स्वयंभू स्तोत्र भाषा आचार्य समंतभद्र

जो स्वयम्भू थे (अर्थात् अपने आप दूसरों के उपदेश के बिना ही मोक्ष के मार्ग को जानकर और उस रूप आचरण कर अनन्तचतुष्टय-रूप अपूर्व गुणों के धारी परमात्मा), सर्व प्राणियों के हितकारक थे, तथा सम्यग्ज्ञान की विभूति-रूप नेत्रों से युक्त थे। गुणों के समूह से युक्त वचनों के द्वारा अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने वाले ऐसे श्री ऋषभदेव भगवान् गुणों से युक्त किरणों के द्वारा अन्धकार का नाश करने वाले चन्द्रमा की तरह इस भूतल पर शोभायमान हुए थे ।
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