All Chapters (208)
समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – शास्त्र-मंगलाचरण समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 1 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 2 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 3 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 4 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 5 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 6 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 7 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 8 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 9 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 10 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 11 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 12 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 13 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 14 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 15 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 16 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 17 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 18 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 19 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 20 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 21 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 22 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 23 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 24 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 25 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 26 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 026-027 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 27 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 28 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 29 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 029-030 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 30 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 31 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 32 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 33 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 34 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 35 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 36 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 37 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 38 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 39 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 40 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 41 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 42 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 43 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 44 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 45 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 46 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 47 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 48 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 49 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 50 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 51 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 52 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 53 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 54 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 55 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 56 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 57 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 58 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 59 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 60 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 61 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 62 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 63 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 64 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 064-065 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 65 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 66 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 67 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 68 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 69 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 70 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 71 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 72 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 73 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 74 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 75 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 76 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 77 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 78 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 79 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 80 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 81 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 82 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 83 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 84 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 85 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 86 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 87 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 88 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 89 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 90 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 91 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 92 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 93 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 94 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 95 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 96 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 97 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 98 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 99 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 100 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 101 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 102 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 103 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 104 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 105 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 106 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 107 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 108 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 109 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 110 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 111 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 112 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 113 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 114 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 115 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 116 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 117 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 118 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 119 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 120 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 121 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 122 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 123 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 124 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 125 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 126 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 127 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 128 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 129 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 130 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 131 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 132 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 133 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 134 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 135 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 136 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 137 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 138 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 139 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 140 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 141 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 142 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 143 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 144 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 145 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 146 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 147 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 148 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 149 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 150 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 151 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 152 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 153 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 154 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 155 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 156 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 157 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 158 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 159 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 160 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 161 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 162 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 163 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 164 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 165 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 166 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 167 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 168 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 169 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 170 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 171 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 172 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 173 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 174 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 175 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 176 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 177 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 178 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 179 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 180 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 181 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 182 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 183 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 184 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 185 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 186 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 187 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 188 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 189 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 190 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 191 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 192 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 193 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 194 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 195 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 196 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 197 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 198 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 199 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 200 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 201 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 202 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 203 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 204

समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 18

+

रत्नत्रय ही आत्मा है –

दंसणणाणचरित्ताणि सेविदव्वाणि साहुणा णिच्चं । (16)

ताणि पुण जाण तिण्णि वि अप्पाणं चेव णिच्छयदो ॥19॥

चारित्र दर्शन ज्ञान को सब साधुजन सेवें सदा

ये तीन ही हैं आतमा बस कहे निश्चयनय सदा ॥१६॥

अन्वयार्थ : [साहुणा] साधुपुरुष को [दंसणणाणचरित्तणि] दर्शन-ज्ञान-चारित्र का [णिच्चं] सदा [सेविदव्वाणि] सेवन करना चाहिए [ताणि पुण] और उन [तिण्णि] तीनों को [णिच्छयदो] निश्चय से एक [अप्पाणं] आत्मा [वि] ही [जाण] जानो ।

Meaning : The seekers (of eternal bliss) should always be devoted to [right] belief, knowledge, and conduct. However, it should be noted again that all these three are the soul from the real point of view.

अमृतचंद्राचार्य

जयसेनाचार्य

notes

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत

येनैव हि भावेनात्मा साध्य: साधनं च स्यात्तेनैवायं नित्यमुपास्य इति स्वयमाकूय परेषां व्यवहारेण साधुना दर्शनज्ञानचारित्राणि नित्यमुपास्यानीति प्रतिपाद्यते । तानि पुनस्त्रीण्यपि परमार्थे-नात्मैक एव वस्त्वंतराभावात्‌ । यथा देवदत्तस्य कस्यचित्‌ ज्ञानं श्रद्धानमनुचरणं च देवदत्तस्वभावा- नतिक्रमाद्देवदत्त एव न वस्त्वंतरम्‌ । तथात्मन्यप्यात्मनो ज्ञानं श्रद्धानमनुचरणं चात्मस्वभावा-नतिक्रमादात्मैव न वस्त्वंतरम्‌ । तत आत्मा एक एवोपास्य इति स्वयमेव प्रद्योतते ॥१६॥ स किल

(कलश–अनुष्टुभ्)

दर्शनज्ञानचारित्रैस्त्रित्वादेकत्वत: स्वयम्

मेचकोऽमेचकश्चापि सममात्मा प्रमाणत: ॥१६॥

(कलश–अनुष्टुभ्)

दर्शनज्ञानचारित्रैस्त्रिभि: परिणतत्वत:

एकोsपि त्रिस्वभावत्वाद् व्यवहारेण मेचक: ॥१७॥

(कलश–अनुष्टुभ्)

परमार्थेन तु व्यक्तज्ञातृत्वज्योतिषैकक:

सर्वभावांतर-ध्वंसि-स्वभावत्वाद-मेचक: ॥१८॥

(कलश–अनुष्टुभ्)

आत्मनश्चिंतयैवालं मेचकामेचकत्वयो:

दर्शनज्ञानचारित्रै: साध्यसिद्धिर्न चान्यथा ॥१९॥

यह आत्मा जिस भाव से साध्य तथा साधन हो, उस भाव से ही नित्य सेवन करने योग्य है, उपासना करने योग्य है । इसप्रकार स्वयं विचार करके दूसरों को व्यवहार से समझाते हैं कि साधुपुरुष को दर्शन-ज्ञान-चारित्र सदा सेवन करने योग्य हैं, सदा उपासना करने योग्य हैं; किन्तु परमार्थ से देखा जाये तो ये तीनों एक आत्मा ही हैं, आत्मा की ही पर्यायें हैं; अन्य वस्तु नहीं हैं । जिसप्रकार देवदत्त नामक पुरुष के ज्ञान, दर्शन और आचरण, देवदत्त के स्वभाव का उल्लंघन न करने से देवदत्त ही हैं; अन्य वस्तु नहीं । उसीप्रकार आत्मा में भी घटित कर लेना चाहिए कि आत्मा के ज्ञान, श्रद्धान और आचरण आत्मा के स्वभाव का उल्लंघन न करने से आत्मा ही है, अन्य वस्तु नहीं । इसलिए यह स्वत: ही सिद्ध हो गया कि एक आत्मा ही उपासना करने योग्य है, सेवन करने योग्य है ।

(कलश–हरिगीत)

मेचक कहा है आतमा दृग-ज्ञान अर आचरण से

यह एक निज परमातमा बस है अमेचक स्वयं से ॥

परमाण से मेचक-अमेचक एक ही क्षण में अहा

यह अलौकिक मर्मभेदी वाक्य जिनवर ने कहा ॥१६॥

[प्रमाणतः] प्रमाण-दृष्टि से देखा जाये तो [आत्मा] यह आत्मा [समम्मेचकः अमेचकः च अपि] एक ही साथ अनेक अवस्थारूप (मेचक) भी है और एक अवस्थारूप (अमेचक) भी है, [दर्शन-ज्ञान-चारित्रैः त्रित्वात्] क्योंकि इसे दर्शन-ज्ञान-चारित्र से तो त्रित्व (तीनपना) है और [स्वयम् एकत्वतः] अपने से अपने को एकत्व है ।

(कलश–हरिगीत)

आतमा है एक यद्यपि किन्तु नय व्यवहार से

त्रैरूपता धारण करे सद्ज्ञानदर्शनचरण से ॥

बस इसलिए मेचक कहा है आतमा जिनमार्ग में

अर इसे जाने बिन जगतजन ना लगें सन्मार्ग में ॥१७॥

[एकः अपि] आत्मा एक है, तथापि [व्यवहारेण] व्यवहार-दृष्टि से देखा जाय तो [त्रिस्वभावत्वात्] तीन-स्वभावरूपता के कारण [मेचकः] अनेकाकाररूप (मेचक) है, [दर्शन-ज्ञान-चारित्रैः त्रिभिः परिणतत्वतः] क्योंकि वह दर्शन, ज्ञान और चारित्र, इन तीन-भावोंरूप परिणमन करता है ।

(कलश–हरिगीत)

आतमा मेचक कहा है यद्यपि व्यवहार से

किन्तु वह मेचक नहीं है अमेचक परमार्थ से ॥

है प्रगट ज्ञायक ज्योतिमय वह एक है भूतार्थ से

है शुद्ध एकाकार पर से भिन्न है परमार्थ से ॥१८॥

[परमार्थेन तु] शुद्ध निश्चयनय से देखा जाये तो [व्यक्त -ज्ञातृत्व-ज्योतिषा] प्रगट ज्ञायकत्व-ज्योतिमात्र से [एककः] आत्मा एक-स्वरूप है, [सर्व-भावान्तर-ध्वंसि-स्वभावत्वात्] क्योंकि शुद्ध-द्रव्यार्थिक नय से सर्व अन्य द्रव्य के स्वभाव तथा अन्य के निमित्त से होनेवाले विभावों को दूर करनेरूप उसका स्वभाव है, इसलिये वह [अमेचकः] शुद्ध एकाकार 'अमेचक' है ।

(कलश–हरिगीत)

मेचक-अमेचक आतमा के चिन्तवन से लाभ क्या

बस करो अब तो इन विकल्पों से तुम्हें है साध्य क्या ॥

हो साध्यसिद्धि एक बस सद्ज्ञानदर्शनचरण से

पथ अन्य कोई है नहीं जिससे बचें संसरण से ॥१९॥

[आत्मनः] यह आत्मा [मेचक-अमेचकत्वयोः] मेचक (भेदरूप, अनेकाकार) है तथा अमेचक (अभेदरूप, एकाकार) है [चिन्तया एव अलं] ऐसी चिन्ता से तो बस हो । [साध्यसिद्धिः] साध्य (आत्मा) की सिद्धि तो [दर्शन-ज्ञान-चारित्रैः] दर्शन, ज्ञान और चारित्र, (इन तीन भावों) से ही होती है, [न च अन्यथा] अन्य प्रकार से नहीं (यह नियम है) ।

जयसेनाचार्य :

[दंसणणाणचरित्तणि सेविदव्वाणि साहुणा णिच्चं] साधु को व्यवहारनय से सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र इन तीनों को भिन्न-भिन्न समझकर नित्य सदा ही इनकी उपासना करना चाहिये, अपने उपयोग में लाना चाहिये । [ताणि पुण जाण तिण्णि वि अप्पाणं चेव णिच्छयदो] किन्तु शुद्ध-निश्चय-नय से वे तीनों एक शुद्धात्म स्वरूप ही हैं उससे भिन्न नहीं हैं ऐसा समझना चाहिये । इसका अर्थ यह है कि पंचेन्द्रियों के विषय और क्रोधादि-कषायों से रहित जो निर्विकल्प समाधि है उसमें ही सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र ये तीनों होते हैं ।

0:00
0:00