मैं ये निर्ग्रंथ प्रतिमा

तर्ज : निरखत जिन चन्द्र वदन

मैं ये निर्ग्रंथ प्रतिमा, देखूँ जब ध्यान से ।

बैठे पद्मासन जिनवर, देखो किस शान से ॥टेक॥

राग-द्वेष का नाम नहीं, बैठे अपने अन्तर में ।

दृष्टि को अंदर करके, प्रभु बैठे हैं निज घर में ।

अन्जन से पापी तिर गए, जिनके गुणगान से ।

मैं ये निर्ग्रंथ प्रतिमा, देखूँ जब ध्यान से ॥१॥

कर्मकालिमा नष्ट करी और अष्टकर्म को जीता ।

वो भी हो जाता जिनवर सम, जो आतम रस पीता ।

आत्म के अनुभवी देखें सबको निष्काम से ।

मैं ये निर्ग्रंथ प्रतिमा, देखूँ जब ध्यान से ॥२॥

देती ये उपदेश मूर्ति, अरे जगत के जीवों ।

चौरासी से थकान लगी, तो आतम रस पीवो ।

हम तो थक कर बैठे, हैं सारे जहान से ।

मैं ये निर्ग्रंथ प्रतिमा, देखूँ जब ध्यान से ॥३॥

हाथ पै हाथ धरे बैठे जो वही वीतरागी है ।

तीन लोक की सभी सम्पदा, जिनवर ने त्यागी है ।

अब भी भगवान हो तुम, पहले भी भगवान थे ।

मैं ये निर्ग्रंथ प्रतिमा, देखूँ जब ध्यान से ॥४॥

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