Text Bhajan
सहजानन्दी शुद्ध स्वभावी
सुन सतगुरु की सीख
मूंजी धरी रहेली
मूंजी धरी रहेली
संसार महा अघसागर
संसार में सुख सर्वदा
या संसार में कोई सुखी
ये प्रण है हमारा
ये सर्वसृष्टि है नाट्यशाला
रे जीव तू अपना स्वरूप देख तो अहा
लुटेरे बहुत देखे हैं
वन्दे जिनवरम्
विराजै रामायण घटमाहिं
वीर जिनेश्वर अब तो मुझको
म्हारा चेतन ज्ञानी घणो
यह स्वारथ का संसार दुःख भण्डार
मैं ऐसा देहरा बनाऊं
मैं ज्ञान मात्र बस ज्ञायक हूँ
मैं दर्शन ज्ञान स्वरूपी हूं
ममता की पतवार ना तोडी
माया में फ़ंसे इंसान
मुसाफिर क्यों पड़ा सोता
भले रूठ जाये ये सारा
भले रूठ जाये ये सारा
भव भव के दुखड़े हजार
मतवाले प्रभु गुण गाले
पाना नहीं जीवन को
पीजे पीजे रे चेतनवा पानी
प्यारे काहे कूं ललचाय
परिग्रह डोरी से झूठ
धरम बिना बावरे तूने
धोली हो गई रे काली कामली
निजरूप सजो भवकूप तजो
थोड़ा सा उपकार कर
देखा जब अपने अंतर को
देखोजी प्रभु करमन की
धन धन जैनी साधु
ज्ञानी की ज्ञान गुफा में
तन पिंजरे के अन्दर बैठा
तू जाग रे चेतन देव
जीवड़ा सुनत सुणावत इतरा
जो अपना नहीं उसके अपनेपन
जो आज दिन है वो
जिंदगी रत्न अनमोल है
जीव तू समझ ले आतम
जीवन के किसी भी पल में
जाना नहीं निज आत्मा ज्ञानी
जिंदगी में घड़ी यह सुहानी
चैतन्य के दर्पण में
चैतन्य मेरे निज ओर चलो