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कर्मों को जानते हुए इस जीव का पुद्गल के साथ अतादात्म्य –
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि णपरदव्वपज्जाए । (76)
णाणी जाणंतो वि हु पोग्गलकम्मं अणेयविहं ॥82॥
नापि परिणमति न गृह्णात्युत्पद्यते न परद्रव्यपर्याये ।
ज्ञानी जानन्नपि खलु पुद्गलकर्मानेकविधम् ॥७६॥
परद्रव्य की पर्याय में उपजे ग्रहे ना परिणमें
बहुभाँति पुद्गल कर्म को ज्ञानी पुरुष जाना करें ॥७६॥
अन्वयार्थ : [णाणी] ज्ञानी [अणेयविहं] अनेक प्रकार के [पोग्गलकम्मं] पुद्गल-द्रव्य के पर्याय रूप कर्मों को [जाणंतो वि] जानता हुआ भी [हु] निश्चय से [परदव्वपज्जाए] पर द्रव्य के पर्यायों में [ण वि परिणमदि] न ही परिणमित होता है [ण गिण्हदि] न ग्रहण करता है [उप्पज्जदि ण] और न उत्पन्न होता है ।
Meaning : The knower, while knowing the various kinds of karmic matter, surely does not manifest himself in the modifications of alien substances, or assimilate them, or transmute in their form.
अमृतचंद्राचार्य
जयसेनाचार्य
notes
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
पुद्गलकर्म जानतो जीवस्य सह पुद्गलेन कर्तृकर्मभावः किं भवति किं न भवतीति चेत् –
यतो यं प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च व्याप्यलक्षणं पुद्गलपरिणामं कर्म पुद्गलद्रव्येणस्वयमन्तर्व्यापकेन भूत्वादिमध्यान्तेषु व्याप्य तं गृह्णता तथा परिणमता तथोत्पद्यमानेन च क्रियमाणं जानन्नपि हि ज्ञानी स्वयमन्तर्व्यापको भूत्वा बहिःस्थस्य परद्रव्यस्य परिणामं मृत्तिकाकलशमिवादिमध्यान्तेषु व्याप्य न तं गृह्णाति न तथा परिणमति न तथोत्पद्यते च, ततः प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च व्याप्यलक्षणं परद्रव्यपरिणामं कर्माकुर्वाणस्य, पुद्गलकर्म जानतोऽपि ज्ञानिनः पुद्गलेन सह न कर्तृकर्मभावः ।
चूंकि प्राप्य, विकार्य, निर्वर्त्य ऐसे व्याप्य-लक्षण वाले पुद्गल परिणाम को, जो कि स्वयं अन्तर्व्यापक होकर आदि-मध्य-अन्तमें व्यापकर
पुद्गल-परिणाम को ग्रहण करने वाले,
पुद्गल-परिणामरूप से परिणमने वाले और
पुद्गल-परिणामरूप से उत्पन्न होने वाले
पुद्गल-द्रव्य के ही द्वारा ही किया जाता है, उसको जानता हुआ भी ज्ञानी स्वयं अन्तर्व्यापक होकर बाह्य-स्थित पर-द्रव्य के परिणाम को आदि और मध्य अन्त में व्यापकर
उस रूप नहीं परिणमन करता,
उसको आप ग्रहण नहीं करता और
उसमें उपजता भी नहीं है
जैसे कि मिट्टी
घटरूप को ग्रहण करती है,
उसरूप परिणमन करती है, और
उसको उपजाती है,
इस कारण प्राप्य, विकार्य निर्वर्त्य स्वरूप व्याप्य-लक्षण पर-द्रव्य का परिणाम स्वरूप कर्म को नहीं करते हुए मात्र पुद्गल-कर्म को जानते हुए भी ज्ञानी का पुद्गल के साथ कर्तृ-कर्म भाव नहीं है ।
जयसेनाचार्य :
[पुग्गलकम्मं अणेयविहं] उपादान कारणभूत कर्म-वर्गणा योग्य पुद्गल-द्रव्य द्वारा किया हुआ है ऐसे मूल और उत्तर प्रकृति के भेद से अनेक प्रकार होने वाले पुद्गल-कर्म को [जाणंतो वि हु] विशिष्ट-भेदज्ञान के द्वारा स्पष्टरूप से जानता हुआ भी जाणी सहजानंद स्वरूप-एक-स्वभाव-वाला निज शुद्धात्मा और रागादि-आस्रव इन दोनों के भेद का ज्ञान रखनेवाला जीव, [ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि णपरदव्वपज्जाए] न तो परद्रव्य-पर्याय स्वरूप पूर्वोक्त कर्म के रूप में निश्चय से परिणमन ही करता है; जैसे कि मिट्टी-कलशरूप में परिणमन कर जाती है, और न तादात्म्य सम्बन्ध से ग्रहण ही करता है और न उसके आकार होकर उत्पन्न ही होता है । क्योंकि जिस प्रकार मिट्टी और कलश में परस्पर तादात्म्य संबंध है वैसा तादात्म्य संबंध जीव का पुद्गल-कर्म के साथ नहीं है ।
इसका अर्थ यह हुआ कि पुद्गल-कर्म को जानने वाले जीव का पुद्गल के साथ निश्चय से कर्त्ता-कर्म भाव नहीं है ॥८२॥
notes :
निर्वर्त्य : when anything new is produced:
Example : कटं करोति – he makes a mat
Example : पुत्रं प्रसूते – she bears a son;
विकार्य (vi-kārya), when change is implied either of the substance and form
Example : काष्ठं भस्म करोति – he reduces fuel to ashes;
Example : सुवर्णं कुण्डलं करोति – he fashions gold into an ear-ring
प्राप्य : when any desired object is attained
Example : ग्रामं गच्च्हति – he goes to the village
Example : चन्द्रं पश्यति – he sees the moon
अन्तर्व्यापक को कर्ता कहते हैं ।
अन्तर्व्याप्यको कर्म कहते हैं ।