Text Bhajan
धर्म बिन कोई नहीं
नरभव पाय फेरि दुख
किंकर अरज करत जिन
गुरु दयाल तेरा दुःख
थे म्हारे मन भायाजी
जगत में होनहार सो होवै
जिनवाणी की सुनै सो
आगे कहा करसी भैया
आगैं कहा करसी भैया
आज मनरी बनी छै जिनराज
उत्तम नरभव पायकै
और ठौर क्यों हेरत प्यारा
अब तू जान रे चेतन जान
अब थे क्यों दुख पावो
स्वामीजी सांची सरन
होरी खेलूंगी घर आए
अहो दोऊ रंग भरे
सो मत सांचो है मन मेरे
सीमंधर स्वामी
सुन ज्ञानी प्राणी श्रीगुरु
सुनि सुजान पांचों रिपु
सो गुरुदेव हमारा है
लगी लौ नाभिनंदन सों
वीर हिमाचल तें निकसी
वे कोई अजब तमासा
सब विधि करन उतावला
वा पुर के वारौँ
मेरे मन सूवा जिनपद
म्हें तो थांकी आज महिमा
यह तन जंगम रूखड़ा
रटि रसना मेरी ऋषभ
रत्नत्रय निधि उर धरैं
मेरी जीभ आठौं जाम
मेरे चारौं शरन सहाई
मन मूरख पंथी उस मारग
मन हंस हमारी लै शिक्षा
बीरा थारी बान परी
पारस प्रभु को नाऊँ
पुलकन्त नयन चकोर पक्षी
प्रभु गुन गाय रै यह
बीरा थारी बान परी रे
भलो चेत्यो वीर नर
देखो भाई आतमदेव
अहो बनवासी पिया
त्रिभुवनगुरु स्वामी
देखो गरब गहेली
नैननि को वान परी
पारस प्रभु को नाऊँ
थांकी कथनी म्हानै प्यारी
देखे देखे जगत के देव