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समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 187

+

भेद-भावना — मैं बस जानने देखने देखने वाला –

पण्णाए घित्तव्वो जो दट्ठा सो अहं तु णिच्छयदो । (298)

अवसेसा जे भावा ते मज्झ परेत्ति णादव्वा ॥320॥

पण्णाए घित्तव्वो जो णादा सो अहं तु णिच्छयदो । (299)

अवसेसा जे भावा ते मज्झ परेत्ति णादव्वा ॥321॥

पण्णाए घित्तव्वो जो उवलद्धो सो अहं तु णिच्छयदो ।

अवसेसा जे भावा ते मज्झ परेत्ति णादव्वा ॥322॥

प्रज्ञया गृहीतव्यो यो द्रष्टा सोऽहं तु निश्चयत:

अवशेषा ये भावा: ते मम परा इति ज्ञातव्या: ॥२९८॥

प्रज्ञया गृहीतव्यो यो ज्ञाता सोऽहं तु निश्चयत:

अवशेषा ये भावा: ते मम परा इति ज्ञातव्या: ॥२९९॥

इस भाँति प्रज्ञा ग्रहे कि मैं हूँ वही जो देखता ।

अवशेष जो हैं भाव वे मेरे नहीं यह जानना ॥२९८॥

इस भाँति प्रज्ञा ग्रहे कि मैं हूँ वही जो जानता ।

अवशेष जो हैं भाव वे मेरे नहीं यह जानना ॥२९९॥

अन्वयार्थ : [पण्णाए घित्तव्वो] प्रज्ञा के द्वारा ग्रहण करो कि [जो दट्ठा] जो देखनेवाला है, [सो अहं तु णिच्छयदो] वह निश्चय से मैं ही हूँ; [अवसेसा जे भावा] शेष जो सभी भाव हैं [ते मज्झ परे त्ति णायव्वा] वे मुझसे भिन्न हैं, ऐसा जानो ।

[पण्णाए घित्तव्वो] प्रज्ञा के द्वारा ग्रहण करो कि [जो णादा] जो जाननेवाला है, [सो अहं तु णिच्छयदो] वह निश्चय से मैं ही हूँ; [अवसेसा जे भावा] शेष जो सभी भाव हैं [ते मज्झ परे त्ति णायव्वा] वे मुझसे भिन्न हैं, ऐसा जानो ।

[पण्णाए घित्तव्वो] प्रज्ञा के द्वारा ग्रहण करो कि [जो उवलद्धो] जो अनुभव में आनेवाला है, [सो अहं तु णिच्छयदो] वह निश्चय से मैं ही हूँ; [अवसेसा जे भावा] शेष जो सभी भाव हैं [ते मज्झ परे त्ति णायव्वा] वे मुझसे भिन्न हैं, ऐसा जानो ।

Meaning : Through self-discrimination, one must realize that 'I' is really the 'seer' who sees; and, further, that all other dispositions are not part of oneself.

Through self-discrimination, one must realize that 'I' is really the 'knower' who knows; and, further, that all other dispositions are not part of oneself.

अमृतचंद्राचार्य

जयसेनाचार्य

notes

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत

चेतनाया दर्शनज्ञानविकल्पानतिक्रमणाच्चेतयितृत्वमिव द्रष्टृत्वं ज्ञातृत्वं चात्मन: स्वलक्षणमेव । ततोऽहं द्रष्टारमात्मानं गृह्णामि । यत्किल गृह्णामि तत्पश्याम्येव; पश्यन्नेव पश्यामि, पश्यतैव पश्यामि, पश्यते एव पश्यामि, पश्यत एव पश्यामि, पश्यत्येव पश्यामि, पश्यंतमेव पश्यामि । अथवा न पश्यामि; न पश्यन्‌ पश्यामि, न पश्यता पश्यामि, न पश्यते पश्यामि, न पश्यत: पश्यामि, न पश्यति पश्यामि, न पश्यंतं पश्यामि; किन्तु सर्वविशुद्धो दृङ्‌मात्रो भावोऽस्मि ।

अपि च —

ज्ञातारमात्मानं गृह्णामि । यत्किल गृह्णामि तज्जनाम्येव; जानन्नयेव जानामि, जानतैव जानामि, जानते एव जानामि, जानत एव जानामि, जानत्येव जानामि, जानंतमेव जानामि । अथवा न जानामि; न जानन्‌ जानामि, न जानता जानामि, न जानते जानामि, न जानतो जानामि, न जानति जानामि, न जानंतं जानामि; किंतु सर्वविशुद्धो ज्ञप्तिमात्रो भावोऽस्मि ।

ननु कथं चेतना दर्शनज्ञानविकल्पौ नातिक्रामति येन चेतयिता द्रष्टा ज्ञाता च स्यात्‌ ?

उच्यते — चेतना तावत्प्रतिभासरूपा; सा तु, सर्वेषामेव वस्तूनां सामान्यविशेषात्मकत्वात्‌, द्वैरूप्यं नातिक्रामति । ये तु तस्या द्वे रूपे ते दर्शनज्ञाने । तत: सा ते नातिक्रामति ।

यद्यतिक्रामति, सामान्यविशेषातिक्रांतत्वाच्चेतनैव न भवति । तदभावे द्वौ दोषौ — स्वगुणोच्छेदा-च्चेतनस्याचेतनतापत्ति:, व्यापकाभावे व्याप्यस्य चेतनस्याभावो वा । ततस्तद्दोषभयाद्दर्शनज्ञाना-त्मिकैव चेतनाभ्युपगंतव्या ॥२९८-२९९॥

(कलश–शार्दूलविक्रीडित)

अद्वैतापि हि चेतना जगति चेद् दृग्ज्ञप्तिरूपं त्यजेत्

तत्सामान्यविशेषरूपविरहात्साऽस्तित्वमेव त्यजेत् ।

तत्त्यागे जडता चितोऽपि भवति व्याप्यो विना व्यापका-

दात्मा चान्तमुपैति तेन नियतं दृग्ज्ञप्तिरूपास्तु चित् ॥१८३॥

(कलश)

को नाम भणेद्बुध: ज्ञात्वा सर्वान् परकीयान् भावान् ।

ममेदमिति च वचनं जानन्नात्मानं शुद्धम् ॥१८४॥

चेतना दर्शन-ज्ञानरूप भेदों का उल्लंघन नहीं करती; इसलिए चेतकत्व की भाँति दर्शकत्व और ज्ञातृत्व भी आत्मा के स्वलक्षण ही हैं । इसलिए मैं

देखनेवाले आत्मा को ग्रहण करता हूँ । ग्रहण करता हूँ अर्थात् देखता ही हूँ,

देखता हुआ ही देखता हूँ,

देखते हुए के द्वारा ही देखता हूँ,

देखते हुए के लिए ही देखता हूँ,

देखते हुए से ही देखता हूँ,

देखते हुए में ही देखता हूँ,

देखते हुए को ही देखता हूँ ।

अथवा

नहीं देखता;

न देखते हुए देखता हूँ,

न देखते हुए के द्वारा देखता हूँ,

न देखते हुए के लिए देखता हूँ,

न देखते हुए से देखता हूँ,

न देखते हुए में देखता हूँ और

न देखते हुए को देखता हूँ;

किन्तु मैं सर्व-विशुद्ध-दर्शन-मात्र भाव हूँ ।

इसीप्रकार मैं

जाननेवाले आत्मा को ग्रहण करता हूँ । 'ग्रहण करता हूँ' अर्थात् 'जानता ही हूँ'

जानता हुआ ही जानता हूँ,

जानते हुए के द्वारा ही जानता हूँ,

जानते हुए के लिए ही जानता हूँ,

जानते हुए से ही जानता हूँ,

जानते हुए में ही जानता हूँ,

जानते हुए को ही जानता हूँ ।

अथवा –

नहीं जानता;

न जानते हुए जानता हूँ,

न जानते हुए के द्वारा जानता हूँ,

न जानते हुए के लिए जानता हूँ,

न जानते हुए से जानता हूँ,

न जानते हुए में जानता हूँ,

न जानते हुए को जानता हूँ;

किन्तु मैं सर्व-विशुद्ध-ज्ञप्ति (जानन-क्रिया) मात्र भाव हूँ ।

प्रश्न – चेतना दर्शनज्ञान भेदों का उल्लंघन क्यों नहीं करती कि जिससे चेतनेवाला दृष्टा व ज्ञाता होता है ?

उत्तर – प्रथम तो चेतना प्रतिभासरूप है और वह चेतना द्विरूपता का उल्लंघन नहीं करती; क्योंकि सभी वस्तुएँ सामान्यविशेषात्मक हैं । उसके जो दो रूप हैं, वे दर्शन और ज्ञान हैं । इसलिए वह चेतना ज्ञान-दर्शन – इन दो रूपों का उल्लंघन नहीं करती । यदि चेतना ज्ञानदर्शन का उल्लंघन करे तो सामान्यविशेष का उल्लंघन करने से चेतना ही न रहे । उसके अभाव में दो दोष आते हैं –

अपने गुण का नाश होने से चेतन को अचेतनत्व हो जायेगा ।

व्यापक चेतना के अभाव में व्याप्य चेतन का अभाव हो जायेगा ।

इसलिए इन दोषों के भय से चेतना को ज्ञानदर्शनस्वरूप ही अंगीकार करना चाहिए ।

(कलश–हरिगीत)

है यद्यपि अद्वैत ही यह चेतना इस जगत में ।

किन्तु फिर भी ज्ञान-दर्शन भेद से दो रूप है ॥

यह चेतना दर्शन सदा सामान्य अवलोकन करे ।

पर ज्ञान जाने सब विशेषों को तदपि निज में रहे ॥

अस्तित्व ही ना रहे इनके बिना चेतन द्रव्य का ।

चेतना के बिना चेतन द्रव्य का अस्तित्व क्या ?

चेतन नहीं बिन चेतना चेतन बिना ना चेतना ।

बस इसलिए हे आत्मन् ! इनमें सदा ही चेत ना ॥१८३॥

[जगति हि चेतना अद्वैता] जगत में निश्चयतः चेतना अद्वैत है [अपि चेत्सा दृग्ज्ञप्तिरूपं त्यजेत्] तथापि यदि वह दर्शनज्ञानरूप को छोड़ दे [तत्सामान्यविशेषरूपविरहात्] तो सामान्य-विशेषरूप के अभाव से (वह चेतना) [अस्तित्वम् एव त्यजेत्] अपने अस्तित्व को छोड़ देगी; और [तत्-त्यागे] इसप्रकार (चेतना अपने अस्तित्व को) छोड़ने पर, [चितः अपि जडता भवति] चेतन के जड़त्व आ जायेगा (आत्मा जड़ हो जाय), [च व्यापकात् विना व्याप्यः आत्मा अन्तम् उपैति] और व्यापक (चेताना) के बिना व्याप्य जो आत्मा वह नष्ट हो जायेगा [तेन चित् नियतं दृग्ज्ञप्तिरूपा अस्तु ] इसलिये चेतना नियम से दर्शनज्ञानरूप ही हो ।

(कलश–दोहा)

चिन्मय चेतनभाव हैं, पर हैं पर के भाव ।

उपादेय चिद्भाव हैं, हेय सभी परभाव ॥१८४॥

[चितः एकः चिन्मयः एव भावः] चैतन्य (आत्मा) का तो एक चिन्मय ही भाव है, और [ये परे भावाः] जो अन्य भाव हैं [ते किल परेषाम्] वे वास्तव में दूसरों के भाव हैं; [तत: चिन्मयः भावः एव ग्राह्यः] इसलिए (एक) चिन्मय भाव ही ग्रहण करने योग्य है, [परे भावाः सर्वतः एव हेयाः] अन्य भाव सर्वथा त्याज्य हैं ।

जयसेनाचार्य :

अब उसी भेदभावना को आत्मा के विशुद्ध-दर्शनज्ञान और सुखगुण में प्ररूप से दिखाते हैं —

प्रज्ञा-स्वसंवेदन ज्ञान के द्वारा जो चेतन स्वरूप आत्मा ज्ञाता-द्रष्टा और परमानन्द लक्षण वाले सुख से सहित अनुभव में आता है निश्चय से वही मैं हूँ शेष जो रागादि-भावरूप विभाव-परिणाम हैं, वे चिदानन्द स्वभाव वाले मुझसे भिन्न हैं, ऐसा जानना चाहिये ।

यहाँ शिष्य कहता है कि — चेतना के ज्ञान-चेतना और दर्शन-चेतना ऐसे दो भेद नहीं हैं एक ही चेतना है अत: ज्ञाता-द्रष्टा इस प्रकार दो भेद वाली आत्मा कैसे घटित होती है ?

इस पूर्वपक्ष-शंकापक्ष का परिहार इस प्रकार है — सामान्य को ग्रहण करनेवाला दर्शन है और विशेष को ग्रहण करने वाला ज्ञान है । वस्तु सामान्य विशेषात्मक है । इसे यदि सामान्य विशेषात्मक न माना जावे तो चेतना का अभाव हो जावेगा । चेतना का अभाव होने पर आत्मा में जड़ता / अचेतनता आ जावेगी अथवा चेतना रूप विशेष गुण का अभाव होने से चेतना लक्षण वाली आत्मा का ही अभाव हो जावेगा । परन्तु आत्मा की न जड़ता दिखाई देती है और न उसका अभाव ही दिखायी देता है, क्योंकि ऐसा मानने पर प्रत्यक्ष विरोध आता है । इससे सिद्ध है कि यद्यपि अभेदनय से चेतना एक रूप है तथापि सामान्य-विशेष रूप विषय भेद होने से वह दर्शन और ज्ञान के भेद से दो प्रकार की होती है — ऐसा अभिप्राय जानना चाहिये ॥३२०-३२२॥

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