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समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – शास्त्र-मंगलाचरण समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 1 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 2 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 3 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 4 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 5 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 6 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 7 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 8 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 9 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 10 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 11 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 12 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 13 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 14 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 15 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 16 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 17 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 18 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 19 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 20 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 21 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 22 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 23 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 24 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 25 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 26 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 026-027 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 27 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 28 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 29 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 029-030 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 30 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 31 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 32 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 33 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 34 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 35 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 36 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 37 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 38 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 39 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 40 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 41 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 42 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 43 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 44 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 45 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 46 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 47 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 48 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 49 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 50 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 51 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 52 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 53 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 54 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 55 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 56 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 57 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 58 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 59 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 60 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 61 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 62 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 63 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 64 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 064-065 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समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – शास्त्र-मंगलाचरण

!! नम: श्रीसर्वज्ञवीतरागाय !!

ओंकारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः

कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नम: ॥1॥

अविरलशब्दघनौघप्रक्षालितसकलभूतलकलंका

मुनिभिरूपासिततीर्था सरस्वती हरतु नो दुरितान् ॥2॥

अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानाञ्जनशलाकया

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम: ॥3॥

अर्थ : बिन्दुसहित ॐकार को योगीजन सर्वदा ध्याते हैं, मनोवाँछित वस्तु को देने वाले और मोक्ष को देने वाले ॐकार को बार बार नमस्कार हो । निरंतर दिव्य-ध्वनि-रूपी मेघ-समूह संसार के समस्त पापरूपी मैल को धोनेवाली है मुनियों द्वारा उपासित भवसागर से तिरानेवाली ऐसी जिनवाणी हमारे पापों को नष्ट करो । जिसने अज्ञान-रूपी अंधेरे से अंधे हुये जीवों के नेत्र ज्ञानरूपी अंजन की सलाई से खोल दिये हैं, उस श्री गुरु को नमस्कार हो । परम गुरु को नमस्कार हो, परम्परागत आचार्य गुरु को नमस्कार हो ।

॥ श्रीपरमगुरुवे नम:, परम्पराचार्यगुरुवे नम: ॥

सकलकलुषविध्वंसकं, श्रेयसां परिवर्धकं, धर्मसम्बन्धकं, भव्यजीवमन: प्रतिबोधकारकं, पुण्यप्रकाशकं, पापप्रणाशकमिदं शास्त्रं श्री-समयसार नामधेयं, अस्य मूल-ग्रन्थकर्तार: श्री-सर्वज्ञ-देवास्तदुत्तर-ग्रन्थ-कर्तार: श्री-गणधर-देवा: प्रति-गणधर-देवास्तेषां वचनानुसार-मासाद्य आचार्य श्री-कुन्द-कुन्दाचार्य-देव विरचितं ॥

(समस्त पापों का नाश करनेवाला, कल्याणों का बढ़ानेवाला, धर्म से सम्बन्ध रखनेवाला, भव्यजीवों के मन को प्रतिबुद्ध-सचेत करनेवाला यह शास्त्र समयसार नाम का है, मूल-ग्रन्थ के रचयिता सर्वज्ञ-देव हैं, उनके बाद ग्रन्थ को गूंथनेवाले गणधर-देव हैं, प्रति-गणधर देव हैं उनके वचनों के अनुसार लेकर आचार्य श्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेव द्वारा रचित यह ग्रन्थ है । सभी श्रोता पूर्ण सावधानी पूर्वक सुनें । )

॥ श्रोतार: सावधानतया शृणवन्तु ॥

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी

मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्‌ ॥

सर्वमंगलमांगल्यं सर्वकल्याणकारकं

प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयतु शासनम्‌ ॥

(देव वंदना)

सुध्यान में लवलीन हो जब, घातिया चारों हने ।

सर्वज्ञ बोध विरागता को, पा लिया तब आपने ॥

उपदेश दे हितकर अनेकों, भव्य निज सम कर लिये ।

रविज्ञान किरण प्रकाश डालो, वीर! मेरे भी हिये ॥

(शास्त्र वंदना)

स्याद्वाद, नय, षट् द्रव्य, गुण, पर्याय और प्रमाण का ।

जड़कर्म चेतन बंध का, अरु कर्म के अवसान का ॥

कहकर स्वरूप यथार्थ जग का, जो किया उपकार है ।

उसके लिये जिनवाणी माँ को, वंदना शत बार है ॥

(गुरु वंदना)

नि:संग हैं जो वायुसम, निर्लेप हैं आकाश से ।

निज आत्म में ही विहरते, जीवन न पर की आस से ॥

जिनके निकट सिंहादि पशु भी, भूल जाते क्रूरता ।

उन दिव्य गुरुओं की अहो! कैसी अलौकिक शूरता ॥

अमृतचंद्राचार्य

जयसेनाचार्य

notes

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