All Chapters (208)
समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – शास्त्र-मंगलाचरण समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 1 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 2 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 3 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 4 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 5 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 6 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 7 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 8 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 9 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 10 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 11 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 12 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 13 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 14 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 15 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 16 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 17 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 18 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 19 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 20 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 21 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 22 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 23 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 24 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 25 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 26 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 026-027 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 27 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 28 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 29 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 029-030 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 30 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 31 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समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 142

छिज्जदु वा भिज्जदु वा णिज्जदु वा अहव जादु विप्पलयं । (209)

जम्हा तम्हा गच्छदु तहवि हु ण परिग्गहो मज्झ ॥218॥

छिद्यतां वा भिद्यतां वा नीयतां वाथवा यातु विप्रलयम्

यस्मात्तस्मात् गच्छतु तथापि खलु न परिग्रहो मम ॥२०९॥

छिद जाय या ले जाय कोइ अथवा प्रलय को प्राप्त हो ।

जावे चला चाहे जहाँ पर परिग्रह मेरा नहीं ॥२०९॥

अन्वयार्थ : [छिज्जदु वा] छिद जावे [भिज्जदु वा] अथवा भिद जावे [णिज्जदु वा] अथवा कोई ले जावे [अहव जादु विप्पलयं] अथवा नष्ट हो जावे [जम्हा तम्हा] चाहे जिस तरह से [गच्छदु तह वि] चला जावे, तो भी [हु] वास्तव में [ण परिग्गहो मज्झ] पर-द्रव्य परिग्रह मेरा नहीं है ।

Meaning : The alien substance may get cut, or split, or stolen, or destroyed; whatever the reason of its riddance, it is not my possession.

अमृतचंद्राचार्य

जयसेनाचार्य

notes

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत

अयं च मे निश्चय: –

छिद्यतां वा, भिद्यतां वा, नीयतां वा, विप्रलयं यातु वा, यतस्ततो गच्छतु वा, तथापि न परद्रव्यं परिगृह्णामि; यतो न परद्रव्यं मम स्वं, नाहं परद्रव्यस्य स्वामी, परद्रव्यमेव परद्रव्यस्य स्वं, परद्रव्यमेव परद्रव्यस्य स्वामी, अहमेव मम, स्वं अहमेव मम स्वामी इति जानामि ॥२०९॥

(कलश–वसन्ततिलका)

इत्थं परिग्रहमपास्य समस्तमेव

सामान्यत: स्वपरयोरविवेकहेतु् ।

अज्ञानमुज्झितु ना अधुना विशेषाद्

भूयस्तमेव परिहर्तुयं प्रवृत्त: ॥१४५॥

'और मेरा तो यह (निम्नोक्त) निश्चय है' यह अब कहते हैं –

पर-द्रव्य चाहे छिद जावे या भिद जावे या कोई ले जावे, या नाश को प्राप्त हो जावे, या जिस तिस प्रकार याने कैसे ही चला जावे तो भी मैं पर-द्रव्य को ग्रहण नहीं करता, क्योंकि पर-द्रव्य मेरा स्व नहीं है और न मैं पर-द्रव्य का स्वामी हूं, पर-द्रव्य ही पर-द्रव्य का स्व है, पर-द्रव्य ही पर-द्रव्य का स्वामी है, मैं ही मेरा स्व है, मैं ही मेरा स्वामी हूं ऐसा मैं जानता हूं ।

(कलश–सोरठा)

सभी परिग्रह त्याग, इसप्रकार सामान्य से ।

विविध वस्तु परित्याग, अब आगे विस्तार से ॥१४५॥

[इत्थं समस्तम् एव परिग्रहम्] इसप्रकार समस्त परिग्रह को [सामान्यतः अपास्य अधुना] सामान्यतः छोड़कर अब [स्वपरयोः अविवेकहेतुम् अज्ञानम् उज्झितुमनाः अयं] स्व-पर के अविवेक के कारणरूप अज्ञान को छोड़ने का जिसका मन है ऐसा यह [भूयः तम् एव] पुनः उसी (परिग्रह) को [विशेषात् परिहर्तुम् प्रवृत्तः] विशेषतः छोड़ने को प्रवृत्त होता है ।

जयसेनाचार्य :

आगे कहते हैं कि ये शरीरादि पर-द्रव्य मेरा परिग्रह नहीं है । इसी बात को और भी दृढ़ता से कहते हैं —

[छिज्जदु वा भिज्जदु वा णिज्जदु वा अहव जादु विप्पलयं] भले ही यह शरीर छिद जावे, दो टुकड़े हो जावे, चाहे यह भिद जावे अर्थात् नाना छेद वाला बन जावे, इसे कोई कहीं ले जावे, अथवा नष्ट हो जावे । [जम्हा तम्हा गच्छदु तहवि हु ण परिग्गहो मज्झ] भले ही इसकी कैसी भी दशा क्यों न हो जावे, इसका मुझे कोई भी विचार नही क्योंकि यह शरीर मेरा परिग्रह नहीं है । मैं तो टांकी से उकेरे हुए के समान सदा एक-सा रहने वाला एवं परमानन्द ज्ञायक एक-स्वभाव का धारक हूँ अर्थात मैं तो इससे सर्वथा भिन्न स्वभाव वाला हूँ — यह मेरा दृढ़ निश्चय है ॥२१८॥

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