मान न कीजिये हो

राग : मल्हार

मान न कीजिये हो परवीन ॥टेक॥

जाय पलाय चंचला कमला, तिष्ठै दो दिन तीन ।

धनजोवन क्षणभंगुर सब ही, होत सुछिन छिन छीन ॥१॥

भरत नरेन्द्र खंड-षट-नायक, तेहु भये मद हीन ।

तेरी बात कहा है भाई, तू तो सहज ही दीन ॥२॥

'भागचन्द' मार्दव-रससागर, माहिं होहु लवलीन ।

तातैं जगतजाल में फिर कहूँ, जनम न होय नवीन ॥३॥

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