पल पल बीते उमरिया

(तर्ज : मनहर तेरी मूरतिया)

पल पल बीते उमरिया रूप जवानी जाती, प्रभु गुण गाले,

गाले प्रभु गुण गाले ॥

पूरब पुण्य उदय से नर तन तुझे मिला, तुझे मिला ।

उत्तम कुल सागर मैं आ तू कमल खिला, कमल खिला ॥

अब क्यों गर्व गुमानी हो धर्म भुलाया अपना,

पड़ा पाप पाले पाले ॥१॥

नश्वर धन यौवन पर इतना मत फूले, मत फूले ।

पर सम्पत्ति को देख ईर्षा मत झूले, मत झूले ॥

निज कर्त्तव्य विचार कर, पर उपकारी होकर

पुण्य कमाले, कमाले ॥२॥

देवादिक भी मनुष जनम को तरस रहे, तरस रहे ।

मूढ़! विषय भोगों में, सौ सौ बरस रहे, बरस रहे ॥

चिंतामणि को पाकर रे कीमत नहीं जानी तूने,

गिरा कीच नाले नाले ॥३॥

बीती बात बिसार चेत तू, सुरज्ञानी, सुरज्ञानी ।

लगा प्रभु से ध्यान सफल हो, जिंदगानी, जिंदगानी ॥

धन वैभव 'सौभाग्य' बढ़े आदर हो जग में तेरा,

खुले मोक्ष ताले ताले ॥४॥

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