Text Bhajan
चेतन अब धरि सहज
छाँडत क्यों नहिं रे नर
छांडत क्यौं नहिं रे
छांडि दे या बुधि भोरी
निरखि जिनचन्द री
चंद्रानन
चलि सखि देखन नाभिराय
चित चिंतकैं चिदेश
चिदराय गुण मुनो सुनो
कुंथुन के प्रतिपाल
कुंथुन के प्रतिपाल
कुमति कुनारि नहीं है भली
चंद्रानन
उरग सुरग नरईश शीस
ऐसा मोही क्यों न अधोगति
और अबै न कुदेव सुहावै
निरख सखी ऋषिन
भज ऋषिपति
मेरी सुध लीजै
आप भ्रमविनाश आप
चलि सखि देखन
जय श्री ऋषभ
जगदानंदन
आज गिरिराज निहारा
अब मोहि जानि परी
अब घर आये चेतनराज
और सब मिलि होरि
खेलूंगी होरी श्रीजिनवर
चेतन खेल सुमति संग
चेतन तोसौं आज होरी
निजपुर में आज मची
सम्यग्ज्ञान बिना तेरो जनम
सारद तुम परसाद तैं
हम शरन गह्यो जिन चरन
हे आतमा देखी दुति तोरी
सब विधि करन उतावला
मति भोगन राचौ जी
मुनि बन आये जी बना
मेरा सांई तौ मोमैं नाहीं
पतितउधारक पतित
परम जननी धरम कथनी
प्रात भयो सब भविजन
भज जिन चतुर्विंशति नाम
भजन बिन योंही जनम गमायो
भवदधि तारक नवका जगमाहीं
ज्ञानी थारी रीति रौ अचंभौ
तेरो करिलै काज बखत
तैं क्या किया नादान तैं
देखा मैंने आतमरामा
धनि सरधानी जग में