आ तुझे अंतर में शांति मिलेगी

आ तुझे अंतर में शांति मिलेगी

सुख कली खिलेगी की पर में कहीं शांति नहीं

शुद्धात्म को निरखले सब भ्रान्ति टलेगी

सुख कली खिलेगी कि पर में कहीं शांति नहीं ॥१॥

इच्छा के दास अब कभी नहीं बनना

भूल ये अनादि की कभी नहीं करना

द्रव्य-दृष्टि से ही ज्ञान ज्योति जलेगी

सुख कली खिलेगी कि पर में कहीं शांति नहीं ॥२॥

क्यों विकल्प करता पर्याय नाशवान है

तू स्वयं गुणधाम तुझमें ध्रुवधाम है

लीन हो स्वयं में तुझे मुक्ति मिलेगी

सुख कली खिलेगी कि पर में कहीं शांति नहीं ॥३॥

0:00
0:00