
अतिक्रमं यद्विमतेर्व्यतिक्रमं, जिनातिचारं सुचरित्र-कर्मण:व्यधामनाचारमपि प्रमादत:, प्रतिक्रमं तस्य करोमि शुद्धये ॥८॥
हे जिनराज ! सम्यक् चारित्र में जो मोह और प्रमाद से मैंने अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार और अनाचार किया है, उस दोष की शुद्धि के लिये मैं प्रतिक्रमण करता हूँ ।
चित्त शुद्धि की विधि की क्षति को, अतिक्रमण कहतेशील बाढ के उल्लंघन को, व्यतिक्रमण कहते ॥त्यक्त विषय के सेवन को प्रभु, अतिचार कहतेविषयासक्तपने को जगमें अनाचार कहते ॥९॥
यदर्थमात्रापदवाक्यहीनं, मया प्रमादाद्यदि किञ्चनोक्तम्तन्मे क्षमित्वा विदधातु देवी, सरस्वती केवलबोधलब्धिम् ॥१०॥
मैंने प्रमाद से जो कुछ भी अर्थ, मात्रा, पद और वाक्य से हीन कहा हो उस कमी को क्षमा करके सरस्वती देवी तुम मुझे केवलज्ञान-लब्धि प्रदान करो ।
वांछित फलदात्री चिंतामणि सदृश मात! तेरा वंदन करने वाले मुझको मिले पता मेरा ।बोधि, समाधि, विशुद्ध भावना, आत्मसिद्धि मुझकोमिले और मैं पा जाऊं माँ! मोक्ष-महासुख को ॥११॥
य: स्मर्यते सर्वमुनीन्द्रवृन्दै, र्य: स्तूयते सर्वनराऽमरेन्द्रै:यो गीयते वेदपुराणशास्त्रै:, स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥१२॥
जिनका सर्व मुनिनाथ स्मरण करते हैं, जिनकी सर्व मनुष्य और सुरेंद्रगण स्तुति करते हैं, जिनका वेद, पुराण और शास्त्रों में वर्णन किया जाता है, वे देवाधिदेव मेरे हृदय में विराजमान होवें ।
जो अनंत द्रग ज्ञान स्वरूपी सुख स्वभाव वालेभव के सभी विकारों से भी जो रहे निराले ॥जो समाधि के विषयभूत हैं परमातम नामीवे देवों के देव विराजें मम उर में स्वामी ॥१३॥
निषूदते यो भवदु:खजालं, निरीक्षते यो जगदन्तरालम्योऽन्तर्गतो योगिनिरीक्षणीय:, स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥१४॥
जिन्होंने भवदु:खों के समूह को नष्ट कर दिया है, जो सर्व-जगत के अंतराल को देखते हैं, जो अध्यात्म ध्यान में रत हुए योगियों के द्वारा देखे जाते हैं, वे देवाधिदेव मेरे हृदय में निवास करें ।
मोक्ष मार्ग के जो प्रतिपादक, सब जग उपकारीजन्म मरण के संकटादि से, रहित निर्विकारी ॥त्रिलोकदर्शि दिव्यशरीरी, सब कलंक नाशीवे देवों के देव विराजें मम उर में अविनाशि ॥१५॥
क्रोडीकृताऽशेष-शरीरिवर्गा, रागादयो यस्य न सन्ति दोषा:निरिन्द्रियो ज्ञानमयोऽनपाय:, स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥१६॥
जिन्होंने सर्व संसारी जीवों को अपने अधीन कर रखा है, ऐसे ये राग-द्वेष आदि दोष जिनके नहीं हैं, जो इंद्रियों से रहित ज्ञानस्वरूप और दु:खरहित हैं, वे देवदेव मेरे हृदय में निवास करें ।
जग कल्याणी परिणति से जो, व्यापक गुण राशीभावी सिद्ध विबुद्ध जिनेश्वर, करुण पाश नाशी ॥ जिसने ध्येय बनाया उसके, सकल दोष हारीवे देवों के देव विराजें, मम उर में अविकारी ॥१७॥
न स्पृश्यते कर्मकलङ्कदोषै:, यो ध्वान्तसङ्घैरिव तिग्मरश्मि:निरञ्जनं नित्यमनेकमेकं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥१८॥
जो अंधकार-समूह से स्पर्शित नहीं हुये सूर्य के समान कर्मरूपी कलंक दोषों से स्पर्शित नहीं होते हैं, कर्मांजन से रहित हैं, नित्य हैं,अनेक हैं और एक हैं उन सच्चे-देव की मैं शरण लेता हूँ ।
जगत प्रकाशक जिनके रहते सूर्य प्रभाधारी, किंचित भी ना शोभा पाता जिनवर अविकारी ॥ निज आतम में हैं जो सुस्थित, ज्ञान प्रभाशालीउन अरहंत देव की मैनें सुखद शरण पा ली ॥१९॥
विलोक्यमाने सति यत्र विश्वं, विलोक्यते स्पष्टमिदं विविक्तम्शुद्धं शिवं शान्तमनाद्यनन्तं, तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥२०॥
जिनको देख लेने पर यह लोक-अलोक से भेदरूप जगत् स्पष्ट देख लिया जाता है, जो शुद्ध हैं, शांत हैं, शिव हैं, अनादि और अनंत हैं, उन सच्चे देव की मैं शरण लेता हूँ ।
जो मद मदन ममत्व शोक भय, चिंता दुख निद्रा जीत चुके हैं निज पौरुष से, कहती जिनमुद्रा ॥ज्यों दावानल तरु समूह को शीघ्र जला देताउन अरहंत देव की मैं भी सुखद शरण लेता ॥२१॥
न संस्तरोऽश्मा न तृणं न मेदिनी, विधानतो नो फलको विनिर्मित:यतो निरस्ताक्षकषाय-विद्विष:, सुधीभिरात्मैव सुनिर्मलो मत: ॥२२॥
साधु के लिये संस्तर न पत्थर की शिला है, न घास-पुवाल है, न पृथ्वी है और विधान से बनाया गया पाटा भी नहीं है क्योंकि बुद्धिमानों ने इंद्रिय और कषायों को जीतने वाला आत्मा ही अत्यंत निर्मल माना है ।
ना समाधि का साधन संस्तर, नहीं लोकपूजाना मुनिसंघों का सम्मेलन, या कोइ दूजा ॥इसीलिये हे भद्र सदा तुम, आतम लीन बनोंतज बाहर की सभी वासना, कुछ ना कहो सुनो ॥२३॥
न सन्ति बाह्या मम केचनार्था, भवामि तेषां न कदाचनाहम्इत्थं विनिश्चित्य विमुच्य बाह्यं, स्वस्थ: सदा त्वं भव भद्र! मुक्त्यै ॥२४॥
बाहरी कोई भी पदार्थ मेरे नहीं हैं और मैं भी उन किसी का नहीं हूँ ऐसा निश्चय करके हे भव्य ! तुम बाह्य पदार्थों को छोड़कर मुक्ति प्राप्ति के लिये सदा अपने आत्मा में स्थित होवो ।
तुम अपने में अपना दर्शन, करने वाले होदर्शन ज्ञानमयी शुद्धातम, पर से न्यारे हो ॥जहाँ कहीं भी बैठे मुनिवर, अविचल मनधारीवहीं समाधी लगे उनकी जो, उनको अति प्यारी ॥२५॥
एक: सदा शाश्वतिको ममात्मा, विनिर्मल: साधिगमस्वभाव:बहिर्भवा: सन्त्यपरे समस्ता, न शाश्वता: कर्मभवा: स्वकीया: ॥२६॥
मेरा आत्मा सदा अकेला है, अविनाशी है, कर्ममल से रहित है और ज्ञान-स्वभावी है अन्य सभी बाहरी भाव या पदार्थ अविनाशी नहीं हैं (क्षणिक हैं) और ये अपने द्वारा संचित कर्म के निमित्त से ही हुये हैं ।
जहाँ देह से नहीं एकता, तो जीवन साथीवहाँ मित्र सुत वनिता कैसे हो मेरे साथी ॥इस काया से ऊपर से यदि, चर्म निकल जाएरोम छिद्र तब कैसे इसके बीच ठहर पाए ॥२७॥
संयोगतो दु:खमनेकभेदं, यतोऽश्नुते जन्मवने शरीरीततस्त्रिधासौ परिवर्जनीयो, यियासुना निर्वृतिमात्मनीनाम् ॥२८॥
यह संसारी प्राणी जिस हेतु से इस जन्मरूपी वन में संयोग से अनेक प्रकार के दु:ख भोगता है, उसी कारण आत्मा से संबंधित सुख को प्राप्त करने के इच्छुक को वह संयोग मन, वचन, काय से छोड़ देना चाहिये ।
भव वन में पडने के कारण, हैं विकल्प सारेउनका जाल हटाकर पहुँचो शिवपुर के द्वारे ॥अपने शुद्धातम का दर्शन तुम करते करतेलीन रहो परमात्म तत्त्व में दु:खो को हरते ॥२९॥
स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभम्परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटं, स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा ॥३०॥
पहले इस जीव ने कर्म जो स्वयं किये हैं उन्हीं का अच्छा या बुरा फल प्राप्त करता है यदि पर के द्वारा दिये गये फल को भोगता है तब तो अपने द्वारा किये हुये कर्म व्यर्थ हो जावेंगे ?
अपने अर्जित कर्म बिना इस प्राणी को जग मेंकोइ अन्य न सुख दुख देता, कहीं किसी डग पे ॥ऐसा अडिग विचार बनाकर, तुम निज को मोडोअन्य मुझे सुख दुख देता है ऐसी हठ छोडो ॥३१॥
यै: परमात्माऽमितगतिवन्द्य:, सर्वविविक्तो भृशमनवद्य:शश्वदधीतो मनसि लभन्ते, मुक्तिनिकेतं विभववरं ते ॥३२॥
जो अमितगति से वंदनीय, सर्व पर-पदार्थों से भिन्न, अत्यंत निर्दोष, परमात्मा का हमेशा मन में चिंतवन करते हैं, वे वैभव से परिपूर्ण मुक्ति-स्थान को प्राप्त कर लेते हैं ।
(दोहा)जो ध्याता जगदीश को, लेय पद बत्तीसअचल चित्त होकर वही, बने अचल पद ईश ॥३३॥