काहे पाप करे काहे छल

तर्ज: कहीं दीप जले कहीं दिल

काहे पाप करे काहे छल, जरा चेत ओ मानव करनी से….

तेरी आयु घटे पल पल ॥टेक॥

तेरा तुझको न बोध विचार है, मानमाया का छाया अपार है

कैसे भोंदू बना है संभल, जरा चेत ओ मानव करनी से…

तेरी आयु घटे पल पल, काहे पाप करे काहे छल ॥१॥

तेरा ज्ञाता व दृष्टा स्वभाव है, काहे जड़ से यूं इतना लगाव है

दुनियां ठगनी पे अब ना मचल, जरा चेत ओ मानव करनी से…

तेरी आयु घटे पल पल, काहे पाप करे काहे छल ॥२॥

शुद्ध चिद्रूप चेतन स्वरूप तू, मोक्ष लक्ष्मी का 'सौभाग्य' भूप तूं

बन सकता है यह बल प्रबल, जरा चेत ओ मानव करनी से…

तेरी आयु घटे पल पल, काहे पाप करे काहे छल ॥३॥

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