+
कर्मोदय के साथ अतादात्म्य –
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए । (77)
णाणी जाणंतो वि हु सगपरिणामं अणेयविहं ॥83॥
नापि परिणमति न गृह्णात्युत्पद्यते न परद्रव्यपर्याये ।
ज्ञानी जानन्नपि खलु स्वकपरिणाममनेकविधम् ॥७७॥
परद्रव्य की पर्याय में उपजे ग्रहे ना परिणमें
बहुभाँति निज परिणाम सब ज्ञानी पुरुष जाना करें ॥७७॥
अन्वयार्थ : [णाणी] ज्ञानी [अणेयविहं] अनेक प्रकार के [सगपरिणामं] अपने परिणामों को [जाणंतो वि] जानता हुआ भी [हु] निश्चय से [परदव्वपज्जाए] पर द्रव्य के पर्यायों में [ण वि परिणमदि] न ही परिणमित होता है [ण गिण्हदि] न ग्रहण करता है [उप्पज्जदि ण] और न उत्पन्न होता है ।
Meaning : The knower, while knowing the various modes of his own thought-dispositions, surely does not manifest himself in the modifications of alien substances, or assimilate them, or transmute in their form.
अमृतचंद्राचार्य
जयसेनाचार्य
notes
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
स्वपरिणामं जानतो जीवस्य सह पुद्गलेन कर्तृकर्मभावः किं भवति किं न भवतीतिचेत् –
यतो यं प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च व्याप्यलक्षणमात्मपरिणामं कर्म आत्मना स्वयमन्तर्व्यापकेनभूत्वादिमध्यान्तेषु व्याप्य तं गृह्णता तथा परिणमता तथोत्पद्यमानेन च क्रियमाणं जानन्नपि हि ज्ञानी स्वयमन्तर्व्यापको भूत्वा बहिःस्थस्य परद्रव्यस्य परिणामं मृत्तिकाकलशमिवादिमध्यान्तेषु व्याप्य न तं गृह्णाति न तथा परिणमति न तथोत्पद्यते च, ततः प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च व्याप्यलक्षणं परद्रव्यपरिणामं कर्माकुर्वाणस्य स्वपरिणामं जानतोऽपि ज्ञानिनः पुद्गलेन सह न कर्तृकर्मभावः ।
जिस कारण प्राप्य, विकार्य और निर्वर्त्य ऐसा व्याप्य लक्षण वाले आत्म-परिणाम को अपने आप स्वयं अन्तर्व्यापक होकर आदि, मध्य और अन्त में व्याप्त कर
उन्हीं को ग्रहण करते हुए,
उन्हीं रूप परिणमते हुए,
उन्हीं रूप उत्पन्न होते हुए
अपने आपके द्वारा किये गये अपने परिणामरूप कर्म को जानता हुआ भी ज्ञानी स्वयं अन्तर्व्यापक होकर बाह्य स्थित पर-द्रव्य के परिणाम को 'जैसे मिट्टी कलष को व्याप्त होकर करती है' उस प्रकार आदि, मध्य, अंत में व्याप्त होकर
न तो ग्रहण करता है,
न उस रूप परिणमता और
न उस प्रकार उपजता है ।
इस कारण प्राप्य, विकार्य और निर्वर्त्य तीन प्रकार के व्याप्य लक्षण वाले पर-द्रव्य-परिणामरूप कर्म को न करते हुए व अपने परिणाम को जानते हुए भी ज्ञानी का पुद्गल के साथ कर्तृ-कर्मभाव नहीं हैं ।
जयसेनाचार्य :
[सगपरिणामं अणेयविहं] क्षयोपशम-भाव के कारण होने वाले संकल्प-विकल्प रूप अपने परिणाम, जिसको आत्मा ने स्वयं उपादान-रूप होकर किया है और जो अनेक प्रकार हैं उनको [णाणी जाणंतो वि हु] अपने परमात्म-स्वरूप विशेष-भेदज्ञान के बल से स्पष्ट जानता हुआ भी वह निर्विकार-स्वसंवेदन-ज्ञानी जीव [ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए] उन पूर्वोक्त अपने परिणामों के निमित्त-भूत उदय में आये हुए पुद्गल कर्म की पर्याय-रूप में जैसे मिट्टी कलश-रूप में परिणमन करती है वैसे शुद्ध-निश्चयनय से न तो परिणमन ही करता है और न तन्मयता के साथ उसे ग्रहण ही करता है और न उस रूप से उत्पन्न ही होता है । क्योंकि मिट्टी ओर कलश में परस्पर जिस प्रकार उपादान और उपादेय भाव है, उसी प्रकार पुद्गल-कर्म के साथ आत्मा का उपादान-उपादेय भाव नहीं है । इसलिये अपने क्षायोपशमिक परिणाम के निमित्त से उदय में आये हुए कर्म को जानते हुए जीव का भी उस कर्म के साथ निश्चय से कर्ता-कर्म भाव नहीं है ।