माँ जिनवाणी ज्ञायक बताय

तर्ज : दो हंसों का जोड़ा

माँ जिनवाणी ज्ञायक बताय दियो रे,

आनंद भयो भारी, आनंद भयो रे ।

सविनय शीश नवाय रहो रे ।

आनंद भयो भारी, आनंद भयो रे ॥टेक॥

काल अनादि से भ्रमता फिरता, जन्म-जन्म में बहु दुःख सहता ।

अब सब ही दुःख पलाय गयो रे, आनंद भयो भारी, आनंद भयो रे ।

जो प्रमत्त अप्रमत नहीं है, ज्ञायक शुद्ध अभेद सही है ।

स्वयं सिद्ध दरशाय दियो रे, आनंद भयो भारी, आनंद भयो रे ।

पर अवलंबन छोड़ जो देखा, निज का वैभव प्रत्यक्ष देखा ।

सम्यक रत्नत्रय प्रकटाय रह्यो रे, आनंद भयो भारी, आनंद भयो रे ।

अब न कामना कोई बाकी, निज महिमा सर्वोत्तम है आंकी ।

निज महिमा में डुलोय रह्यो रे, आनंद भयो भारी, आनंद भयो रे ।

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