भला कोई या विध मन

कविवर - भवानीदास जी

भला कोई या विध मन को लगाओ

जाके लगावत शिव सुख पाओ ॥टेक॥

जैसे नटनी चढ़त बरत पर चहुं दिश ढ़ोल बजावे ।

नाचत गावत लोग रिझावै तो सूरत बरत पे लगावे ॥

भला कोई या विध मन को लगाओ ॥१॥

जैसे पनरिया सिर पे गगरिया तो गगर ढुलन नहीं पावे ।

चितवत जात करत बहु बातें तो सूरत गगर पे लगावे ॥

भला कोई या विध मन को लगाओ ॥२॥

जैसे पतंगा दीप शिखा पर झपट दिवल पर जावे ।

जगमग जोत देख दीपक की तो बाहिने प्राण गमावे ॥

भला कोई या विध मन को लगाओ ॥३॥

ये विध धर्म कहौ जिनवर ने तो मन वच तन कर ध्यावे ।

'दास भवानि' दोउ कर जोड़े तो वोही शिव सुख पावे ॥

भला कोई या विध मन को लगाओ ॥४॥

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