Text Bhajan
पारस जिन चरन निरख
नेमिप्रभू की श्यामवरन
भजि मन प्रभु
लाल कैसे जावोगे
नेमी जिनेश्वरजी काहे कसूर
पद्मसद्म
चवलेश्वर पारसनाथ
निरखि जिनचन्द री
अहो नमि जिनप
अब हम नेमिजी की
अहो बनवासी पिया
त्रिभुवनगुरु स्वामी
देखो गरब गहेली
देख्या मैंने नेमिजी
निर्मोही नेमी जाओ ना
थे म्हारे मन भायाजी
मेरी जीभ आठौं
मेरी सुध लीजै
म्हारा आदीश्वर
रटि रसना मेरी
रुल्यो चिरकाल
लगी लौ नाभिनंदन
लिया रिषभ देव
चंद्रानन
तेरैं मोह नहीं
देखो नाभिनंदन
निरख सखी ऋषिन
फूली बसन्त जहँ
भगवन मरुदेवी के
भज ऋषिपति
भज रे मन
भज श्रीआदिचरन
जय श्री ऋषभ
जाकौं इंद
जगदानंदन
आज गिरिराज के
आज नगरी में जन्मे
आदिपुरुष मेरी आस
ऋषभदेव जनम्यौ
गाएँ जी गाएँ
चलि सखि देखन
अजित जिन विनती
अजित जिनेश्वर
अजितनाथ सों मन लावो रे
हे परमात्मन तुझको पाकर
होता विश्व स्वयं परिणाम
हम आतम ज्ञानी हम भेद
हम तो विषयों की लहर में बह गये
समझ आत्मा के स्वरूप को
समझ मन स्वारथ का संसार