जड़ता बिन आप लखें

तर्ज : धन्य धन्य है घड़ी आज की, जिनध्वनि श्रवण परी

जड़ता बिन आप लखें, नाहि मिटे मोरी ॥टेक॥

लखों जब निज हिये नैन, भयो मोहे अतुल चैन ।

सम्यक् के अभाव मैंने, कीनी अब फेरी ॥१॥

अतुल सुख अतुल ज्ञान, अतुल वीर्य को निधान ।

काया में विराजे मान, मुक्ति मेरी चेरी ॥२॥

द्रव्यकर्म विनिमुक्त, भावकर्म असंयुक्त ।

निश्चयनय लोक मान, परजय वप्रधरी ॥३॥

जैसे दधिमांहि छवि तैसे जड़मांहि जीव ।

देखी हम अपने 'नैन' आनन्द की देरी ॥४॥

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