यही इक धर्ममूल है

तर्ज : दुविधा कब जै है या मन की

यही इक धर्ममूल है मीता! निज समकितसार सहीता ॥टेक॥

समकित सहित नरकपदवासा, खासा बुधजन गीता ।

तहँतें निकसि होय तीर्थंकर, सुरगन जजत सप्रीता ॥१॥

स्वर्गवास हू नीको नाहीं, बिन समकित अविनीता ।

तहँतें चय एकेन्द्री उपजत, भ्रमत सदा भयभीता ॥२॥

खेत बहुत जोते हु बीज बिन, रहत धान्यसों रीता ।

सिद्धि न लहत कोटि तपहूतें, वृथा कलेश सहीता ॥३॥

समकित अतुल अखंड सुधारस, जिन पुरुषन नें पीता ।

'भागचन्द' ते अजर अमर भये, तिनहीनें जग जीता ॥४॥

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