All Chapters (208)
समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – शास्त्र-मंगलाचरण समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 1 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 2 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 3 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 4 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 5 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 6 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 7 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 8 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 9 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 10 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 11 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 12 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 13 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 14 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 15 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 16 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 17 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 18 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 19 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 20 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 21 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 22 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 23 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 24 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 25 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 26 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 026-027 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 27 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 28 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 29 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 029-030 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 30 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 31 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 32 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 33 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 34 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 35 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 36 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 37 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 38 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 39 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 40 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 41 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 42 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 43 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 44 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 45 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 46 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 47 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 48 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 49 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 50 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 51 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 52 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 53 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 54 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 55 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 56 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 57 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 58 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 59 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 60 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 61 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 62 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 63 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 64 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 064-065 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 65 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 66 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 67 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 68 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 69 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 70 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 71 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 72 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 73 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 74 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 75 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 76 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 77 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 78 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 79 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 80 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 81 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 82 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 83 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 84 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 85 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 86 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 87 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 88 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 89 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 90 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 91 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 92 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 93 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 94 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 95 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 96 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 97 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 98 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 99 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 100 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 101 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 102 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 103 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 104 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 105 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 106 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 107 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 108 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 109 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 110 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 111 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 112 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 113 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 114 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 115 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 116 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 117 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 118 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 119 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 120 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 121 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 122 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 123 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 124 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 125 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 126 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 127 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 128 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 129 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 130 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 131 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 132 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 133 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 134 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 135 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 136 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 137 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 138 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 139 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 140 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 141 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 142 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 143 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 144 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 145 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 146 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 147 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 148 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 149 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 150 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 151 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 152 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 153 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 154 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 155 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 156 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 157 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 158 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 159 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 160 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 161 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 162 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 163 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 164 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 165 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 166 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 167 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 168 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 169 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 170 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 171 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 172 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 173 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 174 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 175 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 176 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 177 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 178 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 179 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 180 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 181 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 182 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 183 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 184 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 185 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 186 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 187 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 188 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 189 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 190 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 191 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 192 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 193 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 194 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 195 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 196 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 197 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 198 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 199 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 200 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 201 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 202 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 203 समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 204

समयसार–कुन्दकुन्दाचार्य – 85

+

पुद्गल के कथंचित परिणामी स्वभावपना –

जीवे ण सयं बद्धं ण सयं परिणमदि कम्मभावेण । (116)

जइ पोग्गलदव्वमिणं अप्परिणामी तदा होदि ॥123॥

कम्मइयवग्गणासु य अपरिणमंतीसु कम्मभावेण । (117)

संसारस्स अभावो पसज्जदे संखसमओ वा ॥124॥

जीवो परिणामयदे पोग्गलदव्वाणि कम्मभावेण । (118)

ते सयमपरिणमंते कहं णु परिणामयदि चेदा ॥125॥

अह सयमेव हि परिणमदि कम्मभावेण पोग्गलं दव्वं । (119)

जीवो परिणामयदे कम्मं कम्मत्तमिदि मिच्छा ॥

णियमा कम्मपरिणदं कम्मं चिय होदि पोग्गलं दव्वं । (120)

तह तं णाणावरणाइपरिणदं मुणसु तच्चेव ॥

जीवे न स्वयं बद्धं न स्वयं परिणमते कर्मभावेन

यदि पुद्गलद्रव्यमिदमपरिणामि तदा भवति ॥११६॥

कार्मणवर्गणासु चापरिणममानासु कर्मभावेन

संसारस्याभाव: प्रसजति सांख्यसमयो वा ॥११७॥

जीव: परिणामयति पुद्गलद्रव्याणि कर्मभावेन

तानि स्वयमपरिणममानानि कथं नु परिणामयति चेतयिता ॥११८॥

अथ स्वयमेव हि परिणमते कर्मभावेन पुद्गलं द्रव्यम्

जीव: परिणामयति कर्म कर्मत्वमिति मिथ्या ॥११९॥

नियमात्कर्मपरिणतं कर्म चैव भवति पुद्गलं द्रव्यम्

तथा तद्ज्ञानावरणादिपरिणतं जानीत तच्चैव ॥१२०॥

यदि स्वयं ही कर्मभाव से परिणत न हो ना बँधे ही

तो अपरिणामी सिद्ध होगा कर्ममय पुद्गल दरव ॥११६॥

कर्मत्व में यदि वर्गणाएँ परिणमित होंगी नहीं

तो सिद्ध होगा सांख्यमत संसार की हो नास्ति ॥११७॥

यदि परिणमावे जीव पुद्गल दरव को कर्मत्व में

पर परिणमावे किसतरह वह अपरिणामी वस्तु को ॥११८॥

यदि स्वयं ही परिणमें वे पुद्गल दरव कर्मत्व में

मिथ्या रही यह बात उनको परिणमावें आतमा ॥११९॥

जड़कर्म परिणत जिसतरह पुद्गल दरव ही कर्म है

जड़ज्ञान-आवरणादि परिणत ज्ञान-आवरणादि हैं ॥१२०॥॥

अन्वयार्थ : [जइ पोग्गलदव्वमि] यदि पुद्गलद्रव्य [जीवे] जीव में [सयं] स्वयं [ण बद्धं] नहीं बँधा [कम्मभावेण] कर्मभाव से [सयं] स्वयं [ण परिणमदि] नहीं परिणमन करता है [इणं तदा] ऐसा मानो तो यह पुद्गलद्रव्य [अप्परिणामी] अपरिणामी [होदि] प्रसक्त होता है [य] और [कम्मइयवग्गणासु] कार्माणवर्गणाओं के [कम्मभावेण] कर्मभाव से [अपरिणमंतीसु] नहीं परिणमने पर [संसारस्स] संसार का [अभावो] अभाव [पसज्जदे] ठहरेगा [वा] अथवा [संखसमओ] सांख्य मत का प्रसंग आयेगा । [जीवो] यदि जीव ही [पोग्गलदव्वाणि] पुद्गल-द्रव्यों को [कम्मभावेण] कर्मभाव से [परिणामयदे] परिणमन कराता है ऐसा माना जाय तो [सयमपरिणमंते] आप ही परिणमन न करते [ते] उन पुद्गल-द्रव्यों को [चेदा] यह चेतन जीव [कहं णु] कैसे [परिणामयदि] परिणमा सकता है ? [अह] अथवा [पोग्गलं दव्वं] पुद्गल-द्रव्य [सयमेव हि] आप ही [कम्मभावेण] कर्मभाव से [परिणमदि] परिणमता है, ऐसा माना जाय तो [जीवो] जीव [कम्मं] कर्मरूप पुद्गलको [कम्मत्तम्] कर्म रूप से [परिणामयदे] परिणमाता है [इदि] ऐसा कहना [मिच्छा] झूठ हो जाता है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि [पोग्गलं दव्वं] पुद्गल-द्रव्य [कम्मपरिणदं] कर्म-रूप परिणत हुआ [णियमा चैव] नियम से ही [कम्मं] कर्म-रूप [होदि] होता है [तह] ऐसा होने पर [चिय] वह पुद्गल-द्रव्य ही [णाणावरणाइपरिणदं] ज्ञानावरणादिरूप परिणत [तं] पुद्गल-द्रव्य को [तच्चेव] ज्ञानावरणादि ही हैं, ऐसा [मुणसु] जानो ।

Meaning : If you believe that physical matter does not get bound to the Self on its own accord, nor does it evolve into modes of karma on its own accord, then, it becomes immutable.

Or else, if you believe that the karmic molecules (varga) do not get transformed into various karmic modes, then this belief will lead to non-existence of the worldly state of the soul (samsâra), identical with the Sâkhya system.

If you maintain that the Self transforms the karmic molecules into various karmic modes, then how can the Self cause transformation in a substance that, by nature, is immutable?

Or else, if you believe that the physical matter, on its own accord, transforms into various modes of karmas, then it will be false to say that jîva causes transformation of karmic matter into karmic modes.

Therefore, in reality, just as the karmic molecules which get transformed into various karmic modes are material substance, in the same way, karmic modifications like knowledge-obscuring karmas etc., are mutated states of the karmic substance.

अमृतचंद्राचार्य

जयसेनाचार्य

notes

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत

अथ पुद्गलद्रव्यस्य परिणामस्वभावत्वं साधयति सांख्यमतानुयायिशिष्यं प्रति –

यदि पुद्‌गलद्रव्यं जीवे स्वयमबद्धं सत्कर्मभावेन स्वयमेव न परिणमेत तदा तदपरिणाम्येव स्यात्‌ । तथा सति संसाराभाव: ।

अथ जीव: पुद्‌गलद्रव्यं कर्मभावेन परिणामयति ततो न संसाराभाव: इति तर्क: ।

किं स्वयमपरिणममानं परिणममानं वा जीव: पुद्‌गलद्रव्यं कर्मभावेन परिणामयेत्‌ ? न तावत्तत्स्वयमपरिणममानं परेण परिणमयितुं पार्येत, न हि स्वतोऽसती शक्ति: कर्तुमन्येन पार्यते ।

स्वयं परिणममानं तु न परं परिणमयितारमपेक्षेत, न हि वस्तुशक्तय: परमपेक्षंते । तत: पुद्‌गलद्रव्यं परिणामस्वभावं स्वयमेवास्तु ।

तथा सति कलशपरिणता मृत्तिका स्वयं कलश इव जडस्वभावज्ञानावरणादिकर्मपरिणतं तदेव स्वयं ज्ञानावरणादिकर्म स्यात्‌ । इति सिद्धे पुद्‌गलद्रव्यस्य परिणामस्वभावत्वम्‌ ॥११६-१२०॥

(कलश–उपजाति)

स्थितेत्यविघ्ना खलु पुद्गलस्य स्वभावभूता परिणामशक्ति: ।

तस्यां स्थितायां स करोति भावं यमात्मनस्तस्य स एव कर्ता ॥६४॥

अब सांख्यमतानुयायी शिष्य के प्रति पुद्गल-द्रव्य का परिणाम-स्वभावत्व सिद्ध करते हैं (अर्थात् सांख्यमत वाले प्रकृति और पुरुष को अपरिणामी मानते हैं उन्हें समझाते हैं) :-

यदि पुद्गल-द्रव्य जीव में आप नहीं बँधा हुआ कर्मभाव से स्वयमेव नहीं परिणमन करता है तो पुद्गल-द्रव्य अपरिणामी ही सिद्ध हो जायगा । ऐसा होने पर संसार का अभाव हो जायगा । यदि कोई ऐसा तर्क करे कि जीव पुद्गल-द्रव्य को कर्मभाव से परिणमाता है, इसलिये संसार का अभाव नहीं हो सकता, उसके समाधान में प्रश्न है कि यदि जीव पुद्गल को परिणमित कराता है तो वह स्वयं अपरिणमित को परिणमित कराता है या स्वयं परिणमित को परिणमित कराता है ? यदि इनमें से पहला पक्ष लिया जाय तो स्वयं अपरिणमित को कोई नहीं परिणमा सकता, क्योंकि स्वयं अपरिणमित को पर के द्वारा परिणमाने की सामर्थ्य नहीं होती । स्वतः शक्ति जिसमें नहीं होती, वह पर के द्वारा भी नहीं आ सकती । यदि स्वयं परिणमित पुद्गल-द्रव्य को जीव कर्म-भाव से परिणमाता है, ऐसा दूसरा पक्ष लिया जाय तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि अपने आप परिणमित हुए को अन्य परिणमाने वाले की आदश्यकता ही नहीं, क्योंकि वस्तु की शक्ति पर की अपेक्षा नहीं करती । इसलिये पुद्गल-द्रव्य परिणाम-स्वभाव स्वयमेव होवे । ऐसा होने पर जैसे कलशरूप परिणत हुई मिट्टी अपने आप कलष ही है, उसी भाँति जड-स्वभाव ज्ञानावरण आदि कर्म-रूप परिणत हुआ पुद्गल-द्रव्य ही आप ज्ञानावरण आदि कर्म ही है । इस प्रकार पुद्गल द्रव्य का परिणाम-स्वभावपना सिद्ध हुआ ।

(कलश–हरिगीत)

सब पुद्गलों में है स्वभाविक परिणमन की शक्ति जब ।

और उनके परिणमन में है न कोई विघ्न जब ॥

क्यों न हो तब स्वयं कर्ता स्वयं के परिणमन का ।

सहज ही यह नियम जानो वस्तु के परिणमन का ॥६४॥

[इति] इसप्रकार [पुद्गलस्य] पुद्गल-द्रव्य की [स्वभावभूता परिणामशक्तिः] स्वभावभूत परिणमन-शक्ति [खलु अविघन स्थिता] निर्विघ्न सिद्ध हुई । [तस्यांस्थितायां] उसके सिद्ध होने पर, [सः आत्मनः यम् भावं करोति] पुद्गल-द्रव्य अपने जिस भाव को करता है [तस्य सः एव कर्ता] उसका वह पुद्गल-द्रव्य ही कर्ता है ।

जयसेनाचार्य :

[जीवे ण सयं बद्धं] पुद्गल-द्रव्य-रूप कर्म अधिकरण-भूत जीव में न तो स्वयं बद्ध है क्योंकि जीव तो सदा शुद्ध है और [ण सयं परिणमदि कम्मभावेण] अपने-आप कर्म-रूप से भी अर्थात् द्रव्य-कर्म के पर्याय-रूप से भी नहीं परिणमता है, क्योंकि वह पुद्गल-द्रव्य भी सदा नित्य है । [जइ पोग्गलदव्वमिणं] यदि इस प्रकार पुद्गल-द्रव्य को माना जायेगा तो [अप्परिणामी तदा होदि] सांख्य-मतवालों के मत से यह पुद्गल-द्रव्य अपरिणामी ही हुआ । ऐसी दशा में [कम्मइयवग्गणासु य अपरिणमंतीसु कम्मभावेण] कार्मण-वर्गणाओं के ज्ञानावरणादि-द्रव्य-कर्म रूप नहीं परिणमन करने पर [संसारस्स अभावो पसज्जदे संखसमओ वा] इस संसार का सांख्य-मत के समान अभाव प्राप्त हो जायेगा । [जीवो परिणामयदे पोग्गलदव्वाणि कम्मभावेण] यदि ऐसा कहा जाय कि जीव हठात् कर्म-वर्गणा-योग्य-पुद्गल द्रव्यों को ज्ञानावरणादि-कर्म रूप से परिणमा लेता है अत: संसार का अभाव नहीं होगा, [तं सयमपरिणमंते कहं णु परिणामयदि चेदा] तो वहाँ यह प्रश्न होता है कि ज्ञानी जीव जो स्वयं अपरिणमनशील है वह उस पुद्गल-द्रव्य को जो परिणमाता है, वह नहीं परिणमन करते हुए को परिणमाता है या परिणमन करते हुए को ? यदि कहा जाये कि नहीं परिणमते हुए को परिणमाता है सो यह बात तो बन नहीं सकती क्योंकि जहाँ जो शक्ति स्वयं में नहीं है वहाँ वह शक्ति दूसरे द्वारा भी नहीं की जा सकती, यह अटल नियम है । जैसे जपा-पुष्पादिक स्फटिक-मणि में उपाधि को पैदा कर सकते है, वैसे काष्ठ के खंभे आदि में नहीं कर सकते, क्योंकि उसमें वैसी शक्ति नहीं है । यदि कहा जाये कि एकान्त रूप से परिणमन करते हुए को ही परिणमाता है तो यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि वस्तु में जो शक्तियाँ होती हैं वे अपने परिणमन में दूसरे की अपेक्षा नहीं रखती, ऐसा नियम है । अत: जबकि पुदुगल को स्वयं परिणमन करते रहना चाहिए, ऐसी दशा में फिर कार्मण-वर्गणायें जिस प्रकार ज्ञानावरणादि-कर्म के रूप में परिणमन करती हैं वैसे ही घट-पटादि-रुप-पुद्गल भी कर्म-रूप में परिणमन करें यह प्रत्यक्ष-विरोध-रूप दूषण आयेगा । अत: यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है कि पुद्गलों में कथंचित् परिणमने की शक्ति सहज-स्वभाव से है । जब उनमें यह शक्ति है तो उसका कर्ता स्वयं पुद्गल ही है । इस प्रकार अपने सम्बन्धी ज्ञानावरणादि-द्रव्यकर्म उनमें जिस परिणाम को करता है उसका उपादान पुद्गल ही होता है, जैसे कि कलश का उपादान कारण मिट्टी का पिण्ड है, किंतु ज्ञानावरणादि कर्मों का उपादान जीव नहीं है । जीव तो उसका निमित्त कारण मात्र है जो कि हेय-तत्त्व है अर्थात् जीव का जो भाव, कर्मों का निमित्त कारण होता है वह भी आस्रव-रूप होने से हेय-तत्त्व है, उपादेय रूप तत्त्व तो शुद्ध-निश्चय-नय की अपेक्षा से निज-शुद्धात्मा ही है जो उस उपर्युक्त पुद्गल से भिन्न एवं शुद्ध-परमात्म-भावना-रूप में परिणत, ऐसा अभेद-रत्नत्रय ही है लक्षण जिसका, ऐसे भेद-ज्ञान के द्वारा जानने योग्य है और चिदानन्द रूप एक-स्वभाव-वाला है । हाँ, इस अभेद-रत्नत्रय का साधक होने से व्यवहार-नय से भेद-रत्नत्रय भी उपादेय है । इस प्रकार तीन गाथाओं के शब्दार्थ के व्याख्यान से शब्दार्थ जानना चाहिए, व्यवहार-निश्चय-रूप से नयार्थ को भी जानना चाहिए । सांख्य के लिए मतार्थ का व्याख्यान हुआ । इस प्रकार शब्द, नय, मत, आगम और भावार्थ इन पाँच अर्थों से कथन किया, यह व्याख्यान-काल में यथासंभव सर्व ही ठिकाने जानते रहना चाहिए ।

इस प्रकार पुद्गल को परिणाम-शील बताने के रूप में तीन गाथाओं का व्याख्यान हुआ ॥१२३-१२५॥

0:00
0:00